बाजार में हापुस आम की आवक शुरू होते ही नवी मुंबई के कृषि उत्पादन बाजार समिति (एपीएमसी) के निर्यात भवन में अचानक चहल पहल बढ़ गई है। विदेशी बाजार में आम की मांग बढ़ी है। हापुस का स्वाद चखने के लिए विदेशी मुंहबोली कीमत देने के लिए तैयार हैं। लेकिन आम की पैदावार में मौसम की मार पड़ने की वजह से मांग पूरा कर पाना मुश्किल है। क्योंकि इस साल हापुस आम की करीब 80 फीसदी फसल खराब हो गई है।
अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच नवी मुंबई के एपीएमसी से 1200 किलो की पहली हापुस आम की खेप हवाई मार्ग से अमेरिका के लिए रवाना की गई। फसल देर से तैयार होने के कारण इस साल करीब एक महीने की देरी से हापुस आम का निर्यात शुरू हुआ है। इस बार हापुस की कीमत पिछले साल की अपेक्षा दोगुनी बोली जा रही है।
शुक्रवार 27 मार्च को नवी मुंबई एपीएमसी में कुल 2956 क्विंटल आम आया। जिसमें से देवगड हापुस 1845 क्विंटल और रत्नागिरी के बागों से 1196 क्विंटल हापुस एपीएमसी पहुंचा। देवगड हापुस की न्यूनतम कीमत 70 हजार और अधिकतम कीमत 90 हजार रुपये प्रति क्विंटल बोली गई जबकि औसत दाम 80 हजार रुपये प्रति क्विंटल था। वहीं रत्नागिरी के हापुस की कीमत औसत कीमत 65 हजार रुपये थी इसका अधिकतम दाम 70 हजार और न्यूनतम दाम 60 हजार रुपये प्रति क्विंटल था।
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विदेशी हापुस दिवाने हो चुके हैं। अमेरिकी एक्सपोर्टर करीब 20 दिनों से नवीं मुंबई में हापुस की लालच में डेरा डाले हुए हैं लेकिन आवक कमजोर होने के कारण पहली खेप गुरुवार को भेजी जा सकी। शनिवार को दूसरी खेप भी भेजने की तैयारी है। एपीएमसी के अधिकारियों का कहना है कि अब आम की आवक बढ़ रही है इसीलिए धीरे धीरे निर्यात शुरू किया जा रहा है।
अमेरिका के साथ सिंगापुर और लंदन भी आम भेजे जा रहे हैं। इन देशों में आम निर्यात के लिए विशेष प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। अमेरिका जाने वाले आम की पैकिंग से पहले रेडिशन प्रक्रिया की जाती है जबकि अन्य देशों इसके निर्यात से पहले वॉर्म वॉटर प्रक्रिया से आम को साफ किया जाता है।
निर्यात की जाने वाले आम की कीमत पिछले साल की अपेक्षा काफी ज्यादा है लेकिन इसका फायदा किसानों को नहीं हो रहा है क्योंकि युद्ध के कारण किराया बहुत ज्यादा हो गया है। निर्यात किये जाने वाले आम की पैकिंग बॉक्स में होती है। एक बॉक्स में करीब 15 आम रहते हैं। एक बॉक्स की थोक बाजार में कीमत 1500 से 2000 रुपये है।
आम निर्यातक प्रकाश ठक्कर कहते हैं कि ईंधन की कीमत 10 फीसदी बढ़ी लेकिन कंपनियां आम का निर्यात किराया 50 फीसदी बढ़ा दी है। पिछले साल प्रति किलो आम निर्यात करने का किराया 350 रुपये था जो इस साल कंपनियां 650 रुपये वसूल रही हैं। यानी बढ़ी हुई कीमत का फायदा किसान की जगह कंपनियों को हो रहा है।
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निर्यातकों की मानी जाए तो खाड़ी देशों से भी लगातार आम की मांग की जा रही है लेकिन युद्ध के चलते निर्यात में मुश्किल हो रही है। युद्ध के कारण खाड़ी देशों में पानी के जहाज नहीं जा रहे हैं। आम निर्यातक प्रकाश ठक्कर कहते हैं कि युद्ध नहीं होता तो इस साल आम के दाम और अधिक होते क्योंकि मांग बहुत है जबकि इस साल पैदावार कम है। इस समय मंडी में हर दिन मुश्किल से 20 गाड़ी आम आ पा रहा है जबकि पिछले साल इस समय हर दिन औसतन 50-60 गाड़ी आम की आवक थी।
एशिया, यूरोप, अमेरिका, अरब, अफ्रीका समेत 60 से ज्यादा देशों में आम की मांग तेजी से बढ़ी है। 2025-26 (अप्रैल-जनवरी) में 30,948 मैट्रिक टन आम का निर्यात कर हमने 52.10 मिलियन अमेरिकी डॉलर कमाए थे। जिसमें से 15.96 मिलियन अमेरिकी डॉलर का आम अरब देशों को जबकि 10.23 मिलियन डॉलर का आम यूनाइटेड किंगडम और 9.57 मिलियन डॉलर अमेरिका को आम भेजा गया था। पिछले साल 2,182.67 मीट्रिक टन अमेरिका को निर्यात किया गया था। इस साल विदेशी बाजार में आम की मांग बढ़ी है, लेकिन कम पैदावार और युद्ध के कारण उस मांग को पूरा कर पाना भारतीय निर्यातकों के लिए मुश्किल है।
इस साल हापुस आम की पैदावार करीब 80 फीसदी कम होने की आशंका जताई जा रही है। इस साल कोंकण में लगभग 1 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में आम के बाग प्रभावित हुए हैं। साल 2025 में राज्य में 5.19 लाख टन आम का उत्पादन हुआ, जिसमें रत्नागिरी और सिंधुदुर्ग का संयुक्त रूप से औसत 250,845 टन का योगदान रहा । इनमें से अल्फोंसो आम का हिस्सा 225,756 टन था ।