प्रतीकात्मक तस्वीर
भारत के शीर्ष 100 शहरों में आमदनी, खपत और बचत के मामले में सबसे संपन्न 3.5 से 5 करोड़ उपभोक्ताओं पर अब तक कंपनी और मार्केटिंग जगत का सबसे अधिक ध्यान रहा है। आर्थिक मंदी या दिक्कतों के बीच भी खरीदने की उनकी क्षमता बनी रहती है, जिसका उदाहरण कोविड-19 महामारी के बाद अंग्रेजी के ‘के’ अक्षर की तरह दिखने वाला असमान सुधार है, जिसमें कुछ क्षेत्र डूबते रहे और कुछ तेजी से उठ गए।
लेकिन अब स्थिति बदल रही है। रोजमर्रा की वस्तुओं से लेकर महंगे सामान तक, पूरे बाजार में मांग सुस्त पड़ती दिख रही है, जिस कारण निजी क्षेत्र भी क्षमता विस्तार में नया निवेश करने से हिचक रहा है। साबुन, शैंपू, दोपहिया वाहन, वॉशिंग मशीन, कपड़े और कार तक बेचने वाली छोटी-बड़ी सभी कंपनियां अब उन 20 करोड़ शहरी उपभोक्ताओं पर ध्यान दे रहे हैं, जो मोटी आय वाले उन 3.5 से 5 करोड़ लोगों वाले तबके के ठीक नीचे हैं।
शोध संस्था पीपल रिसर्च ऑन इंडियाज कंज्यूमर इकॉनमी (प्राइस) और टाटा संस की संयुक्त रिपोर्ट ‘द मैनी अर्बन इंडियाज’ इस बड़े उपभोक्ता बाजार की स्पष्ट तस्वीर सामने रखती है। अधिकतर मीडिया रिपोर्ट इस अध्ययन में दिए गए चार शहरी वर्गों की बात करती हैं, जिनमें भारत के शीर्ष 100 शहरों को आबादी के हिसाब से बांटा गया है। ये वर्ग हैं, बिग सिक्स (1 करोड़ से अधिक आबादी वाले छह महानगर), बूमटाउन्स (25 लाख से 1 करोड़ आबादी वाले 19 शहर), ब्रेकआउट सिटीज (15 से 25 लाख आबादी वाले 25 शहर) और फ्रंटियर सिटीज (5 से 15 लाख आबादी वाले बाकी 50 शहर)।
किंतु इस अध्ययन में एक पहलू को ज्यादातर ने नजरअंदाज किया है और वह है आय के आधार पर परिवारों का वर्गीकरण तथा शीर्ष 100 शहरों में मध्यम आय वर्ग के बढ़ते महत्त्व पर विशेष जोर। इन 100 शहरों में भारत की 19 प्रतिशत आबादी बसती है मगर 35 प्रतिशत आय यहीं आती है, 31 प्रतिशत खर्च यहीं से होता है, परिवारों की 47 प्रतिशत अतिरिक्त आय इन्हीं शहरों में होती है और करीब दो-तिहाई शहरी मांग भी यहीं से आती है।
भारत के शीर्ष 100 शहरों में 6.2 करोड़ परिवार रहते हैं और अध्ययन के अनुसार 2025-26 तक उनमें से आधे से ज्यादा (53 प्रतिशत) मध्यम आय वर्ग का हिस्सा बन चुके हैं। इनकी वार्षिक पारिवारिक आय 2025-26 की कीमतों के आधार पर 6 लाख से 36 लाख रुपये के बीच मानी गई है। दस वर्ष पहले इनमें से आधे परिवार ही इस आय वर्ग में थे और अनुमान है कि 2030-31 तक इन शहरों में 8 करोड़ परिवार हो जाएंगे, जिनमें 60 प्रतिशत से अधिक मध्यम आय वर्ग के होंगे।
अध्ययन के अनुसार भारत में इस वर्ग की प्रति व्यक्ति क्रय शक्ति समता यानी परचेजिंग पावर पैरिटी (पीपीपी) लगभग 15 से 90 डॉलर रोजाना है, जो मध्यम आय वर्ग की अंतरराष्ट्रीय परिभाषा से मेल खाता है। उदाहरण के लिए ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के हिसाब से पीपीपी 11 से 110 डॉलर रोजाना और प्यू रिसर्च सेंटर के अनुसार 10 से 20 डॉलर रोजाना है। हर परिवार में औसतन 4.6 सदस्य मानें तो इस वर्ग में लगभाग 20 करोड़ उपभोक्ता बैठते हैं। अध्ययन के अनुसार आय के आधार पर परिवारों की अन्य श्रेणियां निम्न आय वर्ग (सालाना 1.5 लाख रुपये से कम आय), निम्न-मध्यम आय वर्ग (सालाना 1.5 लाख से 6 लाख रुपये के बीच) और उच्च आय वर्ग (वार्षिक आय 36 लाख रुपये से अधिक) हैं।
आने वाले वर्षों में मध्यम आय वर्ग सभी प्रकार के शहरों में बराबर फैलेगा और 2031 तक बिग सिक्स में 63 प्रतिशत परिवार, बूमटाउन्स में 59 प्रतिशत, ब्रेकआउट सिटीज में 57 प्रतिशत और फ्रंटियर सिटीज में 56 प्रतिशत परिवार इसी वर्ग से होंगे। प्राइस-टाटा संस की रिपोर्ट इसे भारत के शहरी इतिहास में सामाजिक-आर्थिक गतिशीलता का सबसे बड़ा बदलाव बताते हुए कहती है कि इस दौरान आय में उच्च आय वर्ग की हिस्सेदारी बढ़कर 19.6 प्रतिशत हो जाएगी और निम्न वर्ग की घटकर केवल 0.4 प्रतिशत तथा निम्न-मध्यम आय वर्ग की लगभग 20 प्रतिशत रह जाएगी।
रिपोर्ट मध्यम आय वर्ग को आय वितरण के बीच में आने वाले परिवार भर नहीं बताती। उसके अनुसार इसमें वे परिवार भी हैं, जो आर्थिक तौर पर अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं, जिनके दोबारा गरीबी में फंसने की आशंका कम है और जिनके पास रोजमर्रा की जरूरतों के अलावा शिक्षा, स्वास्थ्य, बचत, संपत्ति सृजन तथा गैर-जरूरी खर्च के लिए पर्याप्त संसाधन हैं। दूसरे शब्दों में यह वर्ग अब उपभोग के अगले स्तर पर पहुंचने के लिए तैयार है।
अध्ययन के अनुसार 12 से 14 लाख रुपये के बीच सालाना आय वाले परिवार आम तौर पर कार खरीदने की स्थिति मे होते हैं और 14 लाख रुपये से ज्यादा सालाना आय होने पर वॉशिंग मशीन खरीद ली जाती हैं। हालांकि देश में 50 से 57 प्रतिशत टेलिविजन, एयर कंडीशनर, कार और रेफ्रिजरेटर मध्यम आय वर्ग के परिवारों में ही हैं मगर इन परिवारों में इन उत्पादों की पहुंच काफी कम है और इसे बढ़ाने पर बाजार भी काफी बढ़ सकता है।
बेशक मार्केटिंग कंपनियों के लिए हसरतें रखने वाले 20 करोड़ उपभोक्ता कोई नया वर्ग नहीं हैं। लेकिन अब तक कंपनियों ने इनके लिए अलग से रणनीति तैयार नहीं की है। इसके बजाय बाजार मुख्यतः संपन्न और उच्च आय वर्ग के लिए बनाए गए उत्पादों में से कुछ नीचे के तबके तक पहुंचने से ही संतुष्ट होता आया है। अब जरूरत इस बात की है कि इस वर्ग की आय, जरूरतों और खर्च करने की क्षमता को ध्यान में रखते हुए अलग से वाजिब उत्पाद उतारे जाएं। ठीक वैसे ही जैसे टाटा की जूडियो ने फैशनेबल मगर किफायती परिधान के क्षेत्र में किया है या सिटीमॉल ने बूमटाउन्स, ब्रेकआउट और फ्रंटियर शहरों में किराना सामान की डिलिवरी का मॉडल तैयार किया है।