facebookmetapixel
Advertisement
Iveco अधिग्रहण के साथ दुनिया की टॉप-4 CV कंपनियों में शामिल होने का टाटा मोटर्स का लक्ष्यDelhi EV Policy 2.0: पेट्रोल-डीजल वाहनों पर चरणबद्ध रोक; ऑटो कंपनियां चिंतितRBI के सख्त लोन नियमों से ब्रोकरों में खलबली, राहत के लिए वित्त मंत्री से मिला प्रतिनिधिमंडलApple ने CCI पर लगाया बड़ा आरोप, कहा: जांच में खुद रिसर्च करने के बजाय विरोधियों के दावे किए कॉपी-पेस्टपश्चिम एशिया संकट के बाद खुली सरकार की आंख, अब 40 दिनों की तेल खपत का स्टॉक रखने की तैयारी में भारतविदेश दौरे से लौटते ही एक्शन में प्रधानमंत्री मोदी, मंगलवार को केंद्रीय सचिवों के साथ करेंगे बड़ी बैठकUbharta Purvanchal: UP को $1 ट्रिलियन इकॉनमी बनाने में पूर्वांचल देगा रफ्तार, वाराणसी में जुटेंगे दिग्गज नीति निर्माताकर्नाटक गिग कर्मी कानून को हाईकोर्ट में चुनौती, जेप्टो, स्विगी और अर्बन कंपनी ने खटखटाया अदालत का दरवाजाजनधन और UPI से तो बढ़ा वित्तीय समावेशन, लेकिन शेयर बाजार व म्यूचुअल फंड की समझ में अभी भी देश पीछेकामकाज पूरी तरह बदलने को तैयार AI, एंथ्रोपिक की रिपोर्ट में खुलासा: एक साल में ज्यादातर काम संभाल लेगा

लंबी रेस के घोड़ों का मैदान

Advertisement
Last Updated- December 08, 2022 | 10:41 AM IST

इसमें दोराय नहीं कि आईटी और बीपीओ कंपनियों के रास्ते में साल कांटे ही रहेंगे।


इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि उद्योग का भट्ठा बैठ जाएगा या कंपनियों पर ताले लग जाएंगे।

दरअसल कारोबारी इजाफा तो 2009 में भी होगा, लेकिन आईटी कंपनियां 35 और 40 फीसदी की जिस आंकड़े के साथ इजाफा करने की आदी थीं, वह दौर अब नहीं दिखेगा। अगले साल बमुश्किल 15 फीसदी कारोबारी इजाफा ही दिखने की संभावना है।

रही सौदों की बात, तो कंपनियों को पुराने ग्राहकों से सौदे तो मिलेंगे, लेकिन अब नामी कंपनियों के लिए भी चुटकियों में सौदे हासिल करना आसान नहीं होगा। ग्राहक कंपनी चुनने में दिमाग लगाएगा।

मतलब साफ है, सौदों में देर होगी। अब आईटी कंपनियों को भी ग्राहकों पर ध्यान देना होगा, उनकी प्रतिष्ठा उन्हें सौदे नहीं दिलाएगी।

जो कंपनी ग्राहक के साथ बेहतर रिश्ते बनाएगी, उसे फायदा होगा। ग्राहक यह भी देखेगा कि किस कंपनी के साथ जुड़ने से उसे ज्यादा फायदा होगा। आप कह सकते हैं कि 2009 में मैदान लंबी रेस के घोड़ों का होगा यानी जिसमें ज्यादा क्षमता होगी, वही कंपनी टिक सकेगी।

विलय-अधिग्रहण से कंपनियां तौबा ही करेंगी क्योंकि कुछ के लिए तो अस्तित्व बचाने की नौबत तक आ जाएगी। यदि ऐसा होता भी है, तो कंपनी फूंक-फूंककर कदम रखेगी क्योंकि नकदी का संकट है।

कर्मचारियों की बात करें, तो छंटनी के पूरे आसार हैं और वेतन में इजाफा भी पहले की तरह नहीं होगा। कंपनियां पैसा बांटने में यथार्थवादी रवैया अपनाएंगी। जो काम करेगा, उसकी तनख्वाह बढ़ेगी, बाकी का वेतन शायद ही बढ़े।

अमेरिका में बराक ओबामा से भी भारतीय आईटी-बीपीओ को नुकसान नहीं होना चाहिए। सत्ता हासिल करने के रास्ते अलग होते हैं और उसे चलाने के अलग। अमेरिका के लिए मंदी में तो सस्ती आउटसोर्सिंग और जरूरी हो जाएगी। इसलिए मुझे नहीं लगता कि ओबामा सरकार से आने से आईटी कंपनियों पर फर्क पड़ेगा।

 (बातचीत :  ऋषभ कृष्ण)

Advertisement
First Published - December 21, 2008 | 11:49 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement