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सरसों के खेतों से मिलेनियम सिटी बनने तक का सफर: कैसे 1991 के आर्थिक सुधारों ने बदल दी गुरुग्राम की पूरी तस्वीर

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1990 के दशक के सुनसान गुरुग्राम का आर्थिक सुधारों के बाद कायाकल्प हो गया। निजी डेवलपर्स की मदद से यह धूल भरा इलाका आज वैश्विक कंपनियों का आर्थिक हब बन चुका है

Last Updated- September 17, 2026 | 9:26 PM IST
Gurugram
गुरुग्राम शहर | फाइल फोटो

जो लोग 1990 के दशक में गुरुग्राम गए होंगे, जिसे बाद में ‘मिलेनियम सिटी’ और 2016 से गुरुग्राम के नाम से जाना जाने लगा, उन्हें वहां की कुछ बातें जरूर याद होंगी। उस समय यह इलाका धूल भरा और सुनसान था। कई हिस्सों में दूर-दूर तक कुछ खास नजर नहीं आता था और आबादी भी बहुत कम थी। 80 वर्षीय वेंचर कैपिटल विशेषज्ञ सौरभ श्रीवास्तव ने उस दौर के गुरुग्राम को कई बार देखा है। उन्हें दिल्ली से गुरुग्राम जाने वाले हाईवे के आसपास की कच्ची सड़कें आज भी याद हैं।

इंडियन ऐंजल नेटवर्क के सह संस्थापक श्रीवास्तव कहते हैं, ‘ अपनी आंखों पर यकीन नहीं होता है। मुझे आज भी याद है कि यहां कच्ची सड़कें थीं और दूर-दूर तक सरसों के खेत दिखाई देते थे। मैंने यहां एक फार्महाउस खरीदने के बारे में भी सोचा था।’

डीएलएफ लिमिटेड के मुख्य कारोबार अधिकारी और डीएलएफ होम डेवलपर्स के प्रबंध निदेशक आकाश ओहरी को गुरुग्राम के बारे में पहली याद 1992 की है। उस समय उन्होंने कंपनी में औपचारिक रूप से काम शुरू भी नहीं किया था।

वह बताते हैं, ‘मैं 1992 से गुरुग्राम जाता था। हमारे कुछ दोस्त गार्डन एस्टेट में रहते थे, जो उस समय इलाके की शुरुआती गेटेड कालोनियों में से एक थी। मुझे याद है कि जब हम रात में खाना खाने बाहर जाते थे, तो हमें कहा जाता था कि रात 9 बजे तक खाना खाकर वहां से निकल जाएं।’ डीएलएफ बाजार पूंजीकरण के लिहाज से भारत की सबसे बड़ी रियल एस्टेट कंपनियों में से एक है। गुरुग्राम में उसके पास बड़ी मात्रा में जमीन है, जिसे कंपनी ने 1970 और 1980 के दशक में खरीदा था। गुरुग्राम के शहरी विकास में डीएलएफ की बड़ी भूमिका रही है।

2026 में गुरुग्राम की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। 1981 में शुरू हुआ पुराना मारुति उद्योग (जो बाद में मारुति सुजूकी बना) कभी गुरुग्राम के औद्योगिक विकास का प्रमुख केंद्र था। आज गुरुग्राम-मानेसर क्षेत्र में ऑटोमोबाइल, रोजमर्रा के इस्तेमाल होने वाली वस्तुएं (एफएमसीजी), उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग और टेक्नॉलजीज कंपनियों के दर्जनों औद्योगिक संयंत्र हैं।

अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (जीई) ने 1997 में यहां अपना पहला कैप्टिव बैक-ऑफिस शुरू किया था। बाद में यही जेनपैक्ट बना। इससे उत्तर भारत में बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग (बीपीओ) और आईटी आधारित सेवाओं (आईटीईएस) के उद्योग को बढ़ावा मिला।  2000 के दशक में इस बदलाव से भारत दुनिया का एक बड़ा बैक ऑफिस केंद्र बन गया। इसी दौरान गुरुग्राम इस क्षेत्र की कई बड़ी कंपनियों के मुख्यालय का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा।

आवासीय विकास के अलावा गुरुग्राम आज व्यावसायिक गतिविधियों के बड़े केंद्र के रूप में अपनी अलग पहचान बना चुका है। जून तक यहां 10 करोड़ वर्ग फुट से अधिक कार्यालय क्षेत्र तैयार हो चुका था और इसका विस्तार लगातार जारी है। दुनिया की बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ऐपल, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और एमेजॉन की यहां मौजूदगी है। इनमें से कुछ कंपनियों ने यहां भारत में अपना मुख्यालय भी बनाया है। 1991 में जुलाई में पेश बजट के बाद शुरू हुए आर्थिक सुधारों के 35 साल बाद गुरुग्राम में आया यह बदलाव इस बात का बड़ा उदाहरण है कि सरकार के दखल कम होने पर क्या बदलाव हो सकता है?

दिल्ली स्थित फाउंडेशन फॉर इकनॉमिक डेवलपमेंट के संस्थापक और निदेशक राहुल आहलुवालिया कहते हैं, ‘आज गुरुग्राम देश में रोजगार और आर्थिक गतिविधियों के सबसे बड़े केंद्रों में है। लेकिन कभी यहां सिर्फ खाली जमीन थी और बीच से एक हाईवे गुजरता था। यह आर्थिक स्वतंत्रता की ताकत है। प्रसिद्ध शहरी योजनाकार एलेन बर्टोड की किताब ऑर्डर विथआउट डिजाइन भी इसी विचार की बात करती है।’

दखल न देने का रवैया

1991 के आर्थिक सुधारों से विदेशी पूंजी और कंपनियों के लिए भारत में कारोबार करना आसान हुआ। इसके बाद अगले दो दशकों में बड़े पैमाने पर निजी क्षेत्र की भागीदारी से गुरुग्राम देश के प्रमुख कारोबारी केंद्रों में बदल गया। कॉलियर्स इंडिया के राष्ट्रीय निदेशक और अनुसंधान प्रमुख विमल नादर कहते हैं कि इस दौरान टेक्नॉलजी क्षेत्र, ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विस्तार से रियल एस्टेट के सभी क्षेत्रों में विकास तेज हुआ। इससे गुरुग्राम एक उपनगर से बदलकर बड़े आर्थिक केंद्र के रूप में उभरा।

रिसर्च समूह एनारॉक के वाइस चेयरमैन संतोष कुमार के मुताबिक, हरियाणा सरकार का निजी डेवलपरों को जमीन खरीदने और टाउनशिप विकसित करने की अनुमति देना इस बदलाव में अहम रहा। उनका कहना है कि राज्य के उदार भूमि कानूनों और जनवरी 1991 में नियंत्रित क्षेत्र संबंधी अधिसूचनाओं ने निजी स्तर पर योजनाबद्ध विकास का रास्ता खोला। कंपनियां भी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और केंद्र की उदारीकरण नीतियों से आकर्षित हुईं।

इंडियन ऐंजल नेटवर्क (आईएएन) के सौरभ श्रीवास्तव के मुताबिक, यही वजह है कि राज्य की सीमा के दूसरी तरफ स्थित शहरों की तुलना में गुरुग्राम को बढ़त मिली।

वह कहते हैं, ‘हरियाणा ने एक काम बहुत अच्छी तरह किया। उसने बड़े निजी डेवलपर्स को आवासीय ढांचा तैयार करने के लिए आगे आने दिया। उत्तर प्रदेश ने नोएडा में ऐसा नहीं किया और यहीं वह पीछे रह गया।’ एनारॉक  के कुमार एक और वजह बताते हैं। उनके अनुसार, दिल्ली के मुकाबले गुरुग्राम में मजबूत स्थानीय सरकार नहीं थी, जिससे विकास में ज्यादा रुकावट नहीं आई। सस्ती जमीन, दिल्ली से नजदीकी और राष्ट्रीय राजमार्ग-8 की बेहतर पहुंच ने बड़े पैमाने पर निजी टाउनशिप विकसित करना संभव बनाया। 1990 के दिल्ली मास्टर प्लान में भी इस पहुंच की योजना थी।

आकाश ओहरी बताते हैं कि 1990 के दशक के मध्य में डीएलएफ यह देख रहा था कि क्या गुरुग्राम उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों को जगह दे पाएगा, जो आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत आने वाली थीं। वह कहते हैं, ‘पांच से 10 साल के भीतर यह साफ हो गया कि दुनियाभर की कंपनियों को कार्यालयों के लिए जगह चाहिए होगी।’ उस समय मुंबई को छोड़कर कोई दूसरा शहर कंपनियों को काम करने, रहने और सामाजिक गतिविधियों के लिए एक साथ उपयुक्त जगह नहीं देता था।

डीएलएफ ने इस संभावना को काफी पहले पहचान लिया था। कंपनी के मानद चेयरमैन के.पी. सिंह ने गुरुग्राम के विकास की संभावनाओं को समझा, जबकि चेयरमैन राजीव सिंह ने साइबर सिटी की योजना और उसके निर्माण को आगे बढ़ाया। प्रसिद्ध वास्तुकार हफीज कॉन्ट्रैक्टर ने इसे ‘मैनहैटन’ की तर्ज पर ऐसा कारोबारी क्षेत्र बनाया, जहां कार्यालय और अन्य सुविधाएं एक-दूसरे के करीब हों। हरियाणा की जमीन अधिग्रहण नीतियों ने भी शहर की तस्वीर बदलने में बड़ी भूमिका निभाई।

इससे गुरुग्राम की आबादी, जनसांख्यिकी, प्रति व्यक्ति आय और राज्य की अर्थव्यवस्था में योगदान बढ़ा। 2005 और 2013 में राज्य सरकार ने जमीन के लिए बाजार से जुड़ा मुआवजा और पुनर्वास नीति लागू की। इसके साथ 33 साल तक सालाना भुगतान की व्यवस्था भी की गई। इससे कई किसानों की आय में अचानक बड़ा बदलाव आया।

बाद के वर्षों में राज्य सरकार ने जमीन के न्यूनतम मुआवजे की दरें भी बढ़ाईं। इसके साथ जमीन से जुड़े विवादों और मुकदमों से बचने के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहन दिया गया। बाद में हरियाणा ने केंद्र सरकार के ‘भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार कानून’ को अपनाया। फिलहाल राज्य में लैंड पूलिंग नीति लागू है।

आंकड़ों में गुरुग्राम

गुरुग्राम हरियाणा के सबसे अधिक आबादी वाले शहरों और जिलों में शामिल है।  1991 की जनगणना के अनुसार, गुरुग्राम जिले की आबादी करीब 11 लाख थी, जबकि उस समय पूरे हरियाणा की आबादी 1.64 करोड़ थी। 2011 की जनगणना में गुरुग्राम की आबादी बढ़कर 15 लाख हो गई, जबकि राज्य की कुल आबादी 2.53 करोड़ थी। इसके बाद भी आबादी बढ़ने का अनुमान है क्योंकि देश के अलग-अलग हिस्सों के साथ विदेशों से भी लोग यहां आकर बसे हैं।

उदारीकरण के बाद गुरुग्राम और हरियाणा के विकास का सबसे बड़ा संकेत प्रति व्यक्ति आय में हुई बढ़ोतरी से मिलता है। सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय और हरियाणा की आर्थिक समीक्षा के वित्त वर्ष 26 के आंकड़ों के मुताबिक, हरियाणा की प्रति व्यक्ति आय वित्त वर्ष 92 के 8,775 रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 26 में 3.9 लाख रुपये हो गई।

इसी तरह, राज्य का सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) भी वित्त वर्ष 92 के 16,339 करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 26 में 1.36 लाख करोड़ रुपये हो गया। भारत की जीडीपी में हरियाणा की हिस्सेदारी भी बढ़ी है। यह वित्त वर्ष 96 के 2.47 फीसदी से बढ़कर वित्त वर्ष 26 में 3.83 फीसदी हो गई।

आंकड़े बताते हैं कि संगठित क्षेत्र के रोजगार में गुरुग्राम की हिस्सेदारी भी तेजी से बढ़ी। हरियाणा के संगठित क्षेत्र के कुल रोजगार में गुरुग्राम की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 06 में 17.35 फीसदी थी, जो वित्त वर्ष 24 में बढ़कर 67.62 फीसदी हो गई यानी हरियाणा में संगठित क्षेत्र की करीब हर तीन में से दो नौकरियां इसी जिले में थीं। यह आंकड़ा बताता है कि गुरुग्राम किस तरह कारोबारी और औद्योगिक गतिविधियों के बड़े केंद्र के रूप में विकसित हुआ है।

2006 में हरियाणा की कुल दुकानों और वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों में गुरुग्राम की हिस्सेदारी केवल 1.2 फीसदी थी। 2024 में यह बढ़कर 13.51 फीसदी हो गई। इन क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों में भी गुरुग्राम की हिस्सेदारी 2006 के करीब 26 फीसदी से बढ़कर 2024 में 67 फीसदी हो गई। हालांकि, यहां विकास एक जैसा नहीं रहा और कुछ लोगों के मुताबिक यह पूरी तरह योजनाबद्ध भी नहीं था।

एनारॉक के कुमार के मुताबिक, एनएच-8 के पश्चिम में बसा हिस्सा ‘न्यू गुरुग्राम’ है। इसे 1990 के दशक से निजी डेवलपरों ने विकसित किया। यहां ऊंची इमारतें और चौड़ी सड़कें इसकी पहचान बन गई हैं। निजी डेवलपरों ने शहर के भीतर सड़कें बनाने और रैपिड मेट्रो के निर्माण में भी निवेश किया। दूसरी तरफ राजमार्ग के पूर्व में बसा पुराना गुरुग्राम है, जिसे सरकार ने विकसित किया था। आज भी यहां भीड़भाड़ और बुनियादी सुविधाओं की कमी है।

कुमार के मुताबिक, डुंडाहेड़ा और सुशांत लोक जैसे शहरी गांवों में अब उनकी शुरुआती क्षमता के मुकाबले पांच से छह गुना ज्यादा आबादी रह रही है। वहीं, करीब एक तिहाई लोगों को अब भी पर्याप्त सीवेज सुविधा नहीं मिल रही है।

नमो सिटी और गुरुग्राम का विकास मॉडल

उदारीकरण से विकास जरूर हुआ, लेकिन इसके साथ कई समस्याएं भी बढ़ीं। इनमें ट्रैफिक जाम, बढ़ता वायु प्रदूषण और अब अक्सर कम पड़ता बुनियादी ढांचा शामिल है। मॉनसून के दौरान जलभराव की समस्या से इसकी कमी और ज्यादा साफ नजर आती है। सरकार इन समस्याओं के समाधान के लिए ‘नमो सिटी’ विकसित करने की योजना बना रही है। इसी के साथ दिल्ली मास्टर प्लान 2047 भी आकार ले रहा है। ऐसे में सवाल है कि क्या इन योजनाओं में गुरुग्राम के अनुभव से कुछ सीखा जा सकता है?

विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ बातें जरूर सीखी जा सकती हैं। इनमें निजी क्षेत्र की मदद से टाउनशिप विकसित करना और बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आकर्षित करना शामिल है। लेकिन इसके साथ पहले से ही मजबूत मास्टर प्लान और बेहतर जल निकासी व्यवस्था होना जरूरी है। कुमार कहते हैं, ‘सार्वजनिक बुनियादी ढांचा बनाने के लिए निजी डेवलपर्स पर बहुत ज्यादा निर्भर नहीं रहना चाहिए। गुरुग्राम जैसी समस्याओं से बचने के लिए नमो सिटी में शुरुआत से ही वैधानिक विकास प्राधिकरण होने चाहिए। साथ ही आरआरटीएस जैसे एकीकृत परिवहन नेटवर्क, पर्याप्त हरित क्षेत्र और सार्वजनिक व निजी क्षेत्र के बीच बुनियादी ढांचे के विकास का संतुलन भी जरूरी है।’

कोलियर्स के नादर का कहना है कि विकास को अलग-अलग हिस्सों में बंटने से रोकना जरूरी है। इसके लिए रियल एस्टेट परियोजनाओं के साथ-साथ परिवहन, बिजली-पानी जैसी सुविधाएं, सामाजिक बुनियादी ढांचा और आवास भी एक साथ विकसित किए जाने चाहिए। ओहरी इससे आगे एक अलग समाधान सुझाते हैं। उनका कहना है कि पूरे क्षेत्र के शहरी बुनियादी ढांचे पर विशेष रूप से काम करने के लिए एक अलग विशेष प्रयोजन इकाई (एसपीवी) बनाई जानी चाहिए।

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First Published - September 17, 2026 | 9:23 PM IST

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