प्रमुख इंजीनियरिंग कंपनी लार्सन ऐंड टुब्रो (एलऐंडटी) स्वच्छ एवं पर्यावरण के अनुकूल ऊर्जा (ग्रीन एनर्जी) के क्षेत्र में उभरते अवसरों को भुनाने के लिए एक रूपरेखा तैयार की है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें रिलायंस इंडस्ट्रीज और अदाणी समूह सहित विभिन्न उद्योग घरानों की काफी दिलचस्पी दिख रही है।
एलऐंडटी अगले 3-4 वर्षों में ग्रीन हाइड्रोजन सहित अक्षय ऊर्जा में 2.5 अरब डॉलर यानी करीब 20,000 करोड़ रुपये का निवेश करेगी। इस निवेश से कंपनी को ईंधन उत्पादन से लेकर इलेक्ट्रोलाइजर एवं उन्नत सेल बैटरी जैसे महत्त्वपूर्ण उपकरणों के विनिर्माण के लिए इस क्षेत्र में इंजीनियरिंग, खरीद एवं निर्माण (ईपीसी) परियोजनाओं की पूरी मूल्य श्रृंखला को कवर करने में मदद मिलेगी।
कंपनी के अधिकारियों ने कहा कि इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी) और रीन्यू पावर के साथ अप्रैल में हस्ताक्षरित संयुक्त उद्यम समझौते से अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। एक प्रमुख घटक इलेक्ट्रोलायर के उत्पादन के लिए इंडियन ऑयल के साथ एक अन्य संयुक्त उद्यम समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं।
एलऐंडटी के पूर्णकालिक निदेशक एवं वरिष्ठ कार्यकारी उपाध्यक्ष (ऊर्जा) सुब्रमण्यन सरमा ने कहा, ‘हम अपने अक्षय ऊर्जा पोर्टफोलियो में 3 से 4 वर्षों के दौरान 2.5 अरब डॉलर का निवेश करेंगे। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि बाजार किस प्रकार विकसित होता है।’
कंपनी ने 2035 और 2040 तक क्रमशः जल और कार्बन न्यूट्रैलिटी लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अपनी विनिर्माण एवं निर्माण इकाइयों में अक्षय ऊर्जा के उपयोग के लिए 5,000 करोड़ रुपये निर्धारित किए थे जो इस निवेश में भी शामिल हैं।
कंपनी ने अपतटीय विंड फार्म पर ध्यान केंद्रित करने के लिए 15 से 20 वरिष्ठ कर्मचारियों की एक कोर टीम भी बनाई है। भारत की लंबी तटवर्ती रेखा को देखते हुए भविष्य में गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों के दोहन के लिए अपतटीय विंड फार्म के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है। इस क्षेत्र की प्रमुख कंपनियों में सीमेंस गेम्सा, सुजलॉन, जीई और वेस्टास शामिल हैं।
कंपनी ने गुजरात के हजीरा 25 करोड़ रुपये के निवेश से एक ग्रीन हाइड्रोजन संयंत्र की स्थापना की है। इसकी क्षमता रोजाना 45 किलोग्राम ईंधन के उत्पादन की होगी। इसके साथ ही कंपनी ने अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में पहली बड़ी छलांग लगाई है। कंपनी ऐसे अन्य संयंत्र स्थापित करने के लिए सीमेंट एवं इस्पात विनिर्माताओं और रिफाइनरियों के साथ-साथ एक दर्जन से अधिक कंपनियों से बात कर रही है।
इस महीने के आरंभ में संसद में पारित ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) विधेयक 2022 से भी व्यापक स्तर पर ग्रीन हाइड्रोजन की आवश्यकता महसूस होगी। इसके तहत औद्योगिक गतिविधि के लिए गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों के उपयोग को अनिवार्य किया गया है और इसके उल्लंघन करने वालों को दंडित करने का प्रावधान है।
फिलहाल अधिकतर कंपनियां- सीमेंट एवं धातुओं से लेकर पेट्रोकेमिकल्स तक- अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए बड़े पैमाने पर ताप बिजली अथवा जीवाश्म ईंधन आधारित स्रोतों पर निर्भर हैं।
उद्योग के अनुमानों के अनुसार, 2030 तक बड़ी निर्माण कंपनियां अपनी 20 से 25 फीसदी कैप्टिव ऊर्जा जरूरतों को अक्षय ऊर्जा स्रोतों से पूरा करेंगी।
जेएसडब्ल्यू स्टील के चेयरमैन सज्जन जिंदल ने ताजा वार्षिक रिपोर्ट में कहा है कि कंपनी ने अगले कुछ वर्षों में अपनी विनिर्माण इकाइयों में अक्षय ऊर्जा के उपयोग को बढ़ाने के लिए 10,000 करोड़ रुपये का निवेश करेगी। हिंदुस्तान जिंक अगले पांच वर्षों में अपने खनन कार्यों को पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए लगभग 8,000 करोड़ रुपये का निवेश करेगी। अल्ट्राटेक ने 2050 तक अपनी शत प्रतिशत बिजली जरूरतों को अक्षय ऊर्जा से पूरा करने की योजना बनाई है।