स्थानीय किराने की दुकानों में अब लोकप्रिय ट्रेडमार्क वाले उत्पादों की भरमार दिखने लगी है। हालांकि कुछ महीने पहले ऐसी स्थिति नहीं थी। लॉकडाउन के शुरुआती महीनों यानी मार्च और अप्रैल के दौरान फूड एवं एफएमसीजी क्षेत्र में तमाम छोटे और स्थानीय ब्रांड उभरकर सामने आए थे। उस दौरान आपूर्ति शृंखला बाधित होने के कारण बड़े ब्रांडों की आपूर्ति घट गई थी। ऐसे में छोटे एवं स्थानीय ब्रांडों ने उस खाई को पाटने की कोशिश की थी जिससे बाजार में उनकी मौजूदगी मौजूदगी बढऩे साथ-साथ बिक्री भी काफी हो रही थी।
हालांकि अब स्थिति बदल गई है। बाजार अनुसंधान एजेंसी नीलसन के एफएमसीजी सूचकांक से पता चलता है कि अगस्त में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय ब्रांडों के बीच का अंतर अब 9 अंकों तक सीमित रह गया है। बड़े और लोकप्रिय ब्रांड अब आपूर्ति शृंखला संबंधी बाधाओं, वितरकों की चुनौतियों और खुदरा विक्रेताओं की समस्या जैसे मुद्दों से निपट चुके हैं।
नीलसन का कहना है कि पिछले कुछ महीनों के दौरान बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय और क्षेत्रीय ब्रांडों के बीच संघर्ष दिख रहा था। मार्च से अप्रैल की अवधि में उनके बीच का अंतर करीब 11 अंकों का था। उस दौरान देशव्यापी लॉकडाउन के कारण बड़े ब्रांडों को अपना परिचालन अस्थायी तौर पर निलंबित करना करना पड़ा था।
मई में यह अंतर घटकर 8 अंक रह गया क्योंकि उस दौरान राष्ट्रीय ब्रांडों ने अपने परिचालन को सुचारु किया था। लेकिन जुलाई में जब देश के विभिन्न भागों में स्थानीय लॉकडाउन लगाया गया तो यह अंतर बढ़कर दोबारा 11 अंकों पर पहुंच गया। स्थानीय लॉकडाउन के कारण कई कंपनियों का कारोबार प्रभावित हुआ।
नीलसन ग्लोबल कनेक्ट के कार्यकारी निदेशक (रिटेल इंटेलिजेंस- दक्षिण एशिया) समीर शुक्ला ने कहा, ‘तमाम रस्साकशी के बावजूद बुनियादी रुझान यह दिख रहा है कि बड़े ब्रांड अब छोटे ब्रांडों के साथ मौजूद अंतर को पाट रहे हैं। यह रुझान ऐसे समय में दिख रहा है जब पिछले कुछ महीनों के दौरान हुए व्यवधान के बाद परिचालन सामान्य होने लगा है। राष्ट्रीय ब्रांडों ने वितरण और बाजार में अपनी उपस्थिति दोनों मोर्चे पर उल्लेखनीय वृद्धि की है। कई कंपनियां अपने उत्पादों की ग्रामीण क्षेत्रों में आक्रामक तरीके से आपूर्ति कर रही हैं क्योंकि वहां उन्हें वृद्धि के अच्छे अवसर दिख रहे हैं।’
शुक्ला ने कहा कि छोटे ब्रांडों के लिए अपनी पहुंच और उपस्थिति बढ़ाने की सीमाएं हैं। जाहिर तौर पर बड़े ब्रांडों को इसका फायदा मिलता है।
बजाज कंज्यूमर के निदेशक सुमित मल्होत्रा ने कहा, ‘छोटी कंपनियों के पास नए क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति बढ़ाने के लिए पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं है। इनमें से कुछ कंपनियों को नकदी किल्लत जैसी समस्याओं से भी जूझना पड़ता है। ऐसे में उनकी पहुंच सीमित हो जाती है।’
एफएमसीजी क्षेत्र के वरिष्ठ अधिकारियों और विशेषज्ञों ने भी इसका समर्थन किया। पारले प्रोडक्ट्स के वरिष्ठ श्रेणी प्रमुख मयंक शाह ने कहा, ‘पिछले कुछ महीनों के दौरान एफएमसीजी बाजार में काफी उतार-चढ़ाव देखा गया है। बड़े ब्रांडों को देशव्यापी लॉकडान के कारण झटका लगा लेकिन अब उन्होंने जोरदार वापसी की है।’ शाह ने कहा कि फिलहाल यह प्रवृत्ति जारी रहेगी क्योंकि बड़ी कंपनियां न केवल ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति बढ़ा रही हैं बल्कि उपभोक्ताओं के बीच विश्वसनीय ब्रांडों का आकर्षण भी बढ़ा है।
ब्रोकरेज फर्म शेयरखान के सहायक उपाध्यक्ष (अनुसंधान) कौस्तुभ पावसकर ने कहा कि संकट के समय में विश्वसनीय ब्रांड के प्रति ग्राहकों का झुकाव अधिक होता है। उन्होंने कहा, ‘उपभोक्ता उन ब्रांडों की ओर रुख करेंगे जो दमदार तरीके से अपनी वापसी करेंगे और ग्राहकों का भरोसा जीतेंगे, विशेष तौर पर स्वास्थ्य संकट के दौरान। राष्ट्रीय कंपनियों की रणनीति गुणवत्ता मानकों को मजबूत बनाने और अपनी पैठ बेहतर करने की होगी।’ हालांकि पारले प्रोडक्ट्स, ब्रिटानिया और यहां तक कि अमूल ब्रांड के तहत कारोबार करने वाली कंपनी गुजरात सहकारी दुग्ध विपणन संघ (जीसीएमएमएफ) ने घरों में खपत बढऩे के कारण अप्रैल से जून की अवधि में दमदार वृद्धि दर्ज की हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन कंपनियों को खपत में वृद्धि का लाभ उठाने के लिए अनुशासित दृष्टिकोण अपनाना पड़ा।