अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमले और उसकी जवाबी कार्रवाई से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों में वृद्धि हुई है। इससे कई देश ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह एशिया प्रशांत क्षेत्र के देशों के विकास संभावनाओं पर सवाल खड़ा करता है। एसऐंडपी ग्लोबल के प्रमुख अर्थशास्त्री लुइस कुइस ने ऊर्जा क्षेत्र में बनी चुनौतीपूर्ण स्थिति के प्रभाव पर कृष्णकांत से बातचीत की है। पेश हैं प्रमुख अंश-
अमेरिका-इजरायल युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने का एशिया प्रशांत क्षेत्र की अर्थव्यवस्थाओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
हम एशिया प्रशांत क्षेत्र की 13 अर्थव्यवस्थाओं का अध्ययन करते हैं, जिनमें से केवल तीन देश ऊर्जा निर्यातक हैं मसलन ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया और इंडोनेशिया। बाकी के देश जैसे चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, भारत, वियतनाम, फिलिपींस, ताइवान, थाईलैंड, हांगकांग और सिंगापुर ऊर्जा आयातक हैं और अक्सर यह आयात उनके लिए बहुत बड़े होते हैं। यदि फारस की खाड़ी क्षेत्र में चल रहे संघर्ष के कारण ऊर्जा आपूर्ति में रुकावट आती है या कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आती है तब इससे ऊर्जा आयातक देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर असर पड़ेगा।
भारत का ऊर्जा आयात देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीप) का लगभग 5 प्रतिशत है। अगर कच्चे तेल की कीमत में 40 प्रतिशत की वृद्धि होती है तब इसका मतलब है कि चालू खाता घाटा जीडीपी के 2 प्रतिशत के बराबर बढ़ सकता है। थाईलैंड और भी अधिक संवेदनशील है क्योंकि उसके ऊर्जा आयात जीडीपी का लगभग 7 प्रतिशत हैं। इससे उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाओं के लिए जोखिम बढ़ता है।
क्या एशिया प्रशांत देशों जिसमें भारत भी शामिल है उसके लिए वृद्धि अनुमान में कोई गिरावट हो सकती है?
वृद्धि अनुमान में कमी लाना अजीब नहीं होगा। निश्चित रूप से हम ऊर्जा आयातक देशों के लिए वृद्धि अनुमान में कुछ कमी देखेंगे। हम फिलहाल अनुमान तय करने की प्रक्रिया के मध्य में हैं और इन अनुमानों में सटीक बदलाव इस बात पर निर्भर करेगा कि संघर्ष कितना लंबा और गहरा होता है। एसऐंडपी ग्लोबल रेटिंग्स में हम एक बुनियादी मामले पर विचार करते हैं और यह मानते हैं कि इस संघर्ष की तीव्र अवस्था कितने समय तक चल सकती है। हालांकि यह एक अनुमान ज्यादा है, न कि सटीक भविष्यवाणी।
हम इन देशों के लिए मुद्रास्फीति के अनुमान में भी बदलाव करेंगे और इसके प्रभाव को उनके चालू खाते पर देखेंगे। यह संकट सरकारी खजाने पर भी असर डाल सकता है क्योंकि एशिया के अधिकांश देशों की सरकारें ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी का बोझ कुछ हद तक अपने ऊपर ले सकती हैं। इसके अतिरिक्त, बैंकों और कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर भी इसका असर पड़ेगा।
जापान को छोड़कर इस क्षेत्र की अधिकांश प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं, उभरते बाजार की श्रेणी में आती हैं और जब निवेशक उभरते बाजारों के भविष्य की संभावनाओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं तब वे मुख्य रूप से चालू खाता घाटे पर ध्यान देते हैं। अगर घाटा बहुत बड़ा होता है तब यह मुद्रा अवमूल्यन का कारण बन सकता है जो जोखिम बढ़ा सकता है। इस तरह की संकट की स्थिति में उभरते बाजार के सामने यह भी जोखिम हो सकता है कि वे भुगतान संतुलन की समस्या में भी फंस सकते हैं।
हालांकि, विकसित अर्थव्यवस्थाएं जैसे जापान या दक्षिण कोरिया भले ही उभरती अर्थव्यवस्थाओं में गिनी जाती है लेकिन उनके लिए चालू खाता घाटा कम महत्त्वपूर्ण होता है क्योंकि इनके पास आधुनिक विनिर्माण क्षेत्र होते हैं और उनका व्यापार अधिशेष भी अधिक होता है। इसके बावजूद, संघर्ष शुरू होने के तुरंत बाद दक्षिण कोरिया के स्टॉक एक्सचेंज में तेज गिरावट देखी गई थी। शुरुआत में एशिया के अधिकांश उभरते बाजार वाले देशों की चालू खाता स्थिति काफी संतुलित थी।
संकट पर बाजार की प्रतिक्रिया का आकलन आप कैसे करते हैं?
वित्तीय बाजारों में ऊर्जा क्षेत्र में देखे जा रहे घटनाक्रम को लेकर एक तरह की आत्मसंतुष्टि की भावना है। शायद इसलिए कि हम इस प्रकार की स्थिति को एक पीढ़ी से ज्यादा समय से नहीं देख पाए हैं। वित्तीय बाजार, क्षेत्रीय संघर्षों से वाकिफ हैं जिनका वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर कोई महत्वपूर्ण असर नहीं होता। हालांकि, इस संकट से बढ़ी हुई मुद्रास्फीति, बाजारों के लिए एक मुद्दा बन सकती है क्योंकि इसका असर केंद्रीय बैंकों की मौद्रिक नीति पर पड़ेगा। भले ही प्रमुख केंद्रीय बैंक अधिक ऊर्जा कीमतों के कारण बढ़ी मुद्रास्फीति को कम करने के लिए ब्याज दरों में वृद्धि भले ही न करें लेकिन वे कटौती करने के लिए कम इच्छुक होंगे।
इस क्षेत्र में ऊर्जा संकट का उपभोक्ता मांग और निजी क्षेत्र के निवेश पर क्या असर पड़ेगा?
इस क्षेत्र की घरेलू अर्थव्यवस्थाएं अब भी काफी अच्छी रफ्तार से बढ़ रही हैं। यह बात भारत के लिए तो सही है ही, साथ ही अन्य उभरते बाजार देशों और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों पर भी लागू होती है। इसलिए, उपभोक्ता मांग में बहुत बड़े बदलाव की संभावना कम है। हालांकि, कॉरपोरेट निवेश पर इसका कुछ नकारात्मक असर पड़ सकता है और अगर यह संघर्ष लंबा चलेगा तो उसका प्रभाव उतना ही ज्यादा होगा। इसके अलावा, यह स्थिति इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि यह संकट ऐसे समय में आया है जब अमेरिका के व्यापार और टैरिफ को लेकर पहले से ही अनिश्चितता बनी हुई है।
भारत को खाड़ी देशों से भेजी जाने वाली रकम पर कितना असर पड़ेगा?
खाड़ी देशों से भेजी जाने वाली रकम (रेमिटेंस) पर असर इस बात पर निर्भर करेगा कि यह संघर्ष किस दिशा में जाता है। क्या कामगार और पेशेवर लोग अपने देश वापस लौटते हैं या नहीं, यह एक महत्वपूर्ण सवाल है। अब तक जो देखा गया है, उसके अनुसार अधिकतर अमीर प्रवासी ही अपने देश लौटे हैं जबकि सामान्य आय वाले कामगार और पेशेवर लोग वहीं बने हुए हैं। जब तक उनकी कंपनी उनका काम जारी रखती है और उन्हें वेतन मिलता रहता है, तब तक विदेश से भेजी जाने वाली रकम पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। लेकिन अगर यह संघर्ष लंबे समय तक चलता है और खाड़ी देशों की आर्थिक गतिविधियों में तेज गिरावट आती है तब स्थिति बदल सकती है और भेजी जाने वाली रकम पर नकारात्मक प्रभाव
पड़ सकता है।