जुलाई-सितंबर 2020 अवधि में निगमित ऋण शोधन अक्षमता के जितने मामले निपटाए गए हैं, उनमें 60 प्रतिशत से अधिक मामलों में संकटग्रस्त इकाइयां बंद कर दी गई हैं। भारतीय दिवालिया एवं ऋण शोध अक्षमता बोर्ड (आईबीबीआई) से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार उक्त अवधि के दौरान 112 निपटाए गए, जिनमें 68 मामलों में संकटग्रस्त इकाइयां बंद कर दी गईं और इनकी परिसंपत्तियां कर्जदाताओं के बीच बांट दी गईं। पिछली तिमाही में भी ज्यादातर मामलों में कंपनियां बंद कर दी गईं, लेकिन जितने मामले निपटाए गए थे उनमें इनकी तादाद केवल एक तिहाई ही थी। दिवालिया एवं ऋण शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के तहत निगमित ऋण शोधन अक्षमता प्रकिया (सीआईआरपी) दिसंबर 2020 तक निलंबित रहने के बीच संकटग्रस्त कंपनियां लगातार बंद हो रही हैं।
विशेषज्ञों ने कहा कि इससे यह साबित हो जाता है कि संकटग्रस्त कंपनियों में फिलहाल निवेशक रुचि नहीं दिखा रहे हैं। कॉर्पोरेट प्रोफेशनल में पार्टनर मनोज कुमार ने कहा, ‘पहले आईबीसी में जितने मामले आए थे उनमें कंपनियों की हैसियत पहले ही कम हो गई थी, इसलिए उनमें ज्यादातर के लिवाल नहीं मिले, इसलिए उन्हें बंद करना पड़ा। अब कोविड-19 महामारी के कारण वित्तीय तंगी की नौबत आ गई है। समाधान योजनाएं आ रही हैं, लेकिन वे पर्याप्त नहीं हैं। जब तक निवेशकों का उत्साह नहीं लौटेगा तब तक संकटग्रस्त इकाइयों का समाधान निकलना मुश्किल होगा।’
आईबीबीआई आंकड़े बताते हैं कि बिक्री के उपलब्ध 1,022 मामलों में 751 (करीब 73 प्रतिशत) मामले औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्गठन (बीआईएफआर) योजना के तहत थे। निगमित ऋण शोधन अक्षमता प्रक्रियाओं में जितने मामले निपटाए गए उनमें करीब 49.61 प्रतिशत मामलों में कंपनियां बेच दी गईं। इसके मुकाबले 13.41 प्रतिशत मामलों के लिए समाधान योजना तैयार कर ली गई। आईबीसी को गहराई से समझने वाले लोगों का मानना है कि महामारी के दौरान समाधान योजना बंद करने का निर्णय बिल्कुल सही है। उनके अनुसार फिलहाल बाजार में उत्साह ठंडा है और ऐसे में नए मामले आते रहे तो उनका अंबार लग जाएगा।
आईबीबीआई प्रमुख ने भी कहा कि कोविड-19 महामारी के दौर में किसी कमजोर कंपनी को बेचने के बजाय किसी मजबूत कंपनी को बचाना अधिक अहम है। उन्होंने कहा, ‘अगर आप किसी कमजोर कंपनी को बेचने में असफल रहते हैं तो यह अच्छी बात नहीं है, लेकिन इसके अगले वर्ष सुधारा जरूर जा सकता है।’
दिवालिया नियामक ने किसी कंपनी को स्वैच्छिक बिक्री से इसकी प्रक्रिया शुरू होने के बाद किसी भी समय बाहर आने की अनुमति दी है। आईबीबीआई ने कहा कि अगर कारोबारी संभावनाएं मौजूद रहती हैं तो बीच में ही स्वैच्छिक बिक्री प्रक्रिया को रोकना शेयरधारकों के हित में रह सकता है और इससे अर्थव्यवस्था को भी मदद मिलेगी।