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AI से बढ़ी डेटा सेंटरों की बिजली खपत, BS Manthan में बोले एक्सपर्ट्स: भारत के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर बढ़ा दबाव

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डेटा सेंटर हमेशा से बड़ी मात्रा में बिजली की खपत करते रहे हैं, लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) ने इस रुझान को और तेज कर दिया है

Last Updated- February 24, 2026 | 5:15 PM IST
AI and Data Centers
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) भारत के डेटा सेंटरों की एनर्जी प्रोफाइल को तेजी से बदल रहा है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) भारत के डेटा सेंटरों की एनर्जी प्रोफाइल को तेजी से बदल रहा है। इससे उनकी बिजली खपत में तेज बढ़ोतरी हो रही है और कंपनियों व नीति-निर्माताओं को आने वाले दशक में इस सेक्टर को एनर्जी कैसे उपलब्ध कराई जाएगी, इस पर नए सिरे से विचार करना पड़ रहा है। यह बदलाव मुख्य रूप से ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (GPU) के बढ़ते इस्तेमाल के कारण हो रहा है, जो पारंपरिक कंप्यूटिंग सिस्टम की तुलना में कहीं ज्यादा बिजली की खपत करते हैं। उद्योग से जुड़े अधिकारियों और एनर्जी एक्सपर्ट्स ने मंगलवार को नई दिल्ली में आयोजित बीएस मंथन में यह बात कही।

योट्टा के को-फाउंडर, मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ सुनील गुप्ता ने कहा, “पहले जहां एक रैक की बिजली खपत 6 किलोवाट होती थी, अब यह बढ़कर 60 किलोवाट हो गई है।” जो एआई-एनेबल डेटा सेंटर में एक रैक द्वारा खपत की जाने वाली बिजली को दर्शाता है। उन्होंने आगे बताया कि GPU पारंपरिक प्रोसेसर की तुलना में कम से कम 10 गुना ज्यादा बिजली खपत करते हैं, जिससे न केवल बिजली की मांग बढ़ रही है बल्कि कूलिंग की आवश्यकता भी काफी बढ़ गई है।

डेटा सेंटर्स की एनर्जी डिमांड को AI ने कैसे बदला?

डेटा सेंटर हमेशा से बड़ी मात्रा में बिजली की खपत करते रहे हैं, लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) ने इस रुझान को और तेज कर दिया है। गुप्ता ने कहा कि यूपीआई, वीडियो स्ट्रीमिंग और क्लाउड कंप्यूटिंग जैसी डिजिटल सेवाओं के विस्तार के कारण पहले से ही बिजली की मांग बढ़ रही थी।

उन्होंने कहा, “हम अपने जीवन में जो भी डिजिटल सेवाएं इस्तेमाल कर रहे हैं, उनका बैकएंड किसी न किसी डेटा सेंटर से जुड़ा होता है।” ऐतिहासिक रूप से, डेटा सेंटर रैक 6–7 किलोवाट बिजली की खपत करते थे और यह स्तर करीब 25 वर्षों तक स्थिर रहा। लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने इस पैटर्न को पूरी तरह बदल दिया है।

एआई वर्कलोड मुख्य रूप से GPU-आधारित सिस्टम पर निर्भर करते हैं, जो बिजली घनत्व (पावर डेंसिटी) को काफी बढ़ा देते हैं। इससे कूलिंग की जरूरत भी बढ़ गई है, जिससे ऊर्जा दक्षता ऑपरेटरों के लिए एक अहम चिंता बन गई है।

बिजली की मांग में इस तेज बढ़ोतरी ने दीर्घकालिक अनुमानों को भी बदल दिया है। भारत की डेटा सेंटर क्षमता, जो 2016 में करीब 200 मेगावाट थी, आज बढ़कर 1.4 गीगावाट हो गई है। पहले अनुमान था कि 2030 तक यह क्षमता 3 गीगावाट तक पहुंचेगी, लेकिन एआई के कारण अब यह अनुमान 6 से 12 गीगावाट के बीच पहुंच गया है।

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क्या रिन्यूएबल एनर्जी बढ़ती बिजली मांग को पूरा कर सकती है?

एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस विस्तार को सहारा देने में रिन्यूएबल एनर्जी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

यूसी बर्कले के गोल्डमैन स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी के इंडिया एनर्जी एंड क्लाइमेट सेंटर के कंट्री हेड मोहित भार्गव ने कहा कि बड़े डेटा सेंटर पहले से ही पूरी तरह रिन्यूएबल एनर्जी पर चल सकते हैं। उन्होंने कहा, “200 मेगावाट का डेटा सेंटर, जो 24 घंटे ऑपरेट होता है, उसे आसानी से रिन्यूएबल एनर्जी से चलाया जा सकता है।”

उन्होंने यह भी बताया कि रिन्यूएबल एनर्जी प्लांट दो साल से कम समय में और कोयला, गैस या परमाणु ऊर्जा की तुलना में कम लागत पर बनाए जा सकते हैं। साथ ही, दीर्घकालिक अनुबंध 15-20 वर्षों तक स्थिर बिजली कीमतें सुनिश्चित कर सकते हैं, जिससे ईंधन कीमतों में उतार-चढ़ाव का जोखिम कम होता है।

भार्गव ने कहा कि भारत के पास कुछ संरचनात्मक फायदे भी हैं, जैसे भूमि की उपलब्धता और अमेरिका जैसे देशों की तुलना में ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर का तेजी से विकास।

पॉलिसी और इंफ्रास्ट्रक्चर की क्या भूमिका होगी?

ACME सोलर के सीईओ निखिल ढींगरा ने कहा कि डिस्ट्रीब्यूशन इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिए रिन्यूएबल एनर्जी कंपनियों को एग्रीगेटेड डिमांड और स्पष्ट योजना की जरूरत होती है। उन्होंने यह भी बताया कि कई कंपनियों के लिए रिन्यूएबल एनर्जी पहले से ही कुल खपत का 25–30 फीसदी हिस्सा बन चुकी है।

भार्गव ने कहा कि नियामक ट्रांसमिशन नेटवर्क से आसान कनेक्टिविटी सुनिश्चित करके और नीति में स्पष्टता बनाए रखकर इस बदलाव को समर्थन दे सकते हैं।

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क्या डेटा सेंटर भारत की बिजली व्यवस्था पर दबाव डालेंगे?

तेजी से वृद्धि के बावजूद, डेटा सेंटर अभी भी देश की कुल बिजली खपत का एक छोटा हिस्सा हैं। गुप्ता ने कहा कि वर्तमान में डेटा सेंटर लगभग 10 टेरावॉट-घंटे बिजली की खपत करते हैं, जबकि पूरे देश में कुल खपत करीब 1500 टेरावॉट-घंटे है। उन्होंने कहा कि 2030 तक डेटा सेंटर कुल बिजली खपत का लगभग 3 फीसदी हिस्सा हो सकते हैं।

गुप्ता के अनुसार, भारत के लिए मुख्य चुनौती बिजली उत्पादन क्षमता नहीं, बल्कि अंतिम छोर तक बिजली की सप्लाई (लास्ट-माइल डिलीवरी) होगी। उन्होंने कहा, “असली जरूरत लास्ट-माइल डिस्ट्रीब्यूशन की उपलब्धता होगी।”

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First Published - February 24, 2026 | 5:03 PM IST

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