| कमजोर 'रुपैया' डुबाएगा नैया! | |
| मालिनी भुप्ता / मुंबई 06 24, 2012 | | | | |
रुपये की लगातार घटती हैसियत उद्योग जगत के लिए परेशानी का सबब बनती जा रही है। सुस्त वृद्घि से पहले ही मुश्किलें झेल रही कंपनियों के लिए रुपये पर पड़ती मार दोहरा झटका साबित हो रही है। पिछले कुछ वर्षों से भारतीय कंपनियों का डॉलर में लेनदेन बढ़ा है, ऐसे में कमजोर होते रुपये से विदेशी मुद्रा कर्ज की लागत बढ़ी है। इसके अलावा कच्चे माल और ईंधन आदि का आयात भी महंगा हुआ है।
डॉलर के मुकाबले रुपये में तेज गिरावट से निर्यातकों को कुछ फायदा होगा लेकिन विदेशी मुद्रा कर्ज और विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बॉन्ड (एफसीसीबी) लेने वालों को काफी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। इस साल लगभग 56 कंपनियों को विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बॉन्ड के परिपक्व होने पर लगभग 5 अरब डॉलर की दरकार होगी।
हालांकि अधिकतर कंपनियों ने अपने विदेशी मुद्रा दायित्वों को फिलहाल रोक रखा है जबकि कुछ अन्य कंपनियों के सामने यह विकल्प मौजूद नहीं है। विश्लेषकों ने कहा कि अधिकांश विदेशी मुद्रा कर्ज की अदायगी को टाला नहीं जा सकता है और इन कंपनियों को भारी मार्क-टू-मार्केट (एमटीएम) घाटा हो सकता है। शेयरखान के विश्लेषक दीपक जैन ने कहा कि जो कंपनियां अपनी विदेशी मुद्रा देनदारी को फिलहाल टाल नहीं सकती हैं, उन्हें भारी एमटीएम नुकसान का सामना करना पड़ेगा। पारंपरिक सिद्धांत के अनुसार, जब मुद्रा में गिरावट होती है तो निर्यात आधारित कारोबार की स्थिति अच्छी होती है। हालांकि एमके ग्लोबल में रणनीतिकार धनंजय सिन्हा ने कहा कि यह बहुत पारंपरिक धारणा है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी के साथ ही निर्यात कारोबार पर दबाव बढ़ जाता है। उन्होंने कहा, 'अंत में राजस्व वृद्धि की क्या स्थिति होती है, उस पर दबाव बढ़ जाता है।'
विभिन्न क्षेत्रों में केवल तकनीकी क्षेत्र को ही रुपये में गिरावट होने से लाभ होता है। डॉयचे बैंक के विश्लेषण के अनुसार, रुपये में प्रत्येक 1 फीसदी के बदलाव से आला दर्जे के भारतीय वेंडरों की शुद्ध आय में 50 से 110 आधार अंकों का सुधार होता है।
हालांकि इस बार सारी समस्याओं की जड़ डॉलर ही नहीं है। बल्कि डॉलर के मुकाबले अन्य मुद्राओं में भी गिरावट आई है और इससे हालात काफी जटिल बन गए हैं क्योंकि कुछ फायदा हाथ से निकलता नजर आ रहा है। मिसाल के तौर पर विश्लेषक क्रॉस करेंसी मूवमेंट के कारण देश की शीर्ष सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों के राजस्व पर 100 आधार अंकों का नकारात्मक प्रभाव पड़ता देख रहे हैं क्योंकि यूरो और ऑस्टे्रलियाई डॉलर के मुकाबले भी अमेरिकी डॉलर में मजबूती आई है।
जिन कंपनियों ने निर्यात के जरिये रुपये के खिलाफ डॉलर में न्यूट्रल हेजिंग या डॉलर में खरीदारी कर हेजिंग कर रखी है, वे फायदे में रहेंगी। मिसाल के तौर पर गोदरेज कंज्यूमर के कुल राजस्व का एक तिहाई अंतरराष्ट्रीय कारोबार के जरिये आता है। गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स के ए महेंद्रन के अनुसार, 'निर्यात में तेजी आएगी, कुल मिलाकर इस तिमाही में रुपये की वजह से कुछ प्रभाव जरूर नजर आएगा लेकिन यह हमारी योजना के अनुरूप ही होगा जिसे समायोजित किया जा सकता है।' वाहन क्षेत्र में क कंपनियों ने हेजिंग कर रखी है।
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