Lt Gen Vipul Singhal
AI Impact Summit 2026: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का दायरा तेजी से बढ़ रहा है और अब यह रक्षा क्षेत्र तक भी पहुंच चुका है। ऐसे समय में सेना की कमान और अंतिम निर्णय लेने की जिम्मेदारी को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठ रहे हैं। इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में संबोधित करते हुए लेफ्टिनेंट जनरल विपुल सिंघल ने स्पष्ट कहा कि तकनीक चाहे कितनी भी उन्नत क्यों न हो जाए, सैन्य मामलों में मानव निर्णय, नैतिक जिम्मेदारी और कमांड अथॉरिटी सर्वोपरि रहनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि एआई निर्णय प्रक्रिया को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है, लेकिन अंतिम फैसला लेने और उसकी जिम्मेदारी उठाने का अधिकार केवल इंसान के पास ही होना चाहिए। उनके अनुसार एआई की गति, क्षमता और दक्षता अभूतपूर्व है, लेकिन इसके साथ नेतृत्व, जवाबदेही और रणनीतिक स्थिरता पर नए दबाव भी आते हैं, जिन पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
लेफ्टिनेंट जनरल सिंघल ने कहा कि सशस्त्र बलों के भीतर कुछ बुनियादी प्रश्नों पर स्पष्ट सोच विकसित करना जरूरी है। उन्होंने पहला सवाल उठाया कि कौन से फैसले ऐसे हैं जो कमांडर के पास ही रहने चाहिए और किन्हें डेटा या एल्गोरिदम के हवाले किया जा सकता है।
उन्होंने दोहराया कि चाहे एआई कितनी भी सटीक क्यों न हो जाए, नैतिक जिम्मेदारी और कमांड की शक्ति इंसानों के हाथ में ही रहनी चाहिए।
दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा एआई सिस्टम के प्रशिक्षण और डेटा की गुणवत्ता से जुड़ा है। उन्होंने पूछा कि क्या हमारी एंगेजमेंट की नीतियां और सुरक्षा ढांचा उन सिस्टम्स के अनुरूप हैं जो डेटा पर आधारित निर्णय लेते हैं। क्या हमें पूरी तरह समझ है कि ये सिस्टम किन धारणाओं पर काम करते हैं और इन्हें किस तरह के डेटा से प्रशिक्षित किया गया है।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि पारंपरिक हथियारों की तरह क्या एआई आधारित सिस्टम्स को भी उतनी ही कठोर परीक्षण प्रक्रिया से गुजारा जा रहा है। सामान्य तौर पर नए हथियारों को तैनाती से पहले विभिन्न परिस्थितियों में परखा जाता है। उन्होंने कहा कि एआई से संचालित सिस्टम को केवल सॉफ्टवेयर समझना गलत है, यह भी एक प्रकार का हथियार है, इसलिए इसके परीक्षण और मूल्यांकन में कोई ढील नहीं होनी चाहिए।
अपने संबोधन के दौरान लेफ्टिनेंट जनरल Vipul Singhal ने एक हालिया सैन्य अभियान का उदाहरण भी साझा किया। उन्होंने बताया कि एक तेज गति वाले ऑपरेशन के दौरान एक वरिष्ठ कमांडर को एआई सिस्टम ने तत्काल लक्ष्य पर हमला करने की सिफारिश की थी। सिस्टम ने कई सेंसर इनपुट के आधार पर उच्च संभावना का संकेत दिया था और निर्णय लेने के लिए समय बहुत कम था।
इसके बावजूद कमांडर ने तुरंत कार्रवाई करने के बजाय कुछ क्षण रुककर स्थिति का आकलन किया। उन्हें संदेह हुआ कि शायद सिस्टम ने कुछ अहम जानकारी को शामिल नहीं किया है। बाद में पता चला कि जिस क्षेत्र में लक्ष्य था वहां से नागरिकों की निकासी शुरू हो चुकी थी, जिसकी जानकारी एआई सिस्टम के डेटा में शामिल नहीं थी। कमांडर ने हमले को रोक दिया, जिससे संभावित नागरिक हताहतों से बचा जा सका। बाद में मिशन को सफलतापूर्वक पूरा किया गया।
इस उदाहरण के जरिए उन्होंने स्पष्ट किया कि मानवीय विवेक की भूमिका अब भी निर्णायक है।
लेफ्टिनेंट जनरल सिंघल ने भारत की एआई गवर्नेंस गाइडलाइंस का भी उल्लेख किया और कहा कि यह एक व्यावहारिक ढांचा प्रदान करती हैं। उन्होंने बताया कि एआई की प्रकृति संभावनाओं पर आधारित, जनरेटिव और अनुकूलनशील होती है, जिससे अनपेक्षित परिणाम भी सामने आ सकते हैं। इसलिए संतुलित नियमन आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि सैन्य नेतृत्व को तकनीक की समझ विकसित करनी होगी। उन्हें इसके फायदे, सीमाएं और संभावित जोखिमों के बारे में जागरूक रहना चाहिए, साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि नई तकनीक को यूनिट स्तर तक सही तरीके से अपनाया जाए।
एआई को लेकर भारतीय सशस्त्र बलों की तैयारी पर उन्होंने कहा कि सेना इस तकनीक की परिवर्तनकारी क्षमता को अच्छी तरह समझती है। ऑपरेशनल दक्षता बढ़ाने, निर्णय सहयोग प्रणाली को मजबूत करने, निगरानी और टोही जैसे क्षेत्रों में एआई को शामिल करने की दिशा में प्रयास जारी हैं।
उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि मानव समाज ने नई तकनीकों के साथ संतुलन बनाना सीखा है। परमाणु, जैविक और रासायनिक हथियारों के उपयोग को लेकर बने नियम, लैंडमाइंस से संबंधित ढांचे और जिनेवा कन्वेंशन जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रावधान समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं।
उनका विश्वास है कि एआई जैसी उभरती तकनीक के लिए भी उपयुक्त नियम और नियंत्रण तंत्र विकसित किए जाएंगे। अंततः तकनीक चाहे कितनी भी एडवांस हो, जिम्मेदारी और अंतिम निर्णय इंसानी विवेक के आधार पर ही लिया जाएगा।