दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर प्रदर्शन करते छात्र | फोटो क्रेडिट: रॉयटर्स
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार को पिछले दिनों बड़ी राजनीतिक चुनौती का सामना करना पड़ा, जब हजारों युवा दिल्ली के जंतर मंतर पर पहुंचकर आंदोलन करने लगे। आंदोलन जंतर-मंतर पर ही नहीं रुका बल्कि दूसरे शहरों में भी फैल गया। सरकार ने प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे युवाओं और सामाजिक कार्यकर्ता तथा लद्दाख के शिक्षक सोनम वांगचुक से बात की। 28 जून से भूख हड़ताल पर बैठे वांगचुक ने केंद्रीय मंत्रियों जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह के आश्वासन पर अपना अनशन खत्म कर दिया। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद छात्रों का प्रदर्शन भी खत्म हो गया है।
आंदोलन के आरंभ में सरकार छात्रों की प्रमुख मांग यानी प्रधान के इस्तीफे पर झुकने को शायद तैयार नहीं थी। उधर छात्र उच्च शिक्षा सचिव को हटाए जाने के कदम से संतुष्ट नहीं थे। प्रधान और उनके मंत्रालय को राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा-यूजी (नीट-यूजी) के पेपर बार-बार लीक होने के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा था। इस परीक्षा के जरिये ही देश भर के सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों में बच्चों को दाखिला मिलता है।
नीट की शुरुआत 2016 में हुई थी और 2018 में स्वायत्त संस्था के रूप में पंजीकृत राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) को न केवल नीट बल्कि देश भर में होने वाली अन्य परीक्षाएं कराने की भी जिम्मेदारी दे दी गई जैसे कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (सीयूईटी)। यह केंद्रीकृत व्यवस्था जल्दबाजी में लागू की गई थी और इसे कारगर तथा पारदर्शी ढंग से चलाने की पर्याप्त क्षमता तथा विशेषज्ञता निश्चित रूप से नहीं थी।
बताया जाता है कि एनटीए में केवल 25 कर्मचारी हैं। परीक्षा केंद्र चलाने, आईटी बुनियादी ढांचा संभालने, प्रश्नपत्र बांटने तथा निगरानी करने (आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की मदद से निगरानी करना भी) जैसे इसके काम निजी कंपनियों से ठेके पर कराए जा रहे हैं। सवाल यह है कि जब सभी प्रमुख जिम्मेदारियां ठेके पर दूसरों को दी जा रही हैं तो केंद्रीकरण का औचित्य ही क्या है।
अच्छी तरह काम करती आई व्यापक विकेंद्रीकृत व्यवस्था को छोड़कर ऐसी केंद्रीकृत व्यवस्था क्यों अपनाई जाए, जो विविधता, कई भाषाओं और कई तरह की संस्कृति वाले देश के लिए सबसे अच्छी नहीं हो सकती? अधिकार अपनी मुट्ठी में लेने की एक के बाद एक सरकारों की प्रवृत्ति ही हमारी मौजूदा समस्याओं का कारण बनी है। शिक्षा अत्यंत संवेदनशील मामला है क्योंकि इसमें हमारी युवा पीढ़ी का भविष्य दांव पर है। पेपर लीक, गलत मूल्यांकन और अपनी मर्जी से परिणाम बदल देने जैसी ज्यादातर खामियां जांच-पड़ताल किए और सख्त जवाबदेही तय किए बगैर निजी एजेंसियों से ठेके पर काम कराने का ही नतीजा हैं।
जंतर मंतर पर युवाओं में जो आक्रोश दिखा वह बेवजह नहीं था और उसका समाधान होना चाहिए। सरकार ने बिगड़ते राजनीतिक टकराव को तो संभाल लिया मगर सच यही है कि हमारी वर्तमान शिक्षा व्यवस्था खामियों से भरी है और उसमें फौरन बुनियादी सुधार की जरूरत है। स्वयं प्रधानमंत्री ने वर्तमान शिक्षा प्रणाली की अनेक कमियों के लिए जिम्मेदारी तय करने की आवश्यकता को स्वीकार किया है और उन्हें दूर करने के लिए नए विधायी उपायों की घोषणा भी की है। प्रदर्शनों के पीछे छिपी कुंठा और गहरी बेचैनी को संवेदना के साथ समझना चाहिए। बिना मतलब साजिश ढूंढने या युवा प्रदर्शनकारियों पर काला ठप्पा लगाने से भी बचना चाहिए।
यह भी आवश्यक है कि पिछले कुछ दिनों की घटनाओं और उस गंभीर चुनौती के बीच स्पष्ट संबंध को देखा जाए जिसका सामना देश कर रहा है। यह चुनौती है शिक्षित भारतीयों के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छी नौकरी तैयार करने में नाकामी। बेहतर शिक्षा वाले हमारे नागरिक दूर के देशों में अवसर पाने में सफल हो जाएं तो यह कोई खुशी मनाने की बात नहीं है। खुशी मनाने से यह हकीकत नहीं छिप सकती कि हम अपनी युवा पीढ़ी को उचित करियर और उन्नति की संभावनाएं देने में अक्षम हैं। सॉफ्टवेयर उद्योग उन क्षेत्रों में शुमार रहा है, जिसने आकांक्षाओं से भरे युवा भारतीयों को अच्छा करियर दिया। लेकिन आर्टिफिशल इंटेलिजेंस में तेजी से हो रही प्रगति इस सेवा उद्योग को चुनौती दे रही है, जो तकनीकी बदलावों से पीछे रह गया है और अच्छी नौकरी देने की जिसकी क्षमता घटती जा रही है। प्रमुख बहुराष्ट्रीय कंपनियां देश में वैश्विक क्षमता केंद्र स्थापित कर रही हैं जिनसे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे लेकिन ये केंद्र विदेशी कंपनियों के लिए बौद्धिक संपदा तैयार करते हैं भारत के लिए नहीं।
पिछले कई वर्षों से एक के बाद एक राज्य और केंद्र सरकारों ने नागरिकों को बिना भेदभाव सार्वजनिक सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य उपलब्ध कराने के अपने मूल दायित्व से धीरे-धीरे हाथ खींच लिया है। वह दायित्व है नागरिकों को बिना भेदभाव के सार्वजनिक सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य उपलब्ध कराना। पिछले करीब एक दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था के सबसे तेजी से बढ़ते क्षेत्र रहे हैं: निजी सुरक्षा (10 से 14 प्रतिशत सालाना), निजी शिक्षा (11 से 14 प्रतिशत) और निजी स्वास्थ्य सेवा (12 से 15 प्रतिशत)। सार्वजनिक सुरक्षा पर सरकार का व्यय सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 1 प्रतिशत के आसपास ही बना हुआ है और प्रति 1 लाख लोगों पर पुलिसकर्मियों की संख्या केवल 150 है, जो शायद सबसे कम है।
देश का शिक्षा बजट बढ़कर जीडीपी के 4 प्रतिशत तक पहुंच गया है मगर यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति की 6 प्रतिशत की सिफारिश से कम है। स्वास्थ्य सेवा पर कुल सरकारी व्यय जीडीपी का लगभग 1.5 प्रतिशत आंका गया है। सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा प्रदान की जाने वाली इन आवश्यक सेवाओं का पैमाना और गुणवत्ता लगातार गिरती गई है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल उन चंद लोगों के लिए उपलब्ध है, जो निजी स्कूलों का खर्च उठा सकते हैं और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर भी यही बात लागू होती है। इन आवश्यक सेवाओं को व्यावसायिक बनाना आम भारतीयों के लिए नुकसानदेह साबित हुआ है और यह बात श्रम बाजार में प्रवेश करने वालों की रोजगार पाने की योग्यता में भी झलकती है।
भारत का वर्तमान आर्थिक मॉडल देश की संसाधन संपदा के अनुरूप नहीं है। हमारे पास श्रम की आपूर्ति बहुत ज्यादा है मगर भूमि और पूंजी की कमी है। देश को अपनी पूंजी और भूमि का उपयोग बहुत किफायत के साथ करना चाहिए। उसे श्रम-प्रधान वृद्धि की रणनीति अपनानी चाहिए मगर श्रम प्रधान का अर्थ तकनीक का कम इस्तेमाल नहीं होना चाहिए।
हमने 1990 के दशक की शुरुआत में आर्थिक सुधार और उदारीकरण की महत्त्वाकांक्षी नीतियां अपनाईं और इनसे ऊंची वृद्धि के रूप में अच्छे परिणाम भी मिले। ये सुधार बाजार हितैषी थे, केवल व्यवसाय-हितैषी नहीं। देश भर में बड़ी संख्या में नए उद्योग और व्यवसाय उभरे। छोटे और मझोले उद्योगों को उल्लेखनीय बढ़ावा मिला। भारत का 40 प्रतिशत निर्यात इन्हीं से आया। लेकिन लगता है कि अब दुनिया भर में मौजूदगी वाले बड़े औद्योगिक घरानों का ही ध्यान रखा जा रहा है।
उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन (पीएलआई) की योजना पूंजी और तकनीक-प्रधान उद्योगों को बढ़ावा देती है, जिनमें रोजगार की क्षमता कम होती है। इस पर भी पुनर्विचार की आवश्यकता है। युवाओं के आंदोलन से उत्पन्न चुनौती भारत की आर्थिक दिशा पर अधिक सार्थक बहस का अवसर दे रही है क्योंकि यह दिशा भारत के युवाओं को केंद्र में रखकर ही तय होनी चाहिए जो इसकी प्रेरक शक्ति हैं।
(लेखक विदेश सचिव रह चुके हैं। ये उनके निजी विचार हैं)