केंद्र सरकार ने कोयले से गैस बनाने के लिए शुक्रवार को 37,500 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन योजना के लिए प्रतिस्पर्धी बोली व्यवस्था की अधिसूचना जारी कर इसे शुरू कर दिया है। इस योजना के तहत कम वित्तीय प्रोत्साहन की मांग करने वाले बोलीदाताओं को मूल्यांकन में उच्च अंक मिलेंगे। इसमें सब्सिडी की सीमा, काम की प्रगति के आधार पर भुगतान और परियोजना में देरी होने पर जुर्माने का प्रावधान किया गया है।
कोयला मंत्रालय ने अधिसूचना के ब्योरे में बताया कि निर्धारित मानदंडों के तहत वित्तीय प्रोत्साहन का कम हिस्सा मांगने वाली बोलियों को उच्च मूल्यांकन अंक मिलेंगे। इस योजना के तहत पात्र संयंत्रों और मशीनरी की लागत की 20 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता मिलती है।
सरकार ने प्रोत्साहन राशि किसी एक के पास जाने की स्थिति को रोकने के लिए सुरक्षा उपाय भी पेश किए हैं। किसी भी एकल परियोजना के लिए वित्तीय सहायता 5,000 करोड़ रुपये तक सीमित है और किसी भी कॉर्पोरेट समूह, जिसमें उसकी होल्डिंग, सहायक और संबद्ध कंपनियां शामिल हैं, के लिए 12,000 करोड़ रुपये की सीमा निर्धारित की गई है।
इसके अतिरिक्त यूरिया और सिंथेटिक प्राकृतिक गैस परियोजनाओं को छोड़कर, किसी भी व्यक्तिगत डाउनस्ट्रीम उत्पाद के लिए प्रोत्साहन राशि 9,000 करोड़ रुपये तक सीमित होगी। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मई में कोयले और लिग्नाइट से गैस की परियोजनाओं को प्रोत्साहन देने के लिए योजना को मंजूरी दी थी।
इसके लिए अधिसूचना जारी कर इसे मूर्त रूप दिया गया है। इस योजना का उद्देश्य घरेलू कोयले को सिनगैस में परिवर्तित करने वाली कोयला और लिग्नाइट गैस परियोजनाओं को बढ़ावा देना है, जिससे मेथनॉल, अमोनिया, सिंथेटिक प्राकृतिक गैस (एसएनजी), हाइड्रोजन, उर्वरक और अन्य रसायनों का उत्पादन हो सके। इस योजना का लक्ष्य लगभग 7.5 करोड़ टन कोयले और लिग्नाइट से गैस बनाने में सक्षम परियोजनाओं की मदद करना है जिससे 2030 तक 10 करोड़ टन कोयला से गैस के भारत के लक्ष्य की ओर बढ़ा जा सकेगा।
इस पहल का मकसद भूराजनीतिक अनिश्चितताओं और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधानों के बीच आयातित ईंधन और औद्योगिक फीडस्टॉक पर निर्भरता कम करना है। केंद्र का अनुमान है कि कोयले से गैस बनाने के दौरान जो उत्पाद तैयार होंगे, उनके आयात पर वित्त वर्ष 2025 में लगभग 2.77 लाख करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। उम्मीद है कि इस योजना से करीब 25 परियोजनाओं में 2.5 से 3 लाख करोड़ रुपये का निवेश आएगा।
अधिसूचना में परियोजना पर काम करने की सख्त समयसीमा तय की गई है और काम करने के विभिन्न स्तर पर पहुंचने पर 4 किस्तों में प्रोत्साहन राशि जारी करने का प्रावधान है। डेवलपरों द्वारा भूमि, पर्यावरण मंजूरी, कोयला लिंकेज, प्रौद्योगिकी के लिए समझौता, एक ईपीसी (इंजीनियरिंग, खरीद और निर्माण) ठेकेदार की नियुक्ति और बैंकों से वित्तीय क्लोजर सुरक्षित करने के बाद पहली किस्त (25%) जारी की जाएगी। बाद के भुगतान पूंजीगत व्यय, कमीशनिंग और उत्पादन क्षमता के लक्ष्यों की उपलब्धि से जुड़े होंगे।
परियोजना लागू करने की समय सीमा चूकने वाले डेवलपरों पर आर्थिक जुर्माना लगेगा। मंत्रालय के साथ समझौते पर हस्ताक्षर करने के पांच से छह साल के भीतर परियोजनाओं को चालू करने वाले डेवलपरों को शेष प्रोत्साहन का केवल आधा हिस्सा मिलेगा, जबकि छह से सात साल के भीतर चालू करने वालों को केवल एक-चौथाई मिलेगा। सात साल से अधिक की देरी होने पर सभी लंबित प्रोत्साहन राशि जब्त कर ली जाएगी।
अधिसूचना में यह भी साफ किया गया है कि केवल नए संयंत्र और मशीनरी ही प्रोत्साहन राशि के पात्र होंगे। रिफर्बिश्ड और सेकंड हैंड उपकरणों को इससे बाहर रखा गया है। इसमें यह भी साफ किया गया है कि सरकार की सहायता को परियोजना डेवलपर द्वारा वित्तीय संरचना, ऋण वित्तपोषण, या वित्तीय क्लोजर के लिए इक्विटी योगदान के रूप में नहीं माना जा सकता है।
मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि उत्पादों की खरीद सुरक्षित करने की जिम्मेदारी परियोजना डेवलपरों की होगी। इस योजना में प्रौद्योगिकी को लेकर तटस्थ दृष्टिकोण अपनाया गया है।
डेवलपर अपने कारोबार के लिहाज से व्यावहारिक तकनीक चुन सकेंगे और स्वदेशी तकनीक को भी प्रोत्साहित किया गया है। योजना पर चल रहे काम की निगरानी के लिए केंद्र ने व्यय सचिव की अध्यक्षता में सचिवों का अधिकार प्राप्त समूह बनाया है।