प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
भारत का चाय निर्यात रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया है। यह उछाल ईरान व इराक से मजबूत खरीद के साथ चीन से मांग बढ़ने के कारण आई है। भारतीय चाय बोर्ड के अस्थायी आंकड़ों से पता चलता है कि भारत ने वर्ष 2025 में (जनवरी-दिसंबर) 2,804 लाख किलोग्राम चाय का निर्यात किया जबकि यह उससे पिछले साल की समान अवधि में निर्यात 2,561.7 लाख किलोग्राम था। निर्यात से आय जनवरी-दिसंबर 2024 के 7,167.41 करोड़ रुपये से बढ़कर जनवरी दिसंबर 2025 में 8,488.43 करोड़ रुपये हो गई थी।
उद्योग से प्राप्त देश-वार निर्यात आंकड़ों से यूएई, इराक और चीन को होने वाले निर्यात में तेज उछाल दिखा है जबकि रूस और अमेरिका की खरीद में गिरावट देखी गई। टी बोर्ड के डिप्टी चेयरपर्सन सी मुरुगन ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया, ‘यह भारत से चाय के निर्यात का उच्चतम स्तर है और इस उपलब्धि के लिए निर्यातक बधाई के पात्र हैं।’
एशियन टी कंपनी के निदेशक मोहित अग्रवाल ने कहा कि भारत की चाय निर्यात 28 करोड़ किलोग्राम के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया। उन्होंने कहा, ‘टी बोर्ड के नेतृत्व में निर्यातकों ने सोच समझकर जोखिम उठाया। उन्होंने मध्य पूर्व एशिया के बाजार – ईरान, इराक और तुर्की में अपनी पैठ बढ़ाई। इस क्रम में भारतीय निर्यातकों ने इस क्षेत्र की राजनीतिक स्थिति में उथल-पुथल होने के बावजूद निर्यात किया।’
लाभ पारंपरिक चाय के निर्यात से हुआ है जबकि सीटीसी चाय का निर्यात स्थिर रहा है। अग्रवाल ने बताया, ‘असम की पारंपरिक चाय के कारण प्रमुख तौर पर वृद्धि हुई।’
आंकड़ों से पता चलता है कि जनवरी दिसंबर 2025 में इराक को निर्यात 525.9 लाख किलोग्राम था जबकि वर्ष 2024 की इस अवधि में 404.7 लाख किलोग्राम चाय का निर्यात हुआ था। यूएई को चाय का निर्यात 2025 में बढ़कर 507.1 लाख किलोग्राम हो गया था जबकि यह बीते वर्ष 434.8 लाख किलोग्राम था। ईरान को 2025 में 112.5 लाख किलोग्राम चाय का निर्यात हुआ जबकि 2024 में 92.5 लाख किलोग्राम चाय का निर्यात हुआ। ईरान को ज्यादातर चाय यूएई के जरिए भेजी गई थी। यूएई एक प्रमुख निर्यात केंद्र है।
निर्यात के मामले से सबसे बड़ा आश्चर्य चीन था – भारत का चाय निर्यात जनवरी से दिसंबर 2025 के दौरान 161.3 लाख किलोग्राम था जबकि 2024 की अवधि में 62.4 लाख किलोग्राम था।
मुरुगन ने बताया कि जब अमेरिका ने पारस्परिक और दंडात्मक शुल्क लगाए तो निर्यातकों ने गैर-पारंपरिक बाजारों की ओर रुख किया। उन्होंने कहा, ‘अमेरिका में गिरावट की भरपाई चीन ने की। निर्यातकों ने अपना शोध किया, चीन को अवसर के रूप में पहचाना और चीनी दूतावास बहुत सक्रिय था।’