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वित्त मंत्रालय की चेतावनी: अल्पकालिक वृद्धि से बचें, दीर्घकालिक स्थिरता और सुधारों पर भारत को देना होगा जोर

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पश्चिम एशिया संकट से महंगाई का जोखिम बढ़ा मगर मजबूत घरेलू मांग से अर्थव्यवस्था को सहारा

Last Updated- April 29, 2026 | 11:21 PM IST
Economy

वित्त मंत्रालय की आज जारी मासिक आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि पश्चिम एशिया संकट से निपटने के क्रम में अल्पकालिक वृद्धि के पीछे भागने के बजाय, भारत को मध्यम अवधि की राजकोषीय और बाह्य स्थिरता को सुरक्षित रखना चाहिए और लंबे समय से लंबित सुधारों को आगे बढ़ाना चाहिए।

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘कई देशों के लिए अल्पकालिक वृद्धि को बढ़ावा देना और रोजगार बचाना आकर्षक लग सकता है। मगर वृहद आ​​र्थिक ​स्थिरता भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अल्पकालिक वृद्धि को बहाल करने के सतर्क प्रयास बाहरी संतुलन, मुद्रास्फीति के दृष्टिकोण और मुद्रा को अस्थिर करके मध्यम से लंबी अविध की वृ​द्धि की संभावनाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं।’

मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन के नेतृत्व में वित्त मंत्रालय के आर्थिक प्रभाग द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट में सरकार को संकट से सबक लेते हुए पांच आयामी सुधार रणनीति अपनाने की सलाह दी गई है।

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘भारत को आयात के लिए किसी एक स्रोत की निर्भरता को दूसरे से बदलने के बजाय ऊर्जा सुरक्षा और लचीलेपन को प्राथमिकता देनी चाहिए, साथ ही इसमें ध्यान रखना चाहिए कि अचानक से आपूर्ति पर किसी तरह का असर न पड़े।’

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सार्वजनिक परिवहन पर व्यापक जोर देने से ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के साथ-साथ शहरी जीवन स्तर में सुधार भी हो सकता है। इसमें यह भी कहा गया कि इसके लिए राज्यों के साथ आम सहमति बनाने की जरूरत होगी क्योंकि मौजूदा संकट से निपटने के लिए सभी संबंधित पक्षों की ओर से समन्वित कार्रवाई की जरूरत है।

रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि वैश्विक अनिश्चितता के कारण घरेलू स्तर पर विनियमन को कम करने से पीछे नहीं हटना चाहिए। आसान नियमन खास तौर पर आयात और निर्यात की लागत को कम करने वाले उपाय ऐसे समय में बहुत महत्त्वपूर्ण होंगे।

रिपोर्ट में कृषि और जल नीतियों में लंबे समय से लंबित सुधारों को पूरा करने की जरूरत बताई गई है। इसमें कहा गया है, ‘लंबे समय से लंबित नीतियों को लागू करने का यह आदर्श समय है। कृषि उत्पादकता में सुधार करने पर भी जोर दिया गया है। रिपोर्ट में सामान्य से कम मॉनसूनी बारिश के अनुमान को प्रमुख जोखिम बताया गया है।

रिपोर्ट में ऐसा श्रमबल बनाने की जरूरत पर भी जोर दिया गया जो तकनीक में आने वाले बदलावों का सामना कर सके। रिपोर्ट में कहा गया, ‘एआई के असर से सुर​क्षित करने के लिए युवाओं में नए कौशल विकसित करने पर ध्यान देना चाहिए जिससे घरेलू विनिर्माण और सेवाओं को मदद मिलेगी, साथ ही निर्यात के नए अवसर भी पैदा होंगे।’ रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत के सामने रोजगार की जो चुनौती है, वह केवल आईटी क्षेत्र की नौकरियों पर एआई के असर तक सीमित नहीं है।

रिपोर्ट ने कर नीति में निश्चितता और स्थिरता के महत्त्व पर जोर दिया और आगाह किया कि अल्पकालिक वृद्धि को बनाए रखने पर अत्यधिक ध्यान देने का जोखिम व्यापक आर्थिक हितों पर हावी नहीं होना चाहिए।

बाहरी क्षेत्र के रुझानों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का वस्तु व्यापार घाटा वित्त वर्ष 2025 के 283.5 अरब डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में 333.2 अरब डॉलर हो गया जबकि इसी अवधि में कुल व्यापार घाटा 94.7 अरब डॉलर से बढ़कर 119.3 अरब डॉलर हो गया। वित्त वर्ष 2027 में भी व्यापक घाटे के साथ चालू खाता घाटा ऊंचा रह सकता है।

कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) प्रवाह में हाल की वृद्धि को उत्साहजनक बताते हुए रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि वैश्विक वातावरण अधिक प्रतिस्पर्धी बनता जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसा देश तेजी से आपूर्ति श्रृंखला और निवेश प्रवाह को हथियार बना रहे हैं, जिससे व्यवसायों के लिए स्थानांतरण निर्णय अधिक जटिल हो रहे हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘यदि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के परिणामस्वरूप इस वित्त वर्ष में इन मोर्चों और उससे आगे पर टिकाऊ प्रभाव के साथ सार्थक कार्रवाई होती है तो भारत आने वाले वर्षों में निरंतर उच्च वृद्धि के लिए मजबूत नींव के साथ उभरेगा।’

रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम एशिया का संघर्ष आपूर्ति में एक बड़ा झटका है वहीं भारत की घरेलू मांग, मजबूत वित्तीय प्रणाली और लगातार हो रहे सार्वजनिक निवेश कुछ हद तक सुरक्षा प्रदान करते हैं। मासिक आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि ऊर्जा और उर्वरक आपूर्ति को लेकर लंबी अनिश्चितता देश की वृहद आर्थिक स्थिरता की मजबूती की परीक्षा ले सकती है।

रिपोर्ट में पश्चिम एशिया संकट के बीच आपूर्ति पक्ष से जुड़े झटके की चेतावनी देते हुए कहा गया है कि बढ़ती कीमतों और आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार धीमी होने से मांग में कमी भी चिंता का विषय है। इसके साथ कंपनियों द्वारा बढ़ती लागत को उपभोक्ताओं पर डाले जाने से महंगाई भी बढ़ सकती हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि जहां एक तरफ आपूर्ति से जुड़ी दिक्कतें साफ तौर पर नजर आ रही हैं, वहीं मार्च में कारों और ट्रैक्टरों की बिक्री के आंकड़ों से पता चलता है कि मांग अभी भी मजबूत बनी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार आगे चलकर मांग की स्थिति और आर्थिक गतिविधियों पर कच्चे माल की लागत और आपूर्ति श्रृंखला में रुकावटों से पैदा होने वाले दबाव का असर पड़ेगा। हालांकि युद्ध विराम के साथ शांति बनी रहेगी और उम्मीद है कि 2026 की दूसरी छमाही में हालात बेहतर होंगे।

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First Published - April 29, 2026 | 11:15 PM IST

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