राजधानी लखनऊ में चिकन दस्तकारी के काम में लगे कारीगरों ने चीन के आयात पर प्रतिबंध लगाए जाने के लिए दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया है।
इन निर्माताओं का कहना है कि पारंपरिक उद्योग के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए चीन के आयात पर प्रतिबंध जरूरी है। पिछले दो वर्षों से बाजार में कशीदाकारी से जुड़े चीनी उत्पादों की बाढ़ आ गई है।
ये काफी सस्ते हैं और इनकी डिजाइन भी काफी अत्याधुनिक है जिसकी वजह से पिछले एक साल के दौरान कई छोटी जरदोजी दुकानें बंद हो चुकी हैं और वे अन्य व्यवसायों में तब्दील हो गई हैं।
एक शोरूम के मालिक शालू बाजपेयी कहते हैं, ‘हमारे कामगार कम अनुभवी हैं और एक साड़ी या सूट को तैयार करने में दो-तीन दिन का समय लगता है जबकि चीनी मशीनों द्वारा इसे कुछ ही घंटे के अंदर तैयार कर लिया जाता है। चीनी और असली चिकन के बीच अंतर पहचानना हर किसी के लिए आसान नहीं है। इससे जुड़े कई कारोबारियों ने समझौतों के तहत चीनी उत्पाद बेचने शुरू कर दिए हैं। इससे प्रदेश के पारंपरिक कशीदाकारी कार्य से जुड़े सैकड़ों लोगों की रोजी-रोटी पर संकट पैदा हो रहा है।’
निर्माताओं की शिकायत है कि सरकार भी उनके प्रति सहानुभूति नहीं दिखा रही है। चिकन निर्माता कुंवरजी खन्ना ने सवालिया अंदाज में कहा, ‘अगर चीन के खिलौनों पर प्रतिबंध लग सकता है तो चिकन पर क्यों नहीं?’ उन्होंने बताया कि चीनी चिकन पर कढ़ाई यानी कशीदाकारी मशीन से की जाती है और इसकी डिजाइन कम्प्यूटर पर तैयार की जाती है।
सिल्क एंड हैंडीक्राफ्ट प्रमोशन काउंसल की राज्य इकाई के अध्यक्ष सीके छाबड़ा प्रतिबंध का समर्थन करते हुए कहते हैं कि इस क्षेत्र में कोई बड़ा बदलाव लाए जाने की जरूरत है। उन्होंने शिकायत के लहजे में कहा कि किसी भी सरकार ने चिकन और सिल्क क्षेत्र से जुड़ी लघु एवं मझोली इकाइयों की ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया है।