इसमें संदेह नहीं कि भारत का मुद्रास्फीति को लक्षित करने वाला ढांचा मुद्रास्फीति घटाने में कामयाब रहा है। इसके पहले हमें लगातार उच्च मुद्रास्फीति का सामना करना पड़ता था, वास्तविक ब्याज दरें ऋणात्मक रहती थीं और वृहद आर्थिक मोर्चे पर अक्सर अस्थिरता रहती थी। मुद्रास्फीति की दर अक्सर दो अंकों के करीब रहती थी। इससे आम परिवारों की बचत पर असर होता था और निवेशकों के लिए अनिश्चितता का माहौल बनता था।
मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारण के बाद का दौर स्पष्ट रूप से अलग रहा है जिसमें कम मुद्रास्फीति और अधिक मौद्रिक-नीति विश्वसनीयता देखने को मिली है। लेकिन सफलता के बावजूद हमें बढ़ती हुई कमजोरी को पहचानने से नहीं रुकना चाहिए। क्या ये उपलब्धियां विकास के अत्यधिक बलिदान की कीमत पर आई हैं?
दुर्भाग्यवश इसका जवाब हां है। असल में समस्या कठोरता की है। ऐसी अर्थव्यवस्था में जहां खाद्य कीमतें अस्थिर हैं और भूराजनीति से प्रभावित होती हैं, जहां भविष्य की मुद्रास्फीति को विश्वसनीय रूप से मापना कठिन है वहां मुख्यतः पिछले आंकड़ों पर आधारित मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारण वाली मौद्रिक नीति खतरनाक रूप से व्यापार चक्रों को स्थिर करने के बजाय उन्हें और अधिक तीव्र कर सकती है।
बुनियादी दिक्कत यह है कि घोषित मुद्रास्फीति अतीत को बताती है जबकि ब्याज दर भविष्य को प्रभावित करती है। उदाहरण के लिए अप्रैल का ताजा मुद्रास्फीति संबंधी आंकड़ा पिछले साल अप्रैल और इस अप्रैल के बीच कीमतों में अंतर को आंकता है। परंतु निवेश के लिए प्रासांगिक वास्तविक ब्याज दर भविष्य की मुद्रास्फीति पर निर्भर करती है। नतीजतन रिजर्व बैंक अक्सर वास्तविक ब्याज दर को केवल बाद में ही तलाश पाता है। यदि रिजर्व बैंक का निर्णय उल्लिखित मुद्रास्फीति पर आधारित हो, तो वास्तविक ब्याज दरें बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव वाली हो जाती हैं।
इस समस्या का पहला बड़ा उदाहरण मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारण लागू होने के तुरंत बाद सामने आया। 2015-16 से 2018-19 के बीच भारत की भविष्य-उन्मुख वास्तविक नीतिगत दर लगभग 3 फीसदी रही, जो दुनिया में सबसे ऊंची दरों में से एक थी। यह तब हुआ जब बैंकिंग प्रणाली स्वयं संकट में थी। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक दबावग्रस्त परिसंपत्तियों से बोझिल थे, ऋण वृद्धि कमजोर हो गई थी और ऋण दरें बढ़ गई थीं। इसके परिणामस्वरूप उधारकर्ताओं को दोहरी सख्ती का सामना करना पड़ा। यानी बैंकों से ऊंचे स्प्रेड (उनकी ऋण लेने और देने की दर का अंतर) और अत्यधिक कड़ी मौद्रिक नीति।
इस दृष्टिकोण ने वैश्विक वित्तीय संकट से मिले एक महत्त्वपूर्ण सबक को अनदेखा कर दिया। वह यह कि नीतिगत दरें वित्तीय परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं कर सकतीं। असल मायने रखता है प्रभावी उधारी लागत। जब बैंकिंग में दबाव स्प्रेड को तेजी से ऊपर धकेलता है, तो तटस्थ नीतिगत दर स्वयं गिरनी चाहिए।
वास्तव में, संशोधित टेलर नियम में वित्तीय स्प्रेड और ऋण परिस्थितियों को स्पष्ट रूप से शामिल किया था। फिर भी भारत में वास्तविक नीतिगत दरें ऊंची बनी रहीं, जबकि बैंकिंग प्रणाली कमजोर होती गई और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) संकट के दौर में प्रवेश कर गईं। यह ढांचा रिपोर्ट की गई मुद्रास्फीति पर अत्यधिक केंद्रित रहा और बिगड़ती वित्तीय परिस्थितियों को कम आंका गया।
वृद्धि में तेजी से धीमापन आया और 2019 में वह चार फीसदी से नीचे आ गई। मुद्रास्फीति को कम करने में मदद मिली लेकिन इसने देश में दशकों के सबसे कमजोर ऋण माहौल के बीच उधारी लागत को काफी बढ़ा दिया। ऐसे में बिना वृद्धि संबंधी बलिदान का आकलन किए इस ढांचे की कामयाबी की घोषणा करना आर्थिक दृष्टि से भ्रामक हो सकता है।
वर्ष2025-26 के लिए वास्तविक मुद्रास्फीति दर अंततः लगभग 2 फीसदी तक गिर गई। जिसका अर्थ है कि वास्तविक ब्याज दरें लगभग 4 फीसदी रहीं जो दुनिया में सबसे ऊंची दरों में से एक थीं। मौद्रिक नीति जो प्रारंभ में केवल मध्यम रूप से प्रतिबंधात्मक प्रतीत हो रही थी वह वास्तव में असाधारण रूप से कड़ी साबित हुई। इससे रुपया लंबे समय तक अधिक मूल्यांकित रहा और भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता को नुकसान पहुंचा।
तीसरा चरण उल्टी दिशा में आता दिख रहा है। कुछ ही महीने पहले तक टिप्पणीकार तथाकथित गोल्डीलॉक्स दौर का जश्न मना रहे थे यानी कम मुद्रास्फीति और मजबूत वृद्धि का। जैसे ही मुद्रास्फीति दर 4 फीसदी लक्ष्य से नीचे गई रिजर्व बैंक ने फिर से दरें घटाना शुरू कर दिया। लेकिन ईरान संघर्ष तेज होने से पहले ही चेतावनी संकेत दिखाई देने लगे थे। फिर भी नीतिगत चर्चा संकीर्ण रूप से वर्तमान मुद्रास्फीति आंकड़ों पर ही केंद्रित रही। एक अग्रगामी आकलन शायद यह निष्कर्ष निकालता कि मुद्रास्फीति जोखिम वास्तव में मामूली नहीं थे और कम से कम पिछली कुछ दर कटौतियां समय से पहले थीं। ईरान संघर्ष ने स्थिति को कहीं अधिक जटिल बना दिया है।
तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं और समग्र मुद्रास्फीति दर फिर से सहनशीलता सीमा के ऊपरी स्तर को पार कर सकती है। यदि ऐसा होता है, तो वास्तविक खतरा है कि रिजर्व बैंक एक बार फिर रिपोर्ट की गई मुद्रास्फीति पर यांत्रिक प्रतिक्रिया दे सकता है। दरें ठीक उसी समय बढ़ाई जा सकती हैं जब यह सबसे अनुचित हो। उन्हें लंबे समय तक ऊंचा रखा जा सकता है और बाद में ही पता चलेगा कि इससे वास्तविक ब्याज दरें अत्यधिक सख्त हो गईं और एक नया संकट पैदा हो गया।
जब मुद्रास्फीति अस्थायी खाद्य या ईंधन झटकों से प्रेरित होती है, तो मुख्य प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए कि क्या मुद्रास्फीति दर 6 फीसदी से ऊपर चली गई है। अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न दूरदर्शी होने चाहिए। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि भारत को मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारण पूरी तरह छोड़ देना चाहिए।
एक विश्वसनीय मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारण ढांचे के लिए मुद्रास्फीति अपेक्षाओं के विश्वसनीय उपाय आवश्यक हैं। वर्तमान में भारत में मुद्रास्फीति अपेक्षाएं मुख्यतः सर्वेक्षणों से अनुमानित की जाती हैं जो अक्सर वास्तविक मूल्य निर्धारण व्यवहार को प्रतिबिंबित करने में विफल रहते हैं। खाद्य कीमतों में उछाल अस्थायी रूप से सर्वेक्षण प्रतिक्रियाओं को बढ़ा सकता है। वहीं खाद्य मुद्रास्फीति दर में अस्थायी गिरावट लगातार बनी हुई मुद्रास्फीति दबावों को छिपा सकती है।
इसलिए भारत को अपेक्षित मुद्रास्फीति को मापने के लिए कहीं बेहतर तरीकों की आवश्यकता है। किराया समझौते, स्कूल-फीस अनुबंध, वेतन संशोधन, आपूर्तिकर्ता समझौते और मूल्य-वृद्धि प्रावधान वाले अनुबंध भविष्य की मुद्रास्फीति के बेहतर संकेत दे सकते हैं, बजाय घरेलू सर्वेक्षणों के। वित्तीय बाजार संकेतों का भी अधिक व्यवस्थित उपयोग किया जाना चाहिए और सर्वेक्षणों को वास्तविक परिणामों और हालिया शोध के आधार पर बेहतर ढंग से आंकने की आवश्यकता है।
यह भी जरूरी है कि भारत को यह ध्यान में रखकर ज्यादा शोध किया जाए कि मुद्रास्फीति अपेक्षाएं कैसे बनती हैं। तब तक, सक्षम और स्वतंत्र केंद्रीय बैंकरों द्वारा विवेकपूर्ण निर्णय लेना, पिछली मुद्रास्फीति संख्याओं पर ही टिके रहने की तुलना में अधिक उपयुक्त हो सकता है।
(लेखक इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस में अध्यापन करते हैं। ये उनके निजी विचार हैं)