नई दिल्ली में NEET पेपर लीक मामले को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के समर्थक राष्ट्रीय ध्वज लहरा रहे हैं। | फोटो: पीटीआई
नरेंद्र मोदी सरकार और कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेताओं के बीच सीधी बातचीत हुई, सोनम वांगचुक ने भूख हड़ताल खत्म कर दी है और प्रदर्शनकारियों को मनाने के लिए नाटकीय कदम उठाते हुए गुरुवार देर रात उच्च शिक्षा सचिव को पद से हटा दिया गया। प्रदर्शनकारी शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा चाहते थे और वे इस कदम से संतुष्ट नहीं हुए। अब तो प्रधान का इस्तीफा भी हो चुका है और जंतर मंतर से प्रदर्शनकारी भी लौट चुके हैं।
मगर उच्च शिक्षा सचिव को पद से हटाए जाने पर मुझे अपने दफ्तर की दीवार पर टंगा छोटा सा फ्रेम याद आ गया। वह मुझे अपनी बेटी से उपहार में मिला 1942 की मशहूर फिल्म कैसाब्लांका का पोस्टर है। भले ही आपने यह फिल्म न देखी हो, लेकिन आपको वह अमर संवाद जरूर याद होगा, जिसमें कैप्टन लुई रेनो एक घातक गोलीबारी के बाद पुलिसकर्मियों से कहते हैं, ‘पुराने संदिग्धों को पकड़ लाओ।’ सचिवों के तबादले भी कुछ वैसे ही हैं।
किसी भी संकट में अफसरशाह आसान शिकार बन जाते हैं। 2024 में नीट पेपर लीक के बाद भी राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) में छत्तीसगढ़ कैडर के आईएएस और महानिदेशक सुबोध कुमार सिंह समेत कुछ अहम लोगों को हटाया गया था। नेताओं को यही सहज लगता है। उच्च शिक्षा सचिव पद से हटाकर पंचायती राज सचिव बनाए गए विनीत जोशी एनटीए के पहले महानिदेशक थे।
मोदी सरकार के काम करने के तरीके और पुराने रिकॉर्ड को देखकर प्रधान का हटना असंभव लग रहा था क्योंकि किसानों के आंदोलन में झुक जाने के बाद अब वह दबाव में मान जाने वाली सरकार की छवि नहीं चाहती थी। बहरहाल प्रधान ने इस्तीफा दे दिया और प्रदर्शनकारी संतुष्ट होकर घर लौट गए मगर क्या इससे भारत के युवाओं का संघर्ष खत्म हो जाएगा? भारत में बचपन आज इतना तनाव भरा, होड़ भरा और एकांगी (सिर्फ पढ़ाई और परीक्षा तक सीमित) हो गया है, जितना पहले कभी नहीं था।
नीट को ही देखिए। इस वर्ष 22 लाख छात्रों ने परीक्षा दी। एमबीबीएस की 1,39,489 सीटों के लिए इनमें से केवल 5 प्रतिशत ही चुने गए। उनके अलावा 25,000 से 35,000 छात्र एमबीबीएस करने के लिए विदेश जाएंगे, जिनमें ज्यादातर पूर्व सोवियत गणराज्यों, फिलिपींस और बांग्लादेश तक में पढ़ेंगे। पढ़ाई पूरी करने के बाद अगर वे भारत में डॉक्टर के तौर पर काम करना चाहते हैं तो उन्हें भी नीट (50 पर्सेंटाइल के कट-ऑफ से ऊपर) निकालना पड़ता है।
इस सबके बीच 20 लाख से अधिक छात्र दौड़ से बाहर रह जाते हैं। इनमें से कई ने केंद्रीय विश्वविद्यालयों और उनसे जुड़े कॉलेजों में प्रवेश के लिए सीयूईटी (कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट) भी दिया होगा। लेकिन वहां भी चयन की संभावना बहुत कम है। लाखों छात्र इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश के लिए जेईई की होड़ में हैं। पहली सीढ़ी लांघने के बाद भी छात्रों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं का सिलसिला खत्म नहीं होता। स्नातकोत्तर हो, पीएचडी हो या अध्यापन की नौकरी, हर बार परीक्षा आ जाती है।
मध्यमवर्गीय या उससे कम आय वाले भारतीय परिवारों के बच्चों का जीवन 15 वर्ष की उम्र से ही कोचिंग संस्थानों, प्रतियोगी परीक्षाओं और पेपर लीक होने पर दोबारा परीक्षाओं के अंतहीन चक्र में फंस जाता है। अब आप समझ सकते हैं कि जंतर-मंतर पर इतने अधिक छात्र प्रदर्शन क्यों कर रहे थे? उनमें से कई के तो माता-पिता भी आए थे। इन बच्चों के पास शौक पूरे करने या खेलकूद के लिए वक्त ही नहीं बचता। फिर हम पूछते हैं कि भारत खेलों में अच्छा क्यों नहीं कर पाता। बच्चा खेलकूल में लगे तो माता-पिता को लगता है कि वह अपना भविष्य ‘बरबाद’ कर रहा है।
इसे समझने के लिए देश के सबसे लोकप्रिय खेल क्रिकेट का ढांचा देखिए, जहां हमें विश्वस्तरीय प्रतिभाएं मिल रही हैं। तीनों तरह की भारतीय टीम, आईपीए और स्थानीय लीग तक की टीमें शायद ही कभी किसी कॉलेज स्नातक को मैदान में उतारती हैं। ये प्रतिभाएं कक्षा 10 में ही चुन ली जाती हैं। वैभव सूर्यवंशी इसका उदाहरण हैं।
हमारी शिक्षा प्रणाली सभी प्रतिभाओं की खत्म कर देती है। वह पहले रटकर सीखने पर मजबूर करती है और फिर छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाएं निकालने के लिए कोचिंग क्लासों में धकेलती है। इस तरह हम ऐसी पीढ़ी बना रहे हैं जो खुद को उपेक्षित और ठगा हुआ महसूस करती है। एक मंत्री को हटाने भर से स्थिति नहीं सुधरेगी। इस व्यवस्था को पूरी तरह उखाड़ फेंकने की ज़रूरत है। लेकिन यह असंभव सा लगता है क्योंकि यह ‘मजबूत’ सरकार की विचारधारा से मेल नहीं खाता। आखिर दिल्ली में ‘मजबूत’ सरकार का क्या मतलब है अगर सब कुछ उसके अधीन नहीं हो।
आपको लगता होगा कि मोदी सरकार से पहले नीट पेपर लीक की दिक्कत क्यों नहीं थी। जवाब है, तब नीट था ही नहीं। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) ने भी मेडिकल में प्रवेश को केंद्रीकृत करने की कोशिश की थी, लेकिन उसके बनाए नीट को 2013 में सर्वोच्च न्यायालय के तीन न्यायाधीशों के पीठ ने 2-1 से असंवैधानिक बता दिया। कई राज्यों खासकर दक्षिण के राज्यों ने इसे अपने संघीय अधिकार की चोरी माना।
मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) ने 2010 में नीट की स्थापना निजी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश प्रक्रिया पर पिछले दरवाजे से नियंत्रण के लिए ही की थी। बाद में 2013 के अदालती आदेश को चुनौती दी गई और उच्चतम न्यायालय के पांच न्यायाधीशों के पीठ ने 2016 में उसे पलट दिया। अब नीट न्यायालय द्वारा अधिकृत संस्था बन गई।
केंद्रीकरण का विचार संप्रग युग की समाजवादी सोच से आई थी ताकि निजी मेडिकल कॉलेजों में ऊंची कैपिटेशन फीस खत्म की जा सके। अगर वे तय ही नहीं कर पाएंगे कि किसे प्रवेश देना है तो वे भारी-भरकम फीस कैसे वसूलेंगे? इस हिसाब से यह मेडिकल शिक्षा के राष्ट्रीयकरण की तरह था। चूंकि दक्षिण भारत और महाराष्ट्र मेडिकल शिक्षा में आगे थे, इसलिए एमसीआई और केंद्रीय तंत्र ने नए मेडिकल कॉलेजों के लिए आबादी के हिसाब से लाइसेंसिंग लागू करके उद्योग को दबाने की कोशिश की। इसमें प्रति 10 लाख आबादी पर एक ही मेडिकल कॉलेज का लाइसेंस दिया जाना था। दक्षिणी राज्यों और महाराष्ट्र ने विरोध किया और इसे रद्द कर दिया गया। रद्द इसलिए भी हुआ क्योंकि कई कॉलेज राजनेताओं के स्वामित्व में हैं जिनमें सत्तारूढ़ दल और उसके सहयोगी दलों के नेता भी हैं।
नीट से पहले राज्य अपनी अलग प्रवेश परीक्षाएं कराते थे और लाखों स्कूली बच्चे इस राष्ट्रीय तनाव से बचे हुए थे। केंद्र सरकार को भी इतने बड़े स्तर पर परीक्षा कराने का जोखिम नहीं उठाना पड़ता था। मगर वर्तमान केंद्र सरकार सब कुछ अपनी मुट्ठी में चाहती है। अब वे नया कानून ला रहे हैं ताकि पूरे देश में उच्च शिक्षा पर उनका नियंत्रण और बढ़ जाए। गूगल पर विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025 ढूंढिए। इसमें व्यापक अधिकरों वाले उच्च शिक्षा आयोग और तीन नियामक परिषदों का प्रस्ताव है। यूजीसी, एआईसीटीई और एनसीटीई को खुद में समेटकर विश्वविद्यालयों, तकनीकी शिक्षा तथा शिक्षक शिक्षा की निगरानी ये ही करेंगे। शुक्र है कि स्थायी समिति ने अभी इसे रोक दिया है।
नीट पर लौटें तो इस केंद्रीकरण की सफलता को पूरा करने के लिए मोदी सरकार ने सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत एनटीए बना दी। इसका काम नीट, जेईई, यूजीसी-नेट और सीयूईटी (स्नातक एवं स्नातकोत्तर केंद्रीय विश्वविद्यालय प्रवेश) आयोजित करना है।
महज एक ‘सोसाइटी’ के लिए यह बहुत ज्यादा अधिकार है चाहे इसका नेतृत्व विचारधारा में निष्ठा रखने प्रदीप कुमार जोशी ही क्यों न कर रहे हों। वे शिक्षा जगत के हैं आईएएस नहीं। उनका रिकॉर्ड देखें: मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष (2006 से 2011), छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (2011 से 1015), संघ लोक सेवा आयोग (2020 से 2022) और अब एनटीए। ऐसे अधिकार और राजनीतिकरण से गड़बड़ तय थी और मोदी सरकार ने यह आफत खुद मोल ली है।
इससे पहले 47 अधिकारियों को पद से हटा दिया गया। मोदी सरकार भारी केंद्रीकरण की यह कीमत चुका रही है। जब भी संकट आता है, सरकार नए कानून का झुनझुना थमा देती है। नीट परीक्षा में धोखाधड़ी के खिलाफ अलग से कानून बना दिया है मानो आम धोखाधड़ी का कानून उस पर लागू नहीं होगा। इसके लिए विशेष अदालत बना दी हैं, जो वर्षों तक चलती रहेंगी।
मंत्री आएंगे और जाएंगे। मगर समस्या से निपटना है तो नीट से शुरुआत करें। तकनीकी शिक्षा में दाखिले का विकेंद्रीकरण करें और राज्यों को स्वायत्तता लौटाएं। एनटीए को खत्म करें, राज्यों को तवज्जो दें। शिक्षा संस्थानों के मुनाफे को वैध बनाएं और सैकड़ों नए कॉलेज बनने दें। मेरे हिसाब से तो आपातकाल के दौर का 42वां संविधान संशोधन भी रद्द कर दें, जिसने शिक्षा को समवर्ती सूची में डाल दिया था। ऐसा होगा नहीं मगर राय देने में क्या हर्ज है?