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याद आएगी जनपथ की आवभगत, 50 साल बाद बंद होने जा रहा होटल

मानवी कपूर /  06 12, 2017

अग्निपथ पर जनपथ

राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली के बीचोबीच स्थित आईटीडीसी का जनपथ होटल
करीब 50 साल बाद होने जा रहा है बंद

कनॉट प्लेस और इसके चारों तरफ की सड़कों पर आज भी गुजरे जमाने की कई यादगार निशानियां मौजूद हैं। ऐसी ही एक निशानी जनपथ होटल है, जिसका परिचालन भारतीय पर्यटन विकास निगम (आईटीडीसी) करता है। लेकिन इस होटल को लेकर सरकार ने कुछ अलग ही योजना बनाई है, चार एकड़ में फैले इस होटल को जल्द ही कार्यालय में बदल दिया जाएगा। होटल में आने वाले ज्यादातर अतिथि इस बात से अनजान हैं।

अपराह्न 2 बजे टी लॉन्ज में सभी सीटें भरी हुई हैं और लॉबी में अतिथियों के साथ सामान ले जाते हुए परिचारकों की चहल-पहल है। फर्श पर मरम्मत नहीं होने के निशान दिखते हैं। बरामदे के नीचे रत्न एवं आभूषण स्टोर के भीतर दूर कोने में मचान और इलेक्ट्रिकल पाइप पड़े हुए हैं। ज्यादातर महंगे होटलों में फूलों की जैसी खुशबू आती है, मगर यहां की हवा में मंदिर की जैसी सुगंध का आभास होता है। शहर के शानदार होटलों- इंपीरियल, ली मैरिडियन शांगरी ला से जनपथ की दूरी बहुत कम है। जनपथ अन्य होटलों से ठीक उसी तरह अलग नजर आता है, जिस तरह मर्सिडीज, बीएमडब्ल्यू और ऑडी से भरे हुए गैराज में ऐंबेसडर। नरेंद्र मोदी सरकार ने घाटे वाले उपक्रमों पर और ज्यादा पैसा खर्च नहीं करने का फैसला किया है, इसलिए एयर इंडिया का निजीकरण किया जा सकता है और जनपथ को बंद किया जाएगा। 

सरकार के इस फैसले से होटल के टी लाउंज में काम करने वाले शाकिब खान बहुत चिंतित है। वह एक साल पहले ही इस होटल से जुड़े थे। उन्हें उम्मीद थी कि काम का बोझ बहुत ज्यादा भारी नहीं होगा। वह कहते हैं, 'अब मुझे लग रहा है कि मुझे फिर से निजी क्षेत्र में जाना पड़ेगा।' खान उन 230 अनुबंधित कर्मचारियों में से एक हैं, जो होटल में साफ-सफाई और खाद्य एवं पेय (एफऐंडबी) का प्रबंधन करते हैं। इस काम में 117 स्थायी कर्मचारी भी लगे हुए हैं। होटल के सभी लोगों के चेहरों पर चिंता की रेखाएं नजर आती हैं। खाद्य एवं पेय के एक अन्य कर्मचारी अमित मिश्रा कहते हैं, 'भले ही हम अनुबंधित कर्मचारी हैं, लेकिन हम सभी सरकार से अपना फैसला बदलने की प्रार्थना कर रहे हैं।'

वर्ष 1965 में बना जनपथ आईटीडीसी के तहत स्थापित होने वाला पहला होटल था। जब अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई वाली सरकार ने आईटीडीसी के होटलों के विनिवेश की योजना की घोषणा की थी, तब जनपथ इसलिए बच गया था क्योंकि इसके लिए बोलियां आरक्षित कीमत से कम की मिली थीं। इसे नया जीवन मिलना भी पूरी तरह आसान नहीं रहा। जब आईटीडीसी के होटलों की बिक्री की गई तो जनपथ का पड़ोसी कनिष्क भी इनमें से एक था। सच्चे पड़ोसी की भावना के तहत दोनों होटल साझा एयरकंडिशनिंग यूनिट इस्तेमाल करते थे। कनिष्क के नए मालिक ने यह साझेदारी बंद कर दी और जनपथ को अपने अतिथि बनाए रखने के लिए कड़ी जद्दोजहद करनी पड़ी। उस समय जनपथ का आगे का हिस्सा खुला था। अतिथि कक्ष का दिल्ली की भारी गर्मी से केवल हरे पेड़ों से बचाव होता था। 

सामग्री प्रबंधन एवं वितरण निरीक्षक और ऑल इंडिया आईटीडीसी वर्कर्स फेडरेशन के महासचिव राकेश भनोत कहते हैं, 'इस होटल के इतिहास में ऐसे तीन ही मोड़ आए, जब हमें नुकसान उठाना पड़ा। ये 1984 के दंगे, मुंबई में 1993 के धमाके और कनिष्क की बिक्री थी।' होटल को 2015-16 में 8.32 करोड़ रुपये का कर बाद लाभ हुआ था। 2015-16 ऐसा अंतिम वर्ष है, जिसके आंकड़े उपलब्ध हैं। यह लाभ तब हुआ, जब इसके 239 कमरों में से करीब 50 इस्तेमाल होते थे और भरे कमरों का औसत करीब 60 फीसदी है। उपयोग होने वाले हर कमरे के लिए करीब सात कर्मचारी हैं, जो विश्व के प्रमुख लक्जरी होटलों के आसपास है। इसमें 27,000 वर्ग फुट जगह खाली है। 

इस होटल के लिए करीब 38 साल काम कर चुके भनोत होटल को बंद करने में घोटाले का संदेह जताते हैं। वह कहते हैं, 'यह कदम केवल श्रम संगठनों को संतुष्ट करने के लिए उठाया जा रहा है। इसके बाद होटल को निजी कंपनियों को अन्य किसी लक्जरी होटल या मल्टीप्लेक्स के लिए बेच दिया जाएगा।' उनकी यह धारणा इस तथ्य पर आधारित है कि जब जनपथ के पड़ोसी कनिष्क और इंद्रप्रस्थ (पूर्व में अशोक यात्री निवास) का निजीकरण किया गया था, तब 900 कर्मचारियों में से केवल पांच को नौकरी पर रखा गया था। उनका मानना है कि अगर कुछ चीजों को दुरुस्त कर दिया जाए तो जनपथ में अब भी संभावनाएं मौजूद हैं।

आईटीडीसी के श्रमिक संगठन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त राज्यमंत्री अर्जुन राम मेघवाल को लिखे पत्र में यह उजागर किया है कि फैसले लेने में देरी के कारण किस तरह होटल को नुकसान पहुंचा है। इनमें सबसे रोचक यह था कि पांच साल में दूध के लिए निविदा पर फैसला नहीं लिया जा सका। भनोत कहते हैं, 'आप हमें चीजों को दुरुस्त करने की स्वायत्तता और आजादी दीजिए, मैं आपको वादा कर सकता हूं कि छह महीनों के भीतर हम बेहतर लाभ दिखा सकते हैं।'

आईटीडीसी ने इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। यह इमारत और इसकी आंतरिक सज्जा लक्जरी होटलों से मेल खाती है, लेकिन कार्यालय की जगह बदहाल है। फर्श पर की गई पच्चीकारी, बाहर निकले हुए सीवेज पाइप और दीवारों से हटता हुए पेंट अस्थायी व्यवस्था का अहसास कराते हैं। जनपथ की पहली और आखिरी मरम्मत 2010 में हुई थी। असल में नौकरशाही की अड़चनें जनपथ और होटल के साथ कारोबार करने वालों के लिए नुकसानदेह रही हैं। इसमें 27,000 वर्ग फुट जगह खाली पड़ी है, जिसमें पहले एक इतालवी रेस्टोरेंट सीबो था। रोहित बल इसके डिजाइनर और रचनात्मक सलाहकार थे। बल कहते हैं, 'यह दुर्लभ और असाधारण जगह थी, जो सुरक्षा और बुनियादी ढांचे के लिहाज से होटल का हिस्सा थी, लेकिन अलग प्रवेश और रसोईघर का फायदा भी था।'

वह कहते हैं कि उन्हें कारोबार का मामूली ज्ञान है, लेकिन उनका अनुभव शानदार रहा। वह कहते हैं, 'लेकिन एक दिन प्रशासन ने किराया दोगुना करने का फैसला किया और यह हमारे लिए घाटे का सौदा बन गया। यह निराशाजनक है कि दिल्ली में ऐसी ऐतिहासिक जगह पर ऐसे बढिय़ा रेस्टोरेंट को बंद करना पड़ा।' अशोक के पूर्व महाप्रबंधक (परिचालन) और जनपथ के पूर्व कर्मचारी अमरजीत सिंह तलवार का मानना है कि ऐसे अहम होटल को बंद करना बहुत बड़ी गलती है। उन्होंने कहा, 'इसमें कोई संदेह नहीं है कि होटल को चलाने में बहुत सी चुनौतियां हैं, लेकिन जनपथ यह साबित कर चुका है कि वह ठीक उसी तरह खुद को बड़े मुनाफे में ला सकता है, जिस तरह वह 2010 में मरम्मत के बाद आया था। ऐसी इमारत को कार्यालय में बदलना गलत फैसला होगा।'

तलवार इस बात से सहमत हैं कि इस होटल को रूप-रंग में बदलाव और इसकी जगह के बेहतर उपयोग की जरूरत है। उदाहरण के लिए इसमें शांगरी ला और ली मैरिडियन जैसे अपने प्रतिस्पर्धियों की तरह बड़ा बैठक कक्ष नहीं है। वह कहते हैं, 'तब भी जब इन होटलों में बड़े सम्मेलन होते हैं तो मध्यम स्तर के कार्याधिकारियों को जनपथ में ठहराया जाता है क्योंकि आयोजक लक्जरी होटलों में कमरों का किराया वहन नहीं कर सकते।' 

वेलकम हेरिटेज होटल्स (आईटीसी होटल्स) के पूर्व अध्यक्ष राकेश माथुर सरकार के इस फैसले के लिए एक शब्द 'बेतुका' का इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने कहा, 'दुनियाभर में देखिए। आपको न्यूयॉर्क, लंदन और पेरिस में कनॉट प्लेस जैसे पर्यटक केंद्र मिल जाएंगे। यहां कार्यालय बनाने की क्या तुक है?' वह आईटीडीसी की एक अन्य विनिवेश की गई संपत्ति कुतुब होटल का उदाहरण देते हैं, जिसमें आतिथ्य की भारी संभावनाएं थी, लेकिन उसे सरकारी कार्यालय की इमारत में तब्दील कर दिया गया। माथुर कहते हैं, 'हमें लुटियंस दिल्ली में कार्यालयों की क्यों जरूरत है? कार्यालय जनकपुरी या घाटकोपर (मुंबई)में बनाए जा सकते हैं। हमें ज्यादा पर्यटन संसाधनों की दरकार है।' लेकिन ऐसा लगता है कि जनपथ को अलविदा कहना होगा। 
Keyword: आईटीडीसी, जनपथ, होटल, कनॉट प्लेस, इंपीरियल, ली मैरिडियन, शांगरी ला, एयर इंडिया,
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