भारत के राज्य-स्तरीय राजकोषीय नियमों से समग्र घाटा सुधर गया है लेकिन यह लाभ बेहद कमजोर व असमान है। इसका कारण यह है कि अभी भी प्रमुख राज्य उच्च ऋण स्तरों से जूझ रहे हैं। यह जानकारी विश्व बैंक की 16वें वित्त आयोग को भेजी रिपोर्ट में दी गई है।
रिपोर्ट के अनुसार राजकोषीय जवाबदेही कानून (एफआरएल ) को अपनाए दो दशक हो गए हैं। हालांकि अत्यधिक ऋणग्रस्त राज्यों जैसे केरल, पंजाब, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल ने उच्च ऋण स्तर और राजकोषीय अंतर को बढ़ाया है। इससे इन राज्यों के ऋण का स्तर अन्य राज्यों के अनुरूप नहीं है।
रिपोर्ट ‘फ्रॉम पॉलिसी टू परफॉर्मेंस : एनॉलाइजिंग इंडियाज सबनैशनल फिजक्ल रूल्स’ के अनुसार ‘कई राज्यों ने 2000 के दशक के मध्य में एफआरएल अपनाया था। इससे पहले इन राज्यों का उच्च स्तर का ऋण व वित्तीय घाटा था। एफआरएल अपनाने के बाद भी कई राज्यों का ऋण व राजकोषीय घाटा अधिक रहा। हालांकि कुछ राज्य जैसे गुजरात अपने ऋण स्तर को सार्थक रूप से घटाने में सफल रहे। गुजरात का ऋण जीएसडीपी के 30 प्रतिशत से अधिक था लेकिन अब यह घटकर 20 प्रतिशत पर आ गया है। हालांकि अन्य राज्यों जैसे पंजाब और राजस्थान का ऋण का स्तर उच्च बना हुआ है।’
विश्व बैंक ने सात प्रमुख राज्यों – आंध्र प्रदेश, हरियाणा, केरल, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल का विश्लेषण किया। इसके अनुसार बढ़ती आकस्मिक देयताओं, बजट से इतर उधार लेने व वेतन, पेंशन व ब्याज पर उच्च प्रतिबद्ध व्यय ने इन राज्यों में ऋण का स्तर बढ़ा दिया है।
रिपोर्ट में ऐतिहासिक संदर्भ का हवाला देते हुए बताया गया कि वित्तीय नियमों को अपनाने का संबंध उप-राष्ट्रीय वित्तीय घाटे में कमी से है, लेकिन समेकन अक्सर टिकाऊ राजस्व व संरचनात्मक सुधारों के बजाय पूंजीगत व्यय व विकास संबंधी राजस्व व्यय की कीमत पर आता है।
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘अपेक्षाकृत धनी राज्यों में समेकन के दौरान राजस्व संग्रह ने वित्तीय घाटे में सुधार में योगदान नहीं दिया। इसके बजाय पूंजीगत व्यय और विकास संबंधी (राजस्व) व्यय में कटौती से समेकन प्रयासों का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा था।’ इस रिपोर्ट में केंद्रीय सिफारिश एक समान 3 प्रतिशत राजकोषीय घाटे की सीमा से हटकर विभेदित, ऋण-आधारित शासन की ओर बढ़ने के लिए कहा गया है।