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नए लेबर कोड से बदलेगा वर्क कल्चर, 75% कंपनियों में बढ़ेंगी फिक्स्ड-टर्म कॉन्ट्रैक्ट वाली नौकरियां: सर्वे

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सर्वे के मुताबिक नए लेबर कोड लागू होने के बाद लिखित कॉन्ट्रैक्ट वाली नौकरियां बढ़ सकती हैं। कंपनियां नए वेज और पेरोल नियम अपनाकर रोजगार व्यवस्था को ज्यादा पारदर्शी बना रही हैं

Last Updated- March 15, 2026 | 6:23 PM IST
Labour Codes
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

देश में नए लेबर कोड लागू होने के बाद कंपनियां अपने कर्मचारियों को ज्यादा औपचारिक तरीके से रखने की ओर बढ़ रही हैं। एक ताजा सर्वे के मुताबिक करीब 75 फीसदी कंपनियों का मानना है कि स्ट्रक्चर्ड फिक्स्ड-टर्म एम्प्लॉयमेंट, यानी तय अवधि के लिखित कॉन्ट्रैक्ट वाली नौकरियां आने वाले समय में काफी बढ़ेंगी।

यह जानकारी HR सॉल्यूशंस कंपनी Genius HRTech की एक रिपोर्ट में सामने आई है। कंपनी ने जनवरी 2026 में देशभर के अलग-अलग सेक्टर की 1,459 कंपनियों से बात करके यह सर्वे किया था। रिपोर्ट के अनुसार नए लेबर कोड्स लागू होने के बाद कंपनियां ज्यादा पारदर्शी, कानूनी तौर पर सही और लिखित रोजगार व्यवस्था की ओर बढ़ रही हैं।

नए कोड्स कब और क्यों आए?

नवंबर 2025 में केंद्र सरकार ने 29 पुराने श्रम कानूनों को मिलाकर चार बड़े लेबर कोड बना दिए। इनमें वेज कोड, इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड, सोशल सिक्योरिटी कोड और ऑक्यूपेशनल सेफ्टी कोड शामिल हैं। इनका मकसद नियमों को आसान बनाना, उन्हें आधुनिक करना और कामगारों के जीवन को बेहतर करना है।

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कंपनियां कितनी तैयार हैं?

सर्वे में जब कंपनियों से पूछा गया कि वे चारों लेबर कोड लागू करने के लिए कितनी तैयार हैं, तो सिर्फ 40 फीसदी ने कहा कि वे पूरी तरह तैयार हैं। 22 फीसदी कंपनियों ने खुद को आंशिक रूप से तैयार बताया, 17 फीसदी अभी शुरुआती तैयारी में हैं, जबकि 21 फीसदी ने अब तक इस दिशा में कोई कदम ही नहीं उठाया है। यानी बड़ी संख्या में कंपनियां अभी भी तैयारी के मामले में पीछे हैं।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि 46 फीसदी कंपनियों ने अभी तक HR, पेरोल और कंप्लायंस सिस्टम में गैप एनालिसिस यानी कमियों का आकलन शुरू ही नहीं किया है। सिर्फ 18 फीसदी कंपनियां यह प्रक्रिया पूरी कर चुकी हैं, 21 फीसदी इस पर काम कर रही हैं और 15 फीसदी अभी इसकी योजना बना रही हैं। इससे संकेत मिलता है कि कई कंपनियां भले ही खुद को तैयार मान रही हों, लेकिन सिस्टम स्तर पर उनकी तैयारी अभी अधूरी है।

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वेज कोड का सबसे ज्यादा असर

नए लेबर कोड्स में सबसे बड़ा असर कोड ऑन वेजेस का पड़ने वाला है। सर्वे में 67 फीसदी कंपनियों ने कहा कि यही कोड उनके कामकाज पर सबसे ज्यादा प्रभाव डालेगा। इसके तहत मजदूरी की परिभाषा बदल सकती है, पेरोल सिस्टम में बदलाव करना पड़ेगा और कंप्लायंस को भी नए सिरे से सेट करना होगा। इससे कंपनियों के खर्च के ढांचे पर भी असर पड़ सकता है। फिलहाल सिर्फ 39 फीसदी कंपनियां ही अपने वेज स्ट्रक्चर को नए नियमों के मुताबिक पूरी तरह ढाल पाई हैं।

हालांकि, लंबे समय के नजरिए से ज्यादातर कंपनियां इसे पॉजिटिव मान रही हैं। करीब 60 फीसदी का कहना है कि नए लेबर कोड भारत में रोजगार को ज्यादा औपचारिक बनाने और कंप्लायंस मजबूत करने में मदद करेंगे।

Genius HRTech के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर RP यादव के मुताबिक यह कंपनियों के लिए एक बड़ा रणनीतिक बदलाव है। इसके तहत वेज स्ट्रक्चर, सोशल सिक्योरिटी और वर्कफोर्स मॉडल को नए सिरे से तैयार करना होगा। उनका कहना है कि जो कंपनियां जल्दी कदम उठाएंगी, वे ज्यादा मजबूत, नियमों के मुताबिक और भविष्य के लिए ज्यादा तैयार होंगी, बशर्ते वे लागत और व्यावहारिक पहलुओं के बीच सही संतुलन बनाए रखें।

(PTI के इनपुट के साथ)

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First Published - March 15, 2026 | 6:23 PM IST

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