सरकार ने डाउनस्ट्रीम कंपनियों में विदेशी निवेश की गणना आसान बनाने के लिए अब विभिन्न श्रेणियों को समाप्त करने का फैसला किया है।
ऐसा करने से अब विदेशी प्रत्यक्ष निवेश, विदेशी संस्थागत निवेश, अनिवासी भारतीयों द्वारा किया जाने वाला निवेश, अमेरिकन डिपोजिटरी रिसीट के जरिये जुटाए गए धन, ग्लोबल डिपोजिटरी रिसीट, विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बॉन्ड, परिवर्तनीय तरजीही शेयरो और करेंसी डिबेंचर सभीको विदेशी निवेश की श्रेणी में रखा जाएगा।
माना जा रहा है कि सरकार के इस निर्णय से भारतीय कंपनियों में विदेशी निवेश का स्तर बढ़ेगा। इससे इन कंपनियों को विदेशी निवेशकों, खासकर सीमित विदेशी निवेश की सीमा वाले क्षेत्रों में, से संसाधन जुटाने में काफी सहूलियत होगी।
यह कदम विदेशी कंपनियो को मल्टी-ब्रांड रिटेल जैसे प्रतिबंधित क्षेत्रों में प्रवेश करने की भी अनुमति देगा। इसके अलावा विदेशी कंपनियों को मीडिया जैसे क्षेत्रों में भी अपना निवेश बढ़ाने का मौका मिलेगा जहां फिलहाल विदेशी निवेश पर एक सीमा तय है।
सरकार ने इस संदर्भ में एक प्रेस नोट तैयार किया है जिसे जल्द ही जारी कर दिए जाने की संभावना है। मौजूदा समय में विदेशी निवेश की गणना करने के दौरान कुछ क्षेत्र विदेशी प्रत्यक्ष निवेश और विदेशी संस्थागत निवेश के बीच भेद करते हैं।
बैंकिंग और डायरेक्ट-टु-होम प्रसारण सेवाएं जैसे क्षेत्र विदेशी निवेश की गणना दोनों स्वरूपों को ध्यान में रख कर करते हैं। लेकिन इस मामले में परिसंपत्ति पुनर्निर्माण जैसे क्षेत्रों में सिर्फ प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ही शामिल है। नए मानकों के तहत विदेशी निवेश की गणना के दौरान विदेशी निवेश के सभी स्वरूप शामिल होंगे।
प्रेस नोट में यह भी कहा गया है कि भारतीय कंपनियों द्वारा डाउनस्ट्रीम निवेश को नए मानकों के तहत नहीं लाया जाएगा। इस डाउनस्ट्रीम निवेश में भारतीयों का 51 फीसदी से अधिक का निवेश शामिल है और इसके अलावा बोर्ड में नियुक्ति को लेकर भी भारतीयों को अधिक अधिकार हासिल हैं।
प्राइसवाटरहाउसकूपर्स के कार्यकारी निदेशक केतन दलाल ने कहा, ‘यदि किसी कंपनी का नियंत्रण और मालिकाना हक भारतीयों के हाथ में है तो डाउनस्ट्रीम निवेश को किसी भी तरह से विदेशी निवेश नहीं माना जाएगा।’
कई विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रेस नोट में कुछ बातों पर स्पष्ट रूप से जिक्र नहीं किया गया है, जिन पर प्रकाश डाले जाने की जरूरत है।
एक निवेश विश्लेषक ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि इस प्रेस नोट में जिन बातों को पूरी तरह स्पष्ट नहीं किया गया है, उनमें एक है भारतीय और विदेशी कंपनी के बीच समान भागीदारी वाली साझा उपक्रम कंपनी द्वारा किया गया निवेश।
दूसरी, इसमें यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि भारतीय और विदेशी निवेशक की भागीदारी वाली कंपनी में निदेशकों की नियुक्ति का अधिकार किसके पास होगा?