भारतीय उद्योग जगत की आय पर दबाव के आसार

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 12, 2022 | 7:37 AM IST

ब्याज दरों और जिंस कीमतों में ताजा तेजी ने न सिर्फ निफ्टी-50 के ऊंचे मूल्यांकन को लेकर सवाल पैदा किए हैं बल्कि इससे भारत की प्रमुख कंपनियों के मुनाफे पर भी दबाव पड़ सकता है।
पिछली कुछ तिमाहियों में कॉरपोरेट आय में वृद्घि काफी हद तक कम परिचालन एवं वित्तीय लागत की वजह से दर्ज किए गए ऊंचे मार्जिन के कारण आई थी।
वित्त वर्ष 2021 की तीसरी तिमाही मेंनिफ्टी-50 कंपनियों का एबिटा मार्जिन सालाना आधार पर करीब 240 आधार अंक तक बढ़ा था जबकि कर-पूर्व लाभ (पीबीटी) मार्जिन करीब 200 आधार अंक बढ़ा, क्योंकि कंपनियों ने कच्चे माल, ऊर्जा और ब्याज खर्च के संदर्भ में बचत दर्ज की।
ऊंचे मार्जिन सेतिमाही के दौरान सपाट राजस्व की भरपाई हुई। सूचकांक कंपनियों का संयुक्त परिचालन लाभ 9.7 प्रतिशत तक बढ़ा, जबकि उनके पीबीटी और पीएटी में तिमाही के दौरान 25.7 प्रतिशत तथा 24.5 प्रतिशत तक का इजाफा दर्ज किया गया।
तुलनात्मक तौर पर, तीसरी तिमाही के दौरान सूचकांक कंपनियों की कच्चे माल और ऊर्जा संबंधित लागत में सालाना आधार पर 6.7 प्रतिशत की कमी आई, जबकि उनकी ब्याज लागत समान तिमाही में 4.3 प्रतिशत नीचे आई।
वाणिज्यिक बैंकों और हाउसिंग डेवलपमेंट ऐंड फाइनैंस कॉरपोरेशन (एचडीएफसी) जैसे गैर-बैंकिंग ऋणदाता महामारी के बाद ब्याज लागत में भारी कमी के सबसे बड़ी लाभार्थी थे।
देश के प्रमुख आठ ऋणदाताओं (जो निफ्टी-50 सूचकांक का हिस्सा हैं) की संयुक्त वित्त लागत  तीसरी तिमाही में सालाना आधार पर 8.2 प्रतिशत नीचे आ गई, जबकि वित्त वर्ष 2021 की दूसरी तिमाही में यह 4.5 प्रतिशत थी और उसने 2020 की अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में 6.6 प्रतिशत की वृद्घि दर्ज की थी।
तुलनात्मक तौर पर, ऋणदाताओं की कुल ब्याज आय सालाना आधार पर 6.1 प्रतिशत बढ़ी, जबकि उनका कुल राजस्व (शुल्क आय समेत) तिमाही के दौरान सालाना आधार पर 6.9 प्रतिशत बढ़ा। वित्तीय लागत पर बचत से ऋणदाताओं को कर्मचारी एवं अन्य खर्च में दो अंक की वृद्घि के बावजूद शुद्घ लाभ में 8.9 प्रतिशत का इजाफा दर्ज करने में मदद मिली।
बैंक और गैर-वित्त कंपनियां निफ्टी-50 की सबसे बड़ी घटक हैं और वित्त वर्ष 2021 की तीसरी तिमाही में सूचकांक कंपनियों के शुद्घ लाभ में इनका करीब एक-चौथाई योगदान रहा।
बॉन्ड और जिंस बाजारों में ताजा घटनाक्रम से इनके लाभ पर दबाव पैदा होता दिख रहा है और इससे आगामी तिमाही में भारतीय उद्योग जगत की आय प्रभावित हो सकती है।
नारनोलिया सिक्योरिटीज के मुख्य निवेश अधिकारी शैलेंद्र कुमार ने कहा, ‘ऊंचे बॉन्ड प्रतिफल का कॉरपोरेट उधारी लागत पर कम प्रभाव पडऩे की आशंका है, लेकिन मुझे बड़ा प्रभाव ऊंची जिंस कीमतों से पडऩे का अनुमान है। औद्योगिक जिंसों और कच्चे तेल में ताजा तेजी से अगली कुछ तिमाहियों में कॉरपोरेट मार्जिन नीचे आ सकता है।’
ऊंचे बॉन्ड प्रतिफल से बैंकों को अपने बॉन्ड पोर्टफोलियो में मार्क-टु-मार्केट नुकसान दर्ज करने के लिए भी बाध्य होना पड़ सकता है जिससे उनका मुनाफा प्रभावित होगा।
दीर्घावधि के दौरान, भारतीय उद्योग जगत की राजस्व वृद्घि और मुनाफा मार्जिन के बीच विपरीत संबंध है। इस संबंध में दोनों अनुपात पिछले 12 महीने के आधार पर हैं।
उदाहरण के लिए, सूचकांक कंपनियों ने राजस्व वृद्घि में कमजोरी के बावजूद अक्टूबर-दिसंबर 2018 की तिमाही से परिचालन मार्जिन में मजबूत सुधार दर्ज किया।
ब्याज दरों में ताजा नरमी के साथ साथ मार्जिन में सुधार कच्चे माल और ऊर्जा खर्च में भारी कमी पर केंद्रित रहा है।
हालांकि अन्य का कहना है कि बॉन्ड प्रतिफल और जिंस कीमतें बेहतर मांग का संकेत दे रही हैं जिससे भारतीय उद्योग जगत को तेजी से बढऩे में मदद मिलेेगी।

First Published : March 1, 2021 | 11:46 PM IST