डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज, निकोलस पीरामल और दूसरी भारतीय दवा निर्माता कंपनियां वैश्विक मंदी के चलते विकास की अपनी रफ्तार को बनाए रखने के लिए अब सस्ते अधिग्रहणों के बारे में सोच रही हैं।
पिछले कुछ समय में बड़े अधिग्रहणों में हासिल हुई नाकामयाबी के बाद दवा निर्माता कंपनियां छोटे अधिग्रहणों से मुनाफा कमाने के बारे में सोच रही हैं।
छोटे अधिग्रहणों के चलन को बरकरार रखते हुए पीरामल हेल्थकेयर ने अमेरिका की बेहोश करने वाली दवाओं की निर्माता कंपनी के अधिग्रहण की घोषणा की है।
अमेरिका की यह दवा निर्माता कंपनी लगभग 200 करोड़ रुपये की कंपनी है। उम्मीद है कि इस अधिग्रहण के साथ कंपनी बेहोश करने वाले उत्पादों के बाजार में तीसरी सबसे बड़ी कंपनी बन जाएगी।
पीरामल लाइफ साइंसेज लिमिटेड की वाइस चेयरपर्सन और पीरामल हेल्थकेयर की निदेशक स्वाति ए पीरामल का कहना है, ‘मौजूदा समय में अमेरिका और यूरोप में कई छोटी तकनीक आधारित फार्मा और बायोटेक फम विकास के लिए पर्याप्त राशि की कमी के कारण बिक्री के लिए उपलब्ध हैं। यह भारतीय कंपनियों के लिए अधिग्रहण का एक मौका है।’
अभी हाल में पीरामल ने तीन छोटे रणनीतिक अधिग्रहण किए हैं। कुछ महीने पहले ही कंपनी ने मुंबई की खंडेलवाल लैबोरेटरीज के दो दवा ब्रांडों को 116 करोड़ रुपये में खरीदा है और कंपनी ने पॉलीजेलिन आधारित रक्त प्लाज्मा बढ़ाने वाले उत्पादों में वैश्विक अग्रणी कंपनी बनने के लिए जर्मनी के प्लाज्मा सीलेक्ट के रक्त प्लाज्मा उतपादों को खरीदा है।
इस साल की शुरआत में पीरामल ने बेंगलुरु की हेल्थलाइन को 15 करोड़ रुपये में खरीदा था, जिसके साथ कंपनी में एक पूर्ण सहयोगी इंजेक्ट की जाने वाली दवाओं की विनिर्माता इकाई भी शामिल हो गई।
इस साल डॉ. रेड्डीज ने दो छोटे रणनीतिक अधिग्रहणों की घोषणा की थी। अप्रैल के पहले सप्ताह में डॉ. रेड्डीज ने इटली की जेट जेनेरिकी स्री का अधिग्रहण किया था ताकि कंपनी के उत्पादों तक कंपनी की पहुंच बढ़ जाए और इटली के बाजार में वह मार्केटिंग के लिए कारोबार शुरू कर सके।
इसके अलावा कंपनी ने ब्रिटेन में डाउ फार्मा के छोटे मॉलीक्यूल्स के कारोबार में भी कुछ हिस्सा खरीदा था। डॉ. रेड्डीज अब आला दर्जे की छोटी कंपनियों के अधिग्रहण से मुनाफा कमाने की कोशिश कर रही है।
एंजिल ब्रोकिंग की उपाध्यक्ष (अनुसंधान) सरबजीत कौर नागरा का कहना है, ‘बड़े अधिग्रहणों पर विचार कर रही कंपनियों के लिए फंड की उपलब्धता एक अहम मुद्दा है। इसके अलावा बड़े अधिग्रहणों में शामिल जोखिम ने भी कंपनियों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि वे सस्ते अधिग्रहण करें जिनसे उन्हें मुनाफा हो सके।’