भारत में स्मार्टफोन खरीदने वालों के लिए पिछले कुछ समय में फोन महंगे हुए हैं। इसका असर खास तौर पर कम बजट वाले ग्राहकों पर पड़ा है। वहीं, दूसरी तरफ इस महंगाई ने भारतीय स्मार्टफोन कंपनियों के लिए एक ऐसी जगह बना दी है, जहां अब मुकाबला पहले के मुकाबले कम नजर आ रहा है।
20 हजार रुपये से कम कीमत वाले सेगमेंट में कई बड़े और पुराने ब्रांडों की मौजूदगी धीरे-धीरे कम हुई है। इसी खाली जगह को भरने के लिए कुछ नए भारतीय ब्रांड स्मार्टफोन बाजार में उतर रहे हैं। स्मार्टवॉच और ऑडियो प्रोडक्ट्स के लिए पहचानी जाने वाली फायर-बोल्ट ने स्मार्टफोन कैटेगरी में कदम रखा है। वहीं, एक और भारतीय एक्सेसरीज ब्रांड मिवी भी जल्द स्मार्टफोन बाजार में उतरने की तैयारी कर रहा है।
लेकिन इन कंपनियों के सामने चुनौती सिर्फ फोन बेचने की नहीं है। शुरुआती बिक्री के बाद ग्राहकों को लंबे समय तक अपने साथ जोड़े रखना और मुनाफा कमाना इनके लिए बड़ा सवाल होगा।
IDC इंडिया के एसोसिएट वाइस प्रेसिडेंट नवकेंदर सिंह के मुताबिक 20-25 हजार रुपये से कम कीमत वाले फोन में अभी अच्छी संभावनाएं हैं। इसकी बड़ी वजह यह है कि कई पुराने और बड़े ब्रांड इस सेगमेंट से पीछे हट चुके हैं या यहां पहले जैसी मजबूती से मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं।
टेकआर्क के फाउंडर और चीफ एनालिस्ट फैसल कावूसा का अनुमान है कि भारत में अभी करीब 4 करोड़ 4G स्मार्टफोन की जरूरत है। यह मांग मुख्य रूप से एंट्री-लेवल कैटेगरी में है। उनके मुताबिक अगर इसी कीमत के आसपास 5G फोन उपलब्ध कराए जाएं तो इस मांग का एक बड़ा हिस्सा पूरा किया जा सकता है।
हालांकि कम कीमत में फोन बनाना कंपनियों के लिए आसान नहीं है। ओमडिया के मुताबिक बजट स्मार्टफोन में मेमोरी और स्टोरेज की लागत अब फोन के कुल बिल ऑफ मटेरियल यानी निर्माण लागत का 60 फीसदी से ज्यादा है। ऐसे में कंपनियों के सामने फोन की कीमत बढ़ाने या अपना मार्जिन कम करने का विकल्प बचता है।
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इसी माहौल में फायर-बोल्ट ने स्मार्टफोन बाजार में कदम रखा है। बोल्ट के फाउंडर और CEO अर्नव किशोर का मानना है कि किसी मजबूत भारतीय ब्रांड के लिए स्मार्टफोन बाजार में आने का यह सही समय है।
कंपनी का कहना है कि आज ग्राहक केवल ज्यादा स्पेसिफिकेशन नहीं चाहते, बल्कि ऐसा फोन चाहते हैं जिसमें उन्हें इस्तेमाल के दौरान बेहतर अनुभव मिले। भारत में अभी बड़ी संख्या में लोग पुराने 4G स्मार्टफोन, फीचर फोन या शुरुआती स्तर के डिवाइस इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे ग्राहक नए ब्रांडों के लिए संभावित बाजार बन सकते हैं।
बोल्ट के शुरुआती फोन 10 हजार से 15 हजार रुपये के सेगमेंट में हैं। हालांकि कंपनी खुद को सिर्फ इसी कीमत तक सीमित नहीं रखना चाहती। किशोर के मुताबिक शुरुआती फोन के जरिए कंपनी ब्रांड, प्रोडक्ट और सर्विस नेटवर्क को मजबूत करना चाहती है। इसके बाद कंपनी ज्यादा कीमत वाले सेगमेंट में अलग तरह के डिवाइस लाने की योजना बना रही है।
मिवी भी जल्द इस बाजार में आने की तैयारी में है। कंपनी अभी स्मार्टफोन एक्सेसरीज के कारोबार के लिए जानी जाती है।
भारत में लावा और माइक्रोमैक्स जैसे ब्रांड पहले भी घरेलू स्मार्टफोन कंपनियों के तौर पर मजबूत पहचान बना चुके हैं। लेकिन फैसल कावूसा के मुताबिक पिछली पीढ़ी की भारतीय कंपनियों की एक बड़ी कमजोरी यह रही कि वे ज्यादा कीमत वाले सेगमेंट में अपनी जगह नहीं बना पाईं।
नई कंपनियां शुरुआत से ही प्रोडक्ट, ब्रांडिंग और डिस्ट्रीब्यूशन पर एक साथ काम करने की कोशिश कर रही हैं। उनका मकसद सिर्फ सस्ता फोन बेचकर बाजार में जगह बनाना नहीं, बल्कि आगे चलकर ज्यादा कीमत वाले फोन भी पेश करना है।
कावूसा के मुताबिक नई कंपनियां शुरुआती दौर में कमाई से ज्यादा बाजार हिस्सेदारी पर ध्यान दे सकती हैं। अगर जरूरत पड़ी तो बढ़ती कंपोनेंट लागत का कुछ हिस्सा खुद उठाकर फोन की कीमत को कम रखने की कोशिश भी कर सकती हैं।
AI+ का उदाहरण भी इसी बदलाव को दिखाता है। कावूसा ने कॉमेडियन समय रैना के साथ ब्रांड की पहचान बनाने की कोशिश को जेन जी तक पहुंचने की रणनीति के उदाहरण के तौर पर बताया। उनके मुताबिक पहले की भारतीय स्मार्टफोन कंपनियां युवा ग्राहकों के बीच ऐसी प्रासंगिकता बनाने में कमजोर रही थीं।
लावा उन भारतीय कंपनियों में है जो मुश्किल दौर के बावजूद स्मार्टफोन कारोबार में बनी रही। कंपनी का कहना है कि वह 30 हजार रुपये से कम कीमत वाले सेगमेंट पर अपना ध्यान बनाए रखेगी।
लावा के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और प्रोडक्ट हेड सुमित सिंह के मुताबिक भारत के स्मार्टफोन बाजार में 70 फीसदी से ज्यादा ग्राहक अभी भी 30 हजार रुपये से कम कीमत वाले फोन खरीदते हैं। कंपनी इसी बड़े बाजार में प्रीमियम फीचर्स को ज्यादा ग्राहकों तक पहुंचाने का मौका देख रही है।
लावा के मुताबिक सिर्फ स्पेसिफिकेशन से ग्राहक को लंबे समय तक जोड़े रखना मुश्किल है। सॉफ्टवेयर अपडेट, बिक्री के बाद की सर्विस और ब्रांड पर भरोसा भी अब खरीदारी के फैसले में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
कंपनी का अपना मैन्युफैक्चरिंग और R&D नेटवर्क भी है। नोएडा में उसकी नई कंपोनेंट फैसिलिटी की सालाना क्षमता करीब 90 लाख चार्जर और कंपोनेंट की है। कंपनी के अनुसार स्थानीय सोर्सिंग और इन-हाउस डिजाइन की वजह से चार्जर की लागत आयात की तुलना में करीब 20 फीसदी कम हुई है। आने वाले पांच साल में लावा कैमरा और डिस्प्ले मॉड्यूल, एनक्लोजर और मल्टी-लेयर PCB जैसे हिस्सों में भी निवेश करने की योजना बना रही है।
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स्थानीय उत्पादन भारतीय कंपनियों को लागत पर कुछ फायदा दे सकता है, लेकिन स्मार्टफोन बनाने के लिए भारत अभी पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है। कई जरूरी कंपोनेंट अब भी दूसरे देशों से मंगाने पड़ते हैं।
ऐसे में नई भारतीय कंपनियों के लिए छोटे संगठन का फायदा हो सकता है। वे बड़े ब्रांडों की तुलना में कम मार्जिन पर काम करके शुरुआती दौर में ग्राहक जुटाने की कोशिश कर सकती हैं।
फैसल कावूसा के मुताबिक सरकार की नई MPMS योजना से भी भारतीय कंपनियों को करीब 3 फीसदी का अतिरिक्त फायदा मिल सकता है। इससे विदेशी ब्रांडों के मुकाबले लागत का अंतर कुछ कम करने में मदद मिल सकती है।
महंगे होते स्मार्टफोन बाजार में ग्राहक खरीदारी के दूसरे रास्ते भी अपना रहे हैं। अप्रैल-जून 2026 में भारत में स्मार्टफोन शिपमेंट सालाना आधार पर 11.1 फीसदी घटकर 3.32 करोड़ यूनिट रह गई। वहीं, 2026 की पहली छमाही में बाजार की वैल्यू 3.6 फीसदी बढ़ी।
लोग अब पुराने फोन को ज्यादा समय तक चला रहे हैं। इसके साथ EMI के जरिए फोन खरीदने का चलन भी बढ़ा है। भारत के Tier-2 मेनलाइन बाजार में दूसरी तिमाही में स्मार्टफोन की 57.5 फीसदी खरीद EMI के जरिए हुई, जबकि एक साल पहले यह आंकड़ा 44 फीसदी था।
IDC के नवकेंदर सिंह का मानना है कि मौजूदा मौका भारतीय ब्रांडों के लिए स्थायी बदलाव नहीं भी हो सकता है। उनके मुताबिक यह स्थिति करीब 1 से 1.5 साल तक रह सकती है।
इसलिए नए ब्रांडों के लिए पहली बिक्री के बाद असली परीक्षा शुरू होगी। अगले 3 से 5 साल में उन्हें सिर्फ नए ग्राहक जोड़ने के बजाय मुनाफा कमाने की स्थिति में आना होगा। साथ ही पुराने ग्राहकों के फोन बदलने का समय आने पर उन्हें दोबारा उसी ब्रांड का फोन खरीदने की वजह भी देनी होगी।