जेपी इन्फ्राटेक को पाने का मुकाबला बहुत नजदीक रहा। ऋणदाताओं की समिति (सीओसी) के 98.66 फीसदी मत सुरक्षा समूह की समाधान योजना के पक्ष में पड़े, जबकि सुरक्षा की प्रतिद्वंद्वी एनबीसीसी इंडिया की समाधान योजना को सीओसी के 98.54 फीसदी मत मिले।
दोनों योजनाओं के लिए अलग-अलग मतदान कराया गया। इनके नतीजों में मामूली अंतर से यह कयास लगाए जा रहे हैं कि एनबीसीसी इंडिया फिर अदालत जा सकती है। सभी बैंकों ने दोनों योजनाओं के पक्ष में मतदान किया, जबकि मकान मालिकों में से ज्यादातर ने सुरक्षा की योजना के पक्ष में मत दिया।
जेपी इन्फ्राटेक के 22,600 करोड़ रुपये के ऋण नहीं लौटा पाने के बाद इसे अगस्त, 2017 में आईबीसी (ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता), 2016 के तहत राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) में भेजा गया था। मगर तब से पूर्व प्रवर्तकों और मकान खरीदारों समेत विभिन्न हितधारकों की मुकदमेबाजी और सीओसी के पलटियां मारने से पूरी ऋण समाधान प्रक्रिया में देरी हुई है। इस कंपनी को खरीदने में पहले जेएसडब्ल्यू, वेदांत और अदाणी समूह ने रुचि दिखाई थी, लेकिन सभी ने देरी का हवाला देते हुए अपने कदम वापस खींच लिए। जेपी इन्फ्राटेक का दिल्ली-आगरा एक्सप्रेसवे और इसके दोनों तरफ की जमीन पर स्वामित्व है। आखिर में मुकाबला सुरक्षा और एनबीसीसी इंडिया के बीच था, जिनकी एक्सप्रेसवे परियोजना के दोनों तरफ की जमीन को विकसित करने में रुचि है। सुरक्षा समूह ने 7 जून को जेपी इन्फ्राटेक के लिए अपनी पेशकश 1,298 करोड़ रुपये बढ़ाकर 7,736 करोड़ रुपये कर दी थी। इसने जेपी के मकान खरीदारों के लिए जल्द मकान बनाने के लिए 300 करोड़ रुपये की अतिरिक्त अंतरिम रकम लाने का भी वादा किया था।
दूसरी तरफ सरकार के स्वामित्व वाली निर्माण कंपनी एनबीसीसी इंडिया ने सुरक्षा से 1,200 करोड़ रुपये कम की पेशकश की थी। इसकी पेशकश में वित्तीय ऋणदाताओं को 1,900 एकड़ वाली भूमि बैंक कंपनी की 100 फीसदी हिस्सेदारी भी शामिल थी, जिन्होंने समाधान योजना पर सहमति जताई थी। एनबीसीसी ने एक्सप्रेसवे एसपीवी (विशेष उद्देश्य इकाई) में 90 फीसदी हिस्सेदारी हस्तांतरित करने पर भी सहमति जताई थी, जिसमें यमुना एक्सप्रेसवे एवं जमीन के कंसेशन अधिकार भी शामिल थे।
इस पेशकश में एक्सप्रेसवे की 4,660 एकड़ जमीन और यमुना एक्सप्रेसवे के पास सुविधाएं विकसित करने के लिए 137.85 एकड़ वाणिज्यिक भूमि भी शामिल थी। एनबीसीसी ने 100 एकड़ अतिरिक्त भूमि की पेशकश की थी, जो पिछली देरी के लिए मकान खरीदारों को भुगतान के लिए रखी जानी थी।
इस पूरी प्रक्रिया में मकान खरीदार सबसे ज्यादा नुकसान में थे, जो अपने घरों की चाबी पाने के लिए 11 साल से अधिक समय से इंतजार कर रहे हैं।