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Editorial: गरीबी का मुकाबला

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एक ओर जहां शहरी इलाके में 5.27 फीसदी आबादी को बहुआयामी गरीबी वाला बताया गया वहां ग्रामीण इलाकों में यह 19.28 फीसदी है।

Last Updated- July 18, 2023 | 10:06 PM IST
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भारत ने बहुआयामी गरीबी कम करने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। नीति आयोग (Niti Ayog) द्वारा तैयार नैशनल मल्टीडाइमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स: अ प्रोग्रेस रिव्यू 2023 के मुताबिक बहुआयामी गरीबी वाली आबादी की संख्या 2015-16 के 24.85 फीसदी से कम होकर 2019-21 तक 14.96 फीसदी रह गई।

एक अनुमान के मुताबिक इस अवधि में कुल मिलाकर 13.5 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर निकले। यह सूचकांक संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम तथा ऑक्सफर्ड पॉवर्टी ऐंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनी​शिएटिव ने साथ मिलकर तैयार किया है।

गरीबी के आकलन में आय को पैमाना मानने के पारंपरिक तरीके के उलट बहुआयामी गरीबी सूचकांक में स्वास्थ्य, ​शिक्षा और जीवन स्तर जैसे मानकों को ध्यान में रखा जाता है। राष्ट्रीय स्तर पर देखा जाए तो यह सूचकांक सतत विकास लक्ष्यों की प्रा​प्ति की दिशा में प्रगति का एक अहम सूचक है। इन लक्ष्यों में से एक यह भी है कि हर प्रकार की गरीबी में जी रहे लोगों की तादाद आधी की जा सके।

नीति आयोग की बेसलाइन रिपोर्ट 2021 में प्रका​शित की गई थी जो राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के चौथे दौर पर आधारित थी जो 2015-16 में किया गया था। ताजा रिपोर्ट पांचवें दौर के सर्वेक्षण पर आधारित है जो 2019-21 में किया गया।

संकेतकों की बात करें तो राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक में वै​श्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक के 10 मानक शामिल हैं जो राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को शामिल किए हुए हैं। इसमें मातृ स्वास्थ्य और बैंक खाते भी शामिल हैं। स्वास्थ्य के पहलुओं में पोषण और मातृत्व स्वास्थ्य शामिल है। ​शिक्षा के पहलू में स्कूल में उ​प​स्थिति और पढ़ाई के वर्ष शामिल हैं जबकि जीवनस्तर में व्यापक संकेतक मसलन स्वच्छता, पेय जल, आवास और बैंक खाते शामिल हैं।

बिहार में सबसे अधिक गिरावट

रिपोर्ट काफी व्यापक है और यह सभी 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को समेटे है। 707 प्रशासनिक जिलों के लिए सभी 12 संकेतक शामिल किए गए हैं। इस संदर्भ में रिपोर्ट शहरी और ग्रामीण भारत में गरीबी के स्तर में अहम अंतर को रेखांकित करती है। एक ओर जहां शहरी इलाके में 5.27 फीसदी आबादी को बहुआयामी गरीबी वाला बताया गया वहां ग्रामीण इलाकों में यह 19.28 फीसदी है।

जिन राज्यों में ज्यादा लोग गरीब इलाकों में रहते हैं उन्हें अपना जीवन स्तर सुधारने के लिए अधिक मेहनत करनी होगी। उदाहरण के लिए बिहार में सबसे अधिक गिरावट देखने को​ मिली है लेकिन अभी भी उसकी 34 फीसदी आबादी बहुआयामी गरीबी की ​शिकार है। केरल में यह आंकड़ा 0.55 फीसदी है।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ सर्वेक्षण के आंकड़ों के आधार पर बहुआयामी गरीबी में उल्लेखनीय कमी का स्वागत किया जाना चाहिए। चूंकि आंकड़ों के अनुसार भारत अब दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाला देश है इसलिए इस दिशा में प्रगति मायने रखती है। बहरहाल, अब तक इस दिशा में प्रगति को देखते हुए नीतिगत स्तर पर ध्यान भटकना नहीं चाहिए।

भारत आज भी बहुआयामी गरीबी के मामले में सबसे बड़ी आबादी वाला देश

उदाहरण के लिए भारत आज भी बहुआयामी गरीबी के मामले में सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। आंकड़े बताते हैं कि यहां क्षेत्रवार भी काफी अंतर है जो सामाजिक-राजनीतिक तनाव की वजह बन सकता है। यह अच्छी बात है कि दिए गए मानकों पर ज्यादा लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आ रहे हैं लेकिन यह पर्याप्त नहीं है।

उदाहरण के लिए सूचकांक स्कूली अध्ययन के वर्षों को गिनता है लेकिन यह बात हम सभी जानते हैं कि देश के अ​धिकांश स्कूलों में ​शिक्षा की गुणवत्ता वांछित स्तर से बहुत कम है। एक अन्य पहलू जिसने देश के विकास को बा​धित किया है वह है बढ़ती श्रम श​क्ति के लिए गुणवत्तापूर्ण रोजगार की कमी।

सरकार की भूमिका जहां स्वच्छता जैसी सुविधाएं देने की है, वहीं बेहतर रोजगार संभावनाएं लोगों को पोषण, स्वास्थ्य और ​शिक्षा पर अधिक व्यय करने का अवसर देती हैं। इसलिए सार्वजनिक बेहतरी के प्रावधान मजबूत करने के अलावा नीतिगत स्तर पर भी रोजगार संभावनाओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए। इन दोनों के स​म्मिश्रण से बहुआयामी गरीबी में तेज और सार्थक कमी आएगी।

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First Published - July 18, 2023 | 10:06 PM IST

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