अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचने के बावजूद फिलहाल पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि नहीं की जाएगी। सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने आज इसकी जानकारी दी। ईरान युद्ध के बीच पश्चिम एशिया के तेल उत्पादकों द्वारा उत्पादन में कटौती करने और रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण होर्मुज स्ट्रेट के माध्यम से आपूर्ति बाधित होने से वैश्विक बाजार में कारोबार के दौरान कच्चा तेल119 डॉलर प्रति बैरल के उच्च स्तर पर पहुंच गया।
अधिकारी ने कहा कि सरकार वैश्विक तेल बाजारों पर नजर रख रही है लेकिन खुदरा ईंधन की कीमतों में तत्काल वृद्धि की कोई योजना नहीं है। तेल मार्केटिंग कंपनियां फिलहाल मौजूदा लागत दबाव को वहन करने में सक्षम हैं।
जून 2022 के बाद ब्रेंट क्रूड का यह उच्चतम स्तर है। 2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर हमला करने के बाद कच्चा तेल 127 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। जुलाई 2008 में वैश्विक वित्तीय संकट के समय ब्रेंट क्रूड 147 डॉलर प्रति बैरल के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया था। हालांकि जी7 देशों द्वारा वैश्विक तेल भंडार से समन्वित तरीके से आपूर्ति करने के बारे में बातचीत के मद्देनजर बाद में ब्रेंट क्रूड का दाम थोड़ा नरम होकर 103 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया।
तेल की ऊंची कीमतों ने भारत के लिए तेल आयात बिल बढ़ाने, पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों और मुद्रास्फीति पर इसके प्रभाव के बारे में चिंता बढ़ा दी है। तेल महंगा होने से देश का चालू खाता घाटा भी बढ़ने की आशंका है।
इस बीच पश्चिम एशिया में संकट से एलपीजी की आपूर्ति पर असर पड़ा है। पिछले सप्ताह एलपीजी के दाम में भी इजाफा किया गया था। सूत्रों ने बताया कि जमाखोरी को रोकने के लिए एलपीजी सिलिंडर बुकिंग की न्यूनतम प्रतीक्षा अवधि बढ़ाकर 25 दिन कर दी गई है।
विशेषज्ञों ने कहा कि अगर वित्त वर्ष 2027 में कच्चा तेल औसतन 110 से 115 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहता है तो भारत के तेल आयात बिल में सालाना 56 अरब से 64 अरब डॉलर तक की बढ़त हो सकती है।
इक्रा की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, ‘कच्चे तेल की औसत कीमत में प्रत्येक 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से शुद्ध तेल आयात बिल में 14 से 16 अरब डॉलर की वृद्धि होती है। यदि वित्त वर्ष 2027 में तेल की कीमत औसतन 110 से 115 डॉलर प्रति बैरल तक जाती है तो तेल आयात बिल में 56 से 64 अरब डॉलर तक का इजाफा हो सकता है।’
नायर ने कहा कि इसी तरह कच्चे तेल की औसत कीमत में प्रत्येक 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से चालू खाता घाटा भी 30 से 40 आधार अंक बढ़ जाता है, वहीं थोक मुद्रास्फीति में 80 से 100 आधार अंक और खुदरा मुद्रास्फीति में 40 से 60 आधार अंक का इजाफा होता है।
इक्रा की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने कहा, ‘कुल मिलाकर कच्चे तेल की कीमतों में लगातार वृद्धि से वित्त वर्ष 2027 के लिए इ्रका के थोक मुद्रास्फीति के 2.7 फीसदी और खुदरा मुद्रास्फीति के 4 फीसदी के अनुमान को जोखिम हो सकता है।’ उन्होंने कहा कि ईंधन की कीमतों में वृद्धि से परिवहन लागत में भी वृद्धि होगी, जिससे वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ जाएंगी और दूसरे चरण का प्रभाव पैदा होगा।
भारत ने वित्त वर्ष 2025 में 137 अरब डॉलर की लागत पर 24.3 करोड़ टन कच्चे तेल का आयात किया। चालू वित्त वर्ष में अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 के बीच 100 अरब डॉलर मूल्य का 20.6 करोड़ टन कच्चा तेल आयात किया गया। फरवरी के अंत में ईरान युद्ध शुरू होने से पहले, भारत ने जनवरी में 9.5 अरब डॉलर की लागत पर 2.1 करोड़ टन कच्चे तेल का आयात किया और उस समय ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत 66 डॉलर प्रति बैरल थी।
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 85 फीसदी से अधिक आयात करता है जिससे तेल की कीमतें अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़े बाहरी जोखिमों में से एक हैं। डीएसपी म्युचुअल फंड ने एक रिपोर्ट में कहा है, ‘अगर कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर 120 डॉलर प्रति बैरल हो जाती हैं तो भारत का तेल व्यापार घाटा बढ़कर 220 अरब डॉलर हो सकता है, जिससे चालू खाता घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3 फीसदी से अधिक हो सकता है और रुपये पर भी दबाव बढ़ सकता है।’
इस बीच अमेरिका के ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने एक साक्षात्कार में कहा कि अमेरिका ने भारत से समुद्र में अटके रूसी तेल को खरीदने और आपूर्ति की कमी और कीमतों में उछाल की आशंका को कम करने का आग्रह किया है।