बीएस बातचीत
आरबीआई द्वारा बैंकों में कॉरपोरेट प्रशासन बढ़ाए जाने पर पुनर्विचार किए जाने के साथ यह समय सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सरकारी हिस्सेदारी के लिए होल्डिंग कंपनी बनाने के प्रस्ताव पर फिर से ध्यान देने का है। सीआईआई और अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक होरासिस द्वारा भारत में आयोजित डिजिटल कॉन्फ्रेंस के अवसर पर येस बैंक के चेयरमैन सुनील मेहता ने अभिजित लेले और पवन लाल के साथ बातचीत में बैंक की रणनीति में बदलाव, बैंकिंग में कॉरपोरेट प्रशासन आदि पर बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश:
महामारी ने पूरे व्यावसायिक तंत्र को प्रभावित किया है और ऐसे में येस बैंक और उसके मॉडल में बदलाव की आपकी रणनीति क्या है?
इसमें कोई संदेह नहीं है कि हमें पिछले साल के शुरू में आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ा और यदि जीडीपी तथा तिमाही दर तिमाही रुझान को देखें तो पता चलता है कि सभी बैंकों के लिए प्रावधान कवरेज अनुपात (पीसीआर) बढ़ा है। लॉकडाउन के बाद और शुरुआती नरमी के बाद मासिक दर मासिक हमें यह समझने में मदद मिल रही है कि क्या करना है और फिलहाल नकदी पर ध्यान देना बेहद जरूरी है। इसे लेकर कोई आशंका नहीं है कि आर्थिक वृद्घि प्रभावित होगी। जब 13 मार्च को नया बोर्ड नियुक्त किया गया था तो मकसद तरलता, पूंजी पर्याप्तता था। अब तरलता को लेकर मजबूती आई है और खुदरा एवं संस्थागत ग्राहकों से नई जमाओं का प्रवाह तेज हुआ है।
क्या फंसे कर्ज किसी अन्य पक्ष को बेचने की योजना है?
हमने इस बारे में प्रबंधन को वैकल्पिक सुझाव सुझाने को कहा है, लेकिन मैं यह कह सकता हूं कि सब कुछ नियमन के अनुरूप हो तो बोर्ड के तौर पर हम इसका समाधान निकालने के लिए स्वतंत्र हैं।
व्यवसाय के लिए सेगमेंट के तौर पर रिटेल बैंकिंग को लेकर काफी उम्मीद थी। वर्तमान और भविष्य के लिए इसकी स्थिति कैसी रहेगी?
जहां तक येस बैंक का सवाल है तो इसकी रिटेल और डिजिटल रणनीति बेहद मजबूत रही है और हाल के वर्षों में इसने क्रेडिट कार्ड व्यवसाय में भी दस्तक दी है जो एक अच्छा पोर्टफोलियो है। व्यवसाय का रिटेल खंड अभी विकास कर रहा है और हमारी पिछली समस्याएं कॉरपोरेट से संबंधित थीं। जहां बाजार प्रतिस्पर्धी और चुनौतीपूर्ण है, वहीं विविधता के लिए नए क्षेत्र मौजूद हैं। येस बैंक की सेवा का मानक हमेशा से प्रतिस्पर्धी रहा है।
आरबीआई ने हाल में बैंकों में कॉरपोरेट प्रशासन पर चर्चा पत्र जारी किया है। इस बारे में आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
मेरा मानना है कि सुशासन का मूल हिस्सा ऋणदाता और कर्जदार दोनों से संबंधित है, खासकर बड़े व्यावसायिक खातों के संदर्भ में। सैद्घातिंक तौर पर हमें समय के साथ नियमों और प्रावधानों में बदलाव लाना होगा, क्योंकि अब एक दशक पहले जैसी स्थिति नहीं है। इसके अलावा सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र के बैंकों को समान रूप से ध्यान देने की जरूरत होगी, जैसा कि सभी वित्तीय संस्थान करते हैं। कई कॉरपोरेट प्रशासनिक समितियों ने पीएसयू के बजाय निजी क्षेत्र पर ज्यादा ध्यान दिया है। मेरी नजर में पीएसयू देश की प्रमुख आर्थिक परिसंपत्तियां हैं। एसबीआई के करीब 50 करोड़ खाताधारक, पीएनबी के 17 करोड़ खाते और 11,000 शाखाएं हैं। इसे महत्व दिए जाने की जरूरत होगी।
बैंकों के लिए कॉरपोरेट परिसंपत्तियों की घटती वैल्यू को किस तरह नियंत्रित किया जाएगा?
बैंकों को बड़े खातों पर ज्यादा ध्यान देना होगा और यह देखना होगा कि क्या कोविड-19 पूर्व स्थिति कैसी थी और बाद में क्या बदलाव आया है। कंपनियों और क्षेत्रों के संपूर्ण पुनर्गठन के साथ बाजार में बड़ा बदलाव आएगा और नए विकास परिदृश्य वाली कंपनियां होंगी और कुछ पर प्रभाव दिखेगा।