उद्योग जगत ने सरकार से आग्रह किया है कि भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्रों (एसईजेड) में निर्मित वस्तुओं को घरेलू बाजार में शून्य शु्ल्क या चीन से आयातित माल व अन्य मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के भागीदार देशों के माल को प्राप्त रियायती शुल्क की तरह बेचने की अनुमति दी जाए।
इस अनुरोध के पीछे तर्क यह है कि घरेलू बाजार में चीन या एफटीए भागीदार देशों के समान दर पर उचित बिक्री की सुविधा उपलब्ध कराई जाए। दरअसल, भारतीय एसईजेड में विनिर्माण इकाइयां स्थापित करने वाले वैश्विक निवेशकों को भारतीय बाजार में आपूर्ति पर पूरा सीमा शुल्क देना पड़ता है जबकि इन्हीं वस्तुओं को विदेशों से शून्य या रियायती शुल्क पर आयात किया जा सकता है।
ऐसे में कई बार तो निवेशक अन्य देशों में स्थित अपने ही कारखानों से आयात कर सकते हैं। लिहाजा इस आसान पहुंच से न केवल स्थानीय विनिर्माण को प्रोत्साहन मिलेगा, बल्कि एसईजेड इकाइयों की कमियां भी दूर होंगी।
उद्योग जगत ने सरकार से यह भी अनुरोध किया है कि आयातित इनपुट पर शुल्क हटाने के बाद कपड़ा, चमड़ा, जूते जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों के साथ-साथ रक्षा, अंतरिक्ष और सरकारी एजेंसियों को उच्च-प्रौद्योगिकी आपूर्ति जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में विशेष आर्थिक क्षेत्र इकाइयों को घरेलू बाजार में बिक्री करने की अनुमति दी जाए।
निर्यात-उन्मुख इकाइयों व एसईजेड की निर्यात संवर्धन परिषद (ईपीसीईएस) ने वित्त और वाणिज्य व उद्योग मंत्रालयों को लिखित निवेदन प्रस्तुत किया है। यह निवेदन केंद्रीय बजट में विशेष आर्थिक क्षेत्र से देश के शेष हिस्सों में रियायती शुल्क पर माल बेचने की अनुमति देने की घोषणा के बाद आया है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने विशेष आर्थिक क्षेत्र की पात्र विनिर्माण इकाइयों को घरेलू बाजार में रियायती शुल्क पर अपना माल बेचने की अनुमति देने के लिए एक बार के उपाय की घोषणा की थी। हालांकि ऐसी बिक्री की मात्रा उनके निर्यात के निश्चित अनुपात तक सीमित होगी। इससे यह तय होगा कि पर्याप्त सुरक्षा उपाय लागू हों और घरेलू शुल्क क्षेत्र (डीटीए) में कार्यरत इकाइयों को कोई नुकसान न हो। यह कदम एक बार लागू हो जाएगा तो विशेष आर्थिक क्षेत्रों की बेकार पड़ी क्षमता का इस्तेमाल हो सकेगा। साथ ही यह निर्यात बाजार की अनिश्चितता और मांग पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव पर भी नजर रखेगी।