सीनियर सिटीजन आमतौर पर फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) पर ज्यादा भरोसा करते हैं। RBI डेटा पर आधारित हालिया मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि यह भरोसा अब और बढ़ गया है। लेकिन रिटायर लोगों के लिए सिर्फ FD पर निर्भर रहना सही नहीं है। रिटायरमेंट के दौरान कई तरह की वित्तीय चुनौतियां आती हैं। इसलिए उन्हें अपने निवेश को अलग-अलग जगहों पर बांटना चाहिए, यानी निवेश में डायवर्सिफिकेशन लाना चाहिए।
रिटायर लोगों को ग्रोथ एसेट्स, (जैसे इक्विटी म्युचुअल फंड्स) में कुछ हिस्सा जरूर रखना चाहिए ताकि 25 साल या उससे ज्यादा लंबे रिटायरमेंट के दौरान बढ़ती महंगाई (खासकर कंज्यूमर और लाइफस्टाइल इंफ्लेशन) को मात दी जा सके।
सेबी में रजिस्टर्ड निवेश सलाहकार और फिड्यूशरीज के फाउंडर अविनाश लूथरिया कहते हैं, “एक रिटायर्ड व्यक्ति अपने पोर्टफोलियो का 10% से 40% हिस्सा Nifty 50 इंडेक्स फंड में रख सकता है।
वे कहते हैं कि इक्विटी फंड में निवेश का हिस्सा इस बात पर निर्भर होना चाहिए कि निवेशक को इक्विटी का कितना अनुभव है। जिन लोगों का अनुभव पांच साल से कम है, उन्हें इस रेंज के निचले स्तर पर ही रहना चाहिए। वहीं, जिन सीनियर सिटीजन को इक्विटी में 20 साल से ज्यादा का अनुभव है, वे इस रेंज के ऊपरी स्तर तक जा सकते हैं।
वह यह भी चेतावनी देते हैं कि इक्विटी बाजार में गिरावट काफी तेज हो सकती है और कई साल तक चल सकती है। इसलिए रिटायर लोगों को अपनी जोखिम उठाने की क्षमता को थोड़ा कम मानकर ही निवेश करना चाहिए।
रिटायरमेंट के बाद इक्विटी फंड में निवेश करने के लिए एक जरूरी शर्त है कि रिटायरमेंट कॉर्पस पर्याप्त बड़ा होना चाहिए। लूथरिया कहते हैं, जिन सीनियर सिटीजन कपल्स का पोर्टफोलियो 10 करोड़ रुपये से ज्यादा है और जो डायरेक्ट म्युचुअल फंड प्लान में निवेश कर सकते हैं, उन्हें कम खर्च (लो फीस) के कारण Nifty 50 इंडेक्स फंड का इस्तेमाल करना चाहिए।”
प्लान अहेड वेल्थ एडवाइजर्स के फाउंडर और सीईओ विशाल धवन कहते हैं कि जिन सीनियर सिटीज को इक्विटी में निवेश करने में सहजता है, वे इंडेक्स फंड और फ्लेक्सीकैप फंड का मिक्स चुन सकते हैं। वे यह भी कहते हैं कि सीनियर सिटीजन को ज्यादा आक्रामक कैटेगरी, जैसे मिड-कैप, स्मॉल-कैप और थीमैटिक फंड्स से बचना चाहिए, क्योंकि इनमें उतार-चढ़ाव (वोलैटिलिटी) ज्यादा होता है।
सभी सीनियर सिटीजन में प्योर इक्विटी फंड में निवेश करने का जोखिम उठाने की क्षमता नहीं होती है। मनीएडस्कूल के फाउंडर अर्नव पंड्या कहते हैं, “अधिकांश सीनियर सिटीजन हाइब्रिड फंड्स, जैसे बैलेंस्ड एडवांटेज फंड्स और अन्य हाइब्रिड कैटेगरी के साथ ज्यादा सहज महसूस करते हैं, क्योंकि इनमें इक्विटी का हिस्सा कम होता है और उतार-चढ़ाव भी अपेक्षाकृत कम रहता है।”
हाइब्रिड फंड्स का एक फायदा यह भी है कि इनमें रीबैलेंसिंग ज्यादा टैक्स-एफिशिएंट होती है।
रिटायर लोगों को अपने कॉर्पस से उतना ही पैसा निकालना चाहिए, जितनी उन्हें जरूरत हो। धवन कहते हैं, “नियमित आय एक ही इंस्ट्रूमेंट से नहीं, बल्कि कई इंस्ट्रूमेंट्स के मिक्स से आनी चाहिए।”
सीनियर सिटीजन सेविंग स्कीम (SCSS), बैंक डिपॉजिट, हाई रेटिंग वाले कॉरपोरेट डिपॉजिट, एन्युटीज और पोस्ट ऑफिस की मंथली इनकम स्कीम जैसे विकल्प रेगुलर कैश फ्लो बनाने में मदद कर सकते हैं।
धवन के मुताबिक, निवेश का मिक्स इस बात पर निर्भर होना चाहिए कि रिटायर व्यक्ति के खर्च कितने फिक्स्ड हैं और कितने लचीले।
सेबी में रजिस्टर्ड निवेश सलाहकार और SahajMoney.com के फाउंडर अभिषेक कुमार कहते हैं, “अलग-अलग इंस्ट्रूमेंट में निवेश करने से लंबी रिटायरमेंट अवधि में सुरक्षा (सॉवरेन सेफ्टी) और रिटर्न के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकता है।
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फिक्स्ड डिपॉजिट (FD): एफडी नियमित आय दे सकते हैं और पूंजी के नुकसान का जोखिम भी कम होता है, बशर्ते सीनियर सिटीजन बड़े कमर्शियल बैंकों में निवेश करें। इसके अलावा, सीनियर सिटीजन को एफडी पर आम निवेशकों के मुकाबले थोड़ा ज्यादा ब्याज भी मिलता है।
धवन कहते हैं, “एफडी में लिक्विडिटी होती है और रिटर्न पहले से तय (प्रीडिक्टेबल) होता है।” हालांकि, इसके कुछ नुकसान भी हैं। धवन के मुताबिक, “अगर मैच्योरिटी के समय ब्याज दरें गिर जाती हैं, तो एफडी में रीइन्वेस्टमेंट का जोखिम होता है।” एफडी कितने उपयुक्त हैं, यह निवेशक के टैक्स स्लैब पर भी निर्भर करता है। वे कहते हैं, “जैसे-जैसे टैक्स स्लैब बढ़ता है, एफडी उतने कम प्रभावी हो जाते हैं।”
कुमार का कहना है कि एफडी महंगाई से सुरक्षा नहीं देते। एफडी पर ज्यादा निर्भरता से खरीदने की क्षमता घट सकती है, क्योंकि महंगाई और टैक्स को ध्यान में रखने पर वास्तविक रिटर्न नेगेटिव भी हो सकता है।
आम तौर पर, आय वाले पोर्टफोलियो में एफडी का हिस्सा 20% से 40% तक रखना समझदारी हो सकती है। कुमार के अनुसार, “सटीक हिस्सा इस बात पर निर्भर करेगा कि लिक्विडिटी की जरूरत कितनी है और इमरजेंसी फंड कितना बड़ा है।”
धवन यह भी कहते हैं, “हाई रेटिंग वाले कॉरपोरेट एफडी पर भी विचार किया जा सकता है, लेकिन निवेश से पहले उनकी रेटिंग और वित्तीय स्थिति जरूर जांच लें, क्योंकि ये अनसिक्योर्ड इंस्ट्रूमेंट होते हैं।”
एन्युटीज (Annuities): एन्युटीज लंबी उम्र के जोखिम (लॉन्गेविटी रिस्क) को कवर करने में मदद करती हैं, क्योंकि ये रिटायर व्यक्ति को जीवनभर नियमित आय देती हैं। पंड्या कहते हैं, “कुछ एन्युटीज में चुने गए विकल्प के आधार पर पूंजी वापस मिलने (रिटर्न ऑफ कैपिटल) या जीवनसाथी को लाभ जारी रहने की सुविधा भी मिलती है।” हालांकि, इसकी कुछ सीमाएं भी हैं।
पंड्या के अनुसार, “भारत में एन्युटीज का रिटर्न आमतौर पर कम होता है।”
इनकी लिक्विडिटी कम होती है, जिससे निवेश में लचीलापन घट सकता है। धवन कहते हैं, “जिन निवेशकों का कॉर्पस छोटा है, उनके लिए एन्युटीज मुश्किल हो सकती हैं, क्योंकि इसमें निवेश की गई मूल राशि आसानी से वापस नहीं मिलती।”
एन्युटीज के रिटर्न महंगाई के अनुसार एडजस्ट नहीं होते और हाई टैक्स स्लैब वाले निवेशकों के लिए ये कम टैक्स-एफिशिएंट भी होती हैं।
कुमार के मुताबिक, रिटायरमेंट कॉर्पस का 25% से 30% से ज्यादा हिस्सा एन्युटीज में नहीं लगाना चाहिए।
सीनियर सिटीजन्स सेविंग्स स्कीम (SCSS): इस स्कीम में 8.2 फीसदी का गारंटीड रिटर्न मिलता है, जिसमें तिमाही (क्वार्टरली) भुगतान होता है। हालांकि, अगर समय से पहले पैसा निकालते हैं, तो पेनल्टी लग सकती है।
धवन कहते हैं, “जिन निवेशकों का कॉर्पस बड़ा है, वे SCSS में आसानी से पैसा रख सकते हैं, क्योंकि उनके पास लिक्विडिटी के अन्य स्रोत भी होते हैं। छोटे कॉर्पस वाले निवेशकों के लिए इसका उपयोग करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है।”
इस स्कीम में प्रति व्यक्ति 30 लाख रुपये तक ही निवेश किया जा सकता है। साथ ही, SCSS से मिलने वाला ब्याज निवेशक के टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्सेबल होता है।
डेट म्युचुअल फंड्स (Debt Mutual Funds): डेट म्युचुअल फंड्स भी नियमित आय का एक अच्छा विकल्प हो सकते हैं। धवन कहते हैं, “सिस्टेमैटिक विदड्रॉअल प्लान (SWP) की सुविधा से निवेशक अपनी जरूरत के हिसाब से पैसे निकाल सकते हैं– चाहें तो रकम बढ़ा सकते हैं, घटा सकते हैं, या कभी भी शुरू और बंद कर सकते हैं।”
डेट फंड्स से SWP के जरिए निकासी टैक्स के लिहाज से भी ज्यादा फायदेमंद होती है। इसमें पूरे निकासी अमाउंट पर नहीं, बल्कि सिर्फ कैपिटल गेन वाले हिस्से पर टैक्स लगता है। साथ ही, टैक्स हर साल नहीं, बल्कि केवल निकासी के समय ही लागू होता है।
सीनियर सिटीजन को अपने पोर्टफोलियो के उस हिस्से में ज्यादा जोखिम नहीं लेना चाहिए, जिससे नियमित आय आती है। उन्हें जिन इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश कर रहे हैं, उनकी लिक्विडिटी भी जरूर जांचनी चाहिए। कुमार कहते हैं, “पूरी रकम को लंबे समय के प्रोडक्ट्स में लॉक न करें। मेडिकल इमरजेंसी या लाइफस्टाइल में बदलाव के लिए कुछ पैसा लिक्विड जरूर रखें।”
रिटायरमेंट 20 से 30 साल तक चल सकता है, इसलिए पोर्टफोलियो इस तरह बनाना चाहिए कि शुरुआत में ही पूरे पैसे की जरूरत न पड़े। धवन के मुताबिक, “अगर पैसे को अलग-अलग समय (टाइम बकेट्स) में बांटकर रखा जाए, तो रिटायर लोग बेहतर निवेश फैसले ले सकते हैं।”