facebookmetapixel
Advertisement
रूसी तेल खरीद पर भारत पर 100% अमेरिकी शुल्क का प्रस्ताव, संशोधित प्रतिबंध विधेयक से बढ़ सकती है चुनौतीकैबिनेट ने सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 को दी मंजूरी, ₹1.27 लाख करोड़ की योजना से चिप और मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग को मिलेगा बूस्ट ₹250 वाली छोटी SIP का बढ़ा दायरा, लेकिन निवेश बंद होने की दर अब भी चिंता का विषयEditorial: सेवा उत्पादन सूचकांक से मिलेगी अर्थव्यवस्था की सटीक तस्वीरमानव पूंजी की खाई पाटे बिना अधूरा रहेगा भारत का विकासAI से एंट्री-लेवल नौकरियों पर खतरा, स्किलिंग बनी राष्ट्रीय प्राथमिकताInstamart-HPCL की साझेदारी, अब ऑन-डिमांड मिलेगी 10 किलो HP Navya LPG सिलिंडर की डिलिवरीAI से खुलेंगे आईटी कंपनियों के लिए नए अवसर, ग्राहकों को बदलाव में मदद करने की बेहतर स्थिति में हैं: प्रेमजीCCI के समझौता ढांचे को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती, उपभोक्ताओं के अधिकारों की अनदेखी का आरोपIPO प्राइस से नीचे फिसला SpaceX का शेयर, निवेशकों की बढ़ी चिंता; वैल्यूएशन पर फिर उठे सवाल

जाने माने खगोल वैज्ञानिक जयंत नारलीकर का पुणे में निधन 

Advertisement

डॉ. नारलीकर को ब्रह्मांड विज्ञान में उनके योगदान, विज्ञान को लोकप्रिय और देश में प्रमुख अनुसंधान संस्थानों की स्थापना के लिए जाना जाता है।

Last Updated- May 21, 2025 | 12:05 AM IST
Scientist Jayant Narlikar

प्रख्यात खगोल वैज्ञानिक, सरल तरीकों से विज्ञान को लोगों को रूबरू कराने वाले पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. जयंत विष्णु नारलीकर का मंगलवार को पुणे में निधन हो गया। वह 86 वर्ष के थे। उनके परिवार के सूत्रों ने यह जानकारी दी। भारतीय विज्ञान जगत की जानी-मानी हस्ती डॉ. नारलीकर को व्यापक रूप से ब्रह्मांड विज्ञान में उनके अग्रणी योगदान, विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के उनके प्रयासों और देश में प्रमुख अनुसंधान संस्थानों की स्थापना के लिए जाना जाता था। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने घोषणा की कि उनका अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा। हाल में पुणे के एक अस्पताल में उनके कूल्हे की सर्जरी हुई थी। उनके परिवार में तीन बेटियां हैं।

19 जुलाई 1938 को जन्मे डॉ. नारलीकर ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) परिसर में ही पूरी की, जहां उनके पिता विष्णु वासुदेव नारलीकर प्रोफेसर और गणित विभाग के प्रमुख थे। इसके बाद वह उच्च अध्ययन के लिए कैम्ब्रिज चले गए, जहां उन्हें ‘मैथेमैटिकल ट्रिपोस’ में ‘रैंगलर’ और ‘टायसन’ पदक मिला। वह भारत लौटकर टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (टीआईएफआर) (1972-1989) से जुड़ गए, जहां उनके प्रभार में सैद्धांतिक खगोल भौतिकी समूह का विस्तार हुआ और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त हुई।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने 1988 में प्रस्तावित अंतर-विश्वविद्यालय खगोल विज्ञान और खगोल भौतिकी केंद्र (आईयूसीएए) की स्थापना के लिए डॉ. नारलीकर को इसके संस्थापक निदेशक के रूप में आमंत्रित किया। वर्ष 2003 में अपनी सेवानिवृत्ति तक वह आईयूसीएए के निदेशक रहे। उनके निर्देशन में आईयूसीएए ने खगोल विज्ञान और खगोल भौतिकी में शिक्षण एवं अनुसंधान के क्षेत्र में उत्कृष्टता केंद्र के रूप में दुनिया भर में ख्याति प्राप्त की। 

Advertisement
First Published - May 20, 2025 | 11:27 PM IST (बिजनेस स्टैंडर्ड के स्टाफ ने इस रिपोर्ट की हेडलाइन और फोटो ही बदली है, बाकी खबर एक साझा समाचार स्रोत से बिना किसी बदलाव के प्रकाशित हुई है।)

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement