Alphonso mangoes: कोंकण का मशहूर हापुस आम पर मौसम परिवर्तन की भीषण मार पड़ी है। रत्नागिरी इलाके करीब 80 फीसदी आम की फसल बर्बाद हो गई है। जिसके कारण हापुस अल्फांसों आम के किसानों को भारी नुकसान हुआ है। पैदावार में भारी कमी होने से इस साल आमों का बादशाह कहे जाने वाला हापुस आम बाजार की मांग पूरी नहीं कर पाएंगे। कम पैदावारा के कारण इस बार बाजारों में हापुस के दाम आसमान छूने वाले हैं। जिसका असर अभी से बाजार में दिखाई देने लगा है।
इस साल गुड़ी पड़वा के मौके पर कोंकण से हापुस आम के 10 हजार बॉक्स वाशी के एपीएमसी में आए थे। पड़वा के मौके पर हापुस आम की पूजा की जाती है और इसी दिन से इनकी बिक्री शुरू हो जाती है। इस मंडी में पिछले साल गुड़ी पड़वा पर 25 हजार बॉक्स आए थे। इस वजह से हापुस आम के दाम आसमान छू रहे हैं। हापुस की आवक बाजार में शुरू हो गई है। मुख्य रूप से कोंकड़ क्षेत्र के रत्नागिरी और देवगढ़ में होने से इस आम की अच्छी आवक अप्रैल में शुरू होती है और मई तक बाजार में मिलता है।
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वाशी एपीएमसी फल मार्केट के संचालक पानसरे ने बताया कि गुड़ी पड़वा के मौके पर मंडी में आम की बड़ी खेप आई है जिसे खरीदने के लिए कई देशों के एक्सपोर्टर पहुंचे थे। नए साल के पहले दिन मंडी में ग्राहकों ने पूरे हर्ष और उल्लास के साथ आम की खरीदारी की। मंडी में यूरोप, अमेरिका और दुबई के एक्सपोर्टर आए थे। आम का उत्पादन इस साल कम हुआ है जिसका असर मंडी में कम आवक के रूप में देखा जा रहा है। पेटी में अगर आम छोटा है तो उसका रेट 5 हजार रुपये है जबकि बड़े आम की पेटी का रेट 10 हजार रुपये है। इस बार दाम में तेजी रहने वाली क्योंकि उत्पादन कम हुआ है।
कृषि विभाग और कोंकण कृषि विद्यापीठ की रिपोर्ट के अनुसार, सिंधुदुर्ग में इस साल आम का उत्पादन औसतन से काफी हद तक तक घट गया है। जहां पहले रोजाना 50-60 ट्रक आम मुंबई भेजे जाते थे, अब केवल 2-3 ट्रक ही जा पा रहे हैं। इस साल कोंकण में लगभग 1 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में आम के बाग प्रभावित हुए हैं। साल 2025 में राज्य में 5.19 लाख टन आम का उत्पादन हुआ, जिसमें रत्नागिरी और सिंधुदुर्ग का संयुक्त रूप से औसत 250,845 टन का योगदान रहा। इनमें से अल्फोंसो आम का हिस्सा 225,756 टन था। आम की खेती इन दोनों जिलों में बड़ी संख्या में किसानों के लिए आय का प्रमुख स्रोत है।
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कोंकण के रत्नागिरी और सिंधुदुर्ग क्षेत्र में प्रसिद्ध अल्फोंसो यानी हापुस आम की पैदावार सबसे अधिक होती है और इनकी मांग भी देश विदेश में बनी रहती है। जलवायु परिवर्तन और इस अप्रत्याशित बारिश के कारण इस साल आम की फसल को 80 फीसदी से ज्यादा के नुकसान होने का दावा किया जा रहा है। नवंबर-दिसंबर में देर तक रही गर्मी और फिर अचानक आई शीत लहर के कारण आम के पेड़ों पर मोहर आने की प्रक्रिया बुरी तरह प्रभावित हुई। अधिक उमस और बदलते तापमान की वजह से आम और काजू की फसल पर विभिन्न रोगों और कीटों का हमला हुआ, जिससे फूल झड़ गए।
आम किसान सरकार से मुआवजे की मांग कर रहे हैं। आंदोलन कर रहे किसानों का कहना कि आम के लिए 5,000 रुपये प्रति पेड़ या 5 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर का मुआवजा दिया जाए। किसानों ने संकट में फंसे बागवानों के लिए पुराने कर्ज की माफी और नई कर्ज सीमा को 3 लाख रुपये से बढ़ाकर 6 लाख रुपये करने की मांग की है। किसानों का कहना है कि पिछले 50-60 वर्षों में उन्होंने कभी ऐसी स्थिति नहीं देखी, जहां बाग पूरी तरह खाली हो गए हों, इसलिए वो इसे प्राकृतिक आपदा घोषित कर तत्काल मदद की मांग कर रहे हैं।