भारत को निरंतर आर्थिक वृद्धि बनाए रखने के लिए दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं से जुड़ना होगा। इसका फायदा यह है कि विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ नजदीकी से कंपनियों की उत्पादकता बढ़ती है। भारत एक ऐसी अर्थव्यवस्था है जहां पूंजी की भारी कमी है। घरेलू निवेश के लिए बड़ी मात्रा में सस्ती विदेशी पूंजी की आवश्यकता होती है। हाल में जो रुझान एवं आंकड़े दिखे हैं वे चिंताजनक हैं। वर्ष 2011 से शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेश भी नहीं बढ़ रहा है। कंपनियां कम आयात कर रही हैं और जाहिर है निर्यात भी कम हो गया है।
कोई एक नीतिगत बदलाव वर्तमान हालात में परिवर्तन नहीं ला सकता। हमें भारत सरकार के साथ विदेशी कंपनियों के पूरे कामकाज और जुड़ाव का आकलन करना होगा। ऐसे में छह प्रमुख बातें हैं जिन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
पहला प्रश्न यह है कि क्या पूंजी आ सकती है, देश के व्यावसायिक हालात में फिट बैठ सकती है और फिर यहां से निकाली जा सकती है। सरकार एक केंद्रीय योजना प्रणाली (पूंजी नियंत्रण व्यवस्था) चलाती है, जिसमें साधनों, मूल्य निर्धारण, पुनर्गठन और कारोबार से बाहर निकलने से जुड़ी शर्तों पर उसका नियंत्रण होता है। ऐसी व्यवस्था व्यावसायिक फैसलों में दखल देती है।
हजारों पन्नों में फैले दखल देने वाले और बारीक कानूनी नियमों का एक ऐसा जाल बिछा हुआ है, जिनके उल्लंघन पर आपराधिक सजा का प्रावधान है। निवेशकों को नियमों, नीतिगत दस्तावेज और परिपत्रों में वर्णित अपनी जिम्मेदारियों को समझने के लिए महंगी कानूनी सलाह की जरूरत होती है। इस कानून को सुदृढ़ कर सरल, स्थिर और समझने योग्य बनाने की आवश्यकता है और यह भी सुनिश्चित करना होगा कि कारोबार की दुनिया यह दखल न दे।
मूल्य निर्धारण से जुड़े नियम तो खासकर नुकसानदेह हैं। ये नियम इस सोच पर आधारित होते हैं कि कोई मूल्यांकनकर्ता एक आधिकारिक मूल्य का पता लगा सकता है और व्यावसायिक अनिश्चितता खत्म कर सकता है। यह उचित एवं पारदर्शी तरीके से जोखिम लेने की क्षमता में खलल डालता है। इससे छोटी कंपनियों को नुकसान होता है क्योंकि वे लचीली वित्त पोषण व्यवस्था पर निर्भर रहती हैं।
दूसरा, विदेशी निवेशकों को घरेलू कर के अलावा वैश्विक स्तर पर भी कराधान से गुजरना पड़ता है। वे अलग-अलग देशों में करों के बाद हासिल रिटर्न के आधार पर पूंजी लगाते हैं। कर नीति का मकसद केवल यह नहीं होना चाहिए कि भारत में अर्जित आय से कितना राजस्व मिल सकता है। वित्त मंत्रालय को केवल अल्पकालिक तरीके से कर राजस्व हासिल करने के बजाय भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि की निरंतरता बनाए रखने पर ध्यान देना चाहिए। विदेशी पूंजी पर कर लगाना आयातित कच्चे माल (इनपुट) पर शुल्क लगाने जैसा है। इससे भारतीय कंपनियों के लिए पूंजी महंगी हो जाती है और भारतीय निर्यात की प्रतिस्पर्द्धात्मकता कम हो जाती है।
विदेशी पूंजी भारतीय व्यवस्था का निष्ठुरता से मूल्यांकन करती है। यह उन जगहों पर जाती है जहां कराधान एवं जोखिम स्पष्ट होते हैं और संस्थागत गुणवत्ता का बेहतर तालमेल होता है। भारत स्रोत आधारित (जहां आय अर्जित हुई है वहां कर) कर नीति अपनाता है मगर आर्थिक सफलता के लिए ‘जगह आधारित’ (जहां निवेशक रहता है वहां कराधान) नीति अधिक फायदेमंद हो सकती है।
तीसरी समस्या भारतीय व्यवस्था द्वारा संपत्ति या अधिकार छीनने की है। भारतीय व्यवस्था के कई घटकों (कर अधिकारियों से लेकर राज्य सरकार तक) का विदेशी कंपनियों को नुकसान पहुंचाने का इतिहास रहा है। विकासशील देशों में न्यायपालिका और संपत्ति के अधिकारों जैसी घरेलू संस्थाएं कमजोर होती हैं। द्विपक्षीय निवेश समझौते एक सुरक्षा कवच का काम करते हैं। जब घरेलू संस्थाएं विफल हो जाती हैं तो ये समझौते अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के जरिये विदेशी निवेशकों की रक्षा करते हैं। इन समझौतों का आर्थिक उद्देश्य संस्थागत जोखिम कम करना है। इससे विदेशी निवेशकों द्वारा मांगी जाने वाली रिटर्न की दर कम हो जाती है। मजबूत समझौते करने के कारण जो पैसा दिया जाता है वह देश में बड़ी मात्रा में विदेशी पूंजी स्थिर रखने के बदले में बीमा भुगतान जैसा होता है।
चौथी समस्या व्यापार से जुड़ी बाधाएं हैं। विदेशी निवेश हासिल करने वाली कंपनियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक काम करती हैं यानी वे अधिक आयात और निर्यात करती हैं।
व्यापार बाधाएं भारत के अंतरराष्ट्रीयकरण को नुकसान पहुंचाती हैं। किसी ‘अपस्ट्रीम’ उत्पादक (कच्चा माल या शुरुआती चरण का उत्पाद बनाने वाला) को संरक्षण देने से सभी ‘डाउनस्ट्रीम’ उत्पादक (अंतिम उत्पाद बनाने वाले) कम प्रतिस्पर्द्धी हो जाते हैं। स्थानीय सामग्री की जरूरत और गैर-शुल्क बाधाएं भारत में उत्पादन केंद्र स्थापित करने की आर्थिक व्यवहार्यता कम करती हैं। कंपनियां व्यापार नीति की समस्याओं को निवेश व्यवस्था के ही एक हिस्से के रूप में देखती हैं। जब भारतीय व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय व्यापार में हस्तक्षेप करती है तो भारत दुनिया के लिए उत्पादन का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र नहीं बन सकता। कोई कंपनी जब यह तय करती है कि अपना संयंत्र कहां लगाएं तो वह सीमा पर आने वाली बाधाओं का भी मूल्यांकन करती है।
पांचवीं समस्या घरेलू वित्तीय प्रणाली है। एक बार विदेशी पूंजी भारत पहुंच जाती है तो वह भारतीय वित्तीय प्रणाली के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़ जाती है। इक्विटी बाजार में विश्वसनीय मूल्य निर्धारण, सभी वित्तीय बाजारों में तरलता, मुद्रा जोखिम से बचाव की क्षमता, बैंकों पर भरोसा, आरंभिक सार्वजनिक पेशकश (आईपीओ) की कार्य प्रणाली आदि घरेलू वित्त की ये सभी विशेषताएं विदेशी निवेशकों के लिए अंतिम निवेश परिणामों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
विदेशी निवेशकों को डॉलर एवं रुपया विनिमय दर पर मूल्य नियंत्रण के रूप में सरकारी सब्सिडी की आवश्यकता नहीं है। उन्हें विनिमय दर जोखिम से बचाव के लिए तरल, बेहतर मूल्य वाली डेरिवेटिव योजनाओं की आवश्यकता है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेशक भविष्य के लाभांश, परिचालन नकदी प्रवाह और अंततः लंबी अवधि में परिसंपत्ति बिक्री के माध्यम से रुपये से जुड़े जोखिमों का सामना करते हैं। उन्हें भारतीय बॉन्ड-मुद्रा-डेरिवेटिव गठजोड़ में अपार क्षमताओं की आवश्यकता है मगर नीति निर्माताओं ने वर्ष 2013 के बाद इन क्षमताओं को नुकसान पहुंचाया है।
अंत में, कानून के शासन और संस्थागत विकास की बात करते हैं। विदेशी पूंजी तब सहम जाती है जब अनुबंध लागू नहीं होते, कर प्रशासन मनमाना होता है और नियामक व्याख्या बिना किसी पूर्व सूचना के बदल जाती है। अगर भारत सरकार से संबंध स्थापित करने के लिए सरकार से राफ्ता कायम करने में मदद करने वाली कंपनियों की सेवाएं लेनी पड़ती हैं तो समझिए कि कुछ गड़बड़ है।
घरेलू निवेशकों को भी इन सभी कमजोर संस्थाओं का सामना करना पड़ता है। उन्होंने भी निवेश से पीछे हटकर प्रतिक्रिया दी है मगर वे बेहतर स्थिति में हैं क्योंकि वे व्यक्तिगत शक्ति के मानवीय तंत्र को समझने में सक्षम हैं। विदेशी निवेशकों के लिए यह कठिन है और विदेशी निवेशकों के पास निवेश करने के लिए अधिक विकल्प हैं। उन्हें कानून के शासन की सबसे अधिक आवश्यकता है।
सब्सिडी, उत्पादन-संबंधी प्रोत्साहन और निवेश-प्रोत्साहन एजेंसियां संस्थागत कमजोरी की भरपाई करने का प्रयास करती हैं। ये कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों के लिए काम करती हैं। ये कार्यशील संस्थाओं का स्थान नहीं ले सकतीं।
पूंजी प्रवाह, व्यापार और एफडीआई के मामले में उन्नत अर्थव्यवस्थाओं के साथ आर्थिक जुड़ाव से भारत के पीछे हटने को लेकर व्यापक चिंता है। हालांकि, इसका कोई अचूक समाधान नहीं है। हमने जिन छह बातों का जिक्र किया है उन सभी मोर्चों पर प्रगति की आवश्यकता है।
(लेखक एक्सकेडीआर फोरम में शोधकर्ता हैं)भारत को निरंतर आर्थिक वृद्धि बनाए रखने के लिए दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं से जुड़ना होगा। इसका फायदा यह है कि विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ नजदीकी से कंपनियों की उत्पादकता बढ़ती है। भारत एक ऐसी अर्थव्यवस्था है जहां पूंजी की भारी कमी है। घरेलू निवेश के लिए बड़ी मात्रा में सस्ती विदेशी पूंजी की आवश्यकता होती है। हाल में जो रुझान एवं आंकड़े दिखे हैं वे चिंताजनक हैं। वर्ष 2011 से शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेश भी नहीं बढ़ रहा है। कंपनियां कम आयात कर रही हैं और जाहिर है निर्यात भी कम हो गया है।
कोई एक नीतिगत बदलाव वर्तमान हालात में परिवर्तन नहीं ला सकता। हमें भारत सरकार के साथ विदेशी कंपनियों के पूरे कामकाज और जुड़ाव का आकलन करना होगा। ऐसे में छह प्रमुख बातें हैं जिन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
पहला प्रश्न यह है कि क्या पूंजी आ सकती है, देश के व्यावसायिक हालात में फिट बैठ सकती है और फिर यहां से निकाली जा सकती है। सरकार एक केंद्रीय योजना प्रणाली (पूंजी नियंत्रण व्यवस्था) चलाती है, जिसमें साधनों, मूल्य निर्धारण, पुनर्गठन और कारोबार से बाहर निकलने से जुड़ी शर्तों पर उसका नियंत्रण होता है। ऐसी व्यवस्था व्यावसायिक फैसलों में दखल देती है।
हजारों पन्नों में फैले दखल देने वाले और बारीक कानूनी नियमों का एक ऐसा जाल बिछा हुआ है, जिनके उल्लंघन पर आपराधिक सजा का प्रावधान है। निवेशकों को नियमों, नीतिगत दस्तावेज और परिपत्रों में वर्णित अपनी जिम्मेदारियों को समझने के लिए महंगी कानूनी सलाह की जरूरत होती है। इस कानून को सुदृढ़ कर सरल, स्थिर और समझने योग्य बनाने की आवश्यकता है और यह भी सुनिश्चित करना होगा कि कारोबार की दुनिया यह दखल न दे।
मूल्य निर्धारण से जुड़े नियम तो खासकर नुकसानदेह हैं। ये नियम इस सोच पर आधारित होते हैं कि कोई मूल्यांकनकर्ता एक आधिकारिक मूल्य का पता लगा सकता है और व्यावसायिक अनिश्चितता खत्म कर सकता है। यह उचित एवं पारदर्शी तरीके से जोखिम लेने की क्षमता में खलल डालता है। इससे छोटी कंपनियों को नुकसान होता है क्योंकि वे लचीली वित्त पोषण व्यवस्था पर निर्भर रहती हैं।
दूसरा, विदेशी निवेशकों को घरेलू कर के अलावा वैश्विक स्तर पर भी कराधान से गुजरना पड़ता है। वे अलग-अलग देशों में करों के बाद हासिल रिटर्न के आधार पर पूंजी लगाते हैं। कर नीति का मकसद केवल यह नहीं होना चाहिए कि भारत में अर्जित आय से कितना राजस्व मिल सकता है। वित्त मंत्रालय को केवल अल्पकालिक तरीके से कर राजस्व हासिल करने के बजाय भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि की निरंतरता बनाए रखने पर ध्यान देना चाहिए। विदेशी पूंजी पर कर लगाना आयातित कच्चे माल (इनपुट) पर शुल्क लगाने जैसा है। इससे भारतीय कंपनियों के लिए पूंजी महंगी हो जाती है और भारतीय निर्यात की प्रतिस्पर्द्धात्मकता कम हो जाती है।
विदेशी पूंजी भारतीय व्यवस्था का निष्ठुरता से मूल्यांकन करती है। यह उन जगहों पर जाती है जहां कराधान एवं जोखिम स्पष्ट होते हैं और संस्थागत गुणवत्ता का बेहतर तालमेल होता है। भारत स्रोत आधारित (जहां आय अर्जित हुई है वहां कर) कर नीति अपनाता है मगर आर्थिक सफलता के लिए ‘जगह आधारित’ (जहां निवेशक रहता है वहां कराधान) नीति अधिक फायदेमंद हो सकती है।
तीसरी समस्या भारतीय व्यवस्था द्वारा संपत्ति या अधिकार छीनने की है। भारतीय व्यवस्था के कई घटकों (कर अधिकारियों से लेकर राज्य सरकार तक) का विदेशी कंपनियों को नुकसान पहुंचाने का इतिहास रहा है। विकासशील देशों में न्यायपालिका और संपत्ति के अधिकारों जैसी घरेलू संस्थाएं कमजोर होती हैं। द्विपक्षीय निवेश समझौते एक सुरक्षा कवच का काम करते हैं। जब घरेलू संस्थाएं विफल हो जाती हैं तो ये समझौते अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के जरिये विदेशी निवेशकों की रक्षा करते हैं। इन समझौतों का आर्थिक उद्देश्य संस्थागत जोखिम कम करना है। इससे विदेशी निवेशकों द्वारा मांगी जाने वाली रिटर्न की दर कम हो जाती है। मजबूत समझौते करने के कारण जो पैसा दिया जाता है वह देश में बड़ी मात्रा में विदेशी पूंजी स्थिर रखने के बदले में बीमा भुगतान जैसा होता है।
चौथी समस्या व्यापार से जुड़ी बाधाएं हैं। विदेशी निवेश हासिल करने वाली कंपनियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक काम करती हैं यानी वे अधिक आयात और निर्यात करती हैं।
व्यापार बाधाएं भारत के अंतरराष्ट्रीयकरण को नुकसान पहुंचाती हैं। किसी ‘अपस्ट्रीम’ उत्पादक (कच्चा माल या शुरुआती चरण का उत्पाद बनाने वाला) को संरक्षण देने से सभी ‘डाउनस्ट्रीम’ उत्पादक (अंतिम उत्पाद बनाने वाले) कम प्रतिस्पर्द्धी हो जाते हैं। स्थानीय सामग्री की जरूरत और गैर-शुल्क बाधाएं भारत में उत्पादन केंद्र स्थापित करने की आर्थिक व्यवहार्यता कम करती हैं। कंपनियां व्यापार नीति की समस्याओं को निवेश व्यवस्था के ही एक हिस्से के रूप में देखती हैं। जब भारतीय व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय व्यापार में हस्तक्षेप करती है तो भारत दुनिया के लिए उत्पादन का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र नहीं बन सकता। कोई कंपनी जब यह तय करती है कि अपना संयंत्र कहां लगाएं तो वह सीमा पर आने वाली बाधाओं का भी मूल्यांकन करती है।
पांचवीं समस्या घरेलू वित्तीय प्रणाली है। एक बार विदेशी पूंजी भारत पहुंच जाती है तो वह भारतीय वित्तीय प्रणाली के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़ जाती है। इक्विटी बाजार में विश्वसनीय मूल्य निर्धारण, सभी वित्तीय बाजारों में तरलता, मुद्रा जोखिम से बचाव की क्षमता, बैंकों पर भरोसा, आरंभिक सार्वजनिक पेशकश (आईपीओ) की कार्य प्रणाली आदि घरेलू वित्त की ये सभी विशेषताएं विदेशी निवेशकों के लिए अंतिम निवेश परिणामों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
विदेशी निवेशकों को डॉलर एवं रुपया विनिमय दर पर मूल्य नियंत्रण के रूप में सरकारी सब्सिडी की आवश्यकता नहीं है। उन्हें विनिमय दर जोखिम से बचाव के लिए तरल, बेहतर मूल्य वाली डेरिवेटिव योजनाओं की आवश्यकता है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेशक भविष्य के लाभांश, परिचालन नकदी प्रवाह और अंततः लंबी अवधि में परिसंपत्ति बिक्री के माध्यम से रुपये से जुड़े जोखिमों का सामना करते हैं। उन्हें भारतीय बॉन्ड-मुद्रा-डेरिवेटिव गठजोड़ में अपार क्षमताओं की आवश्यकता है मगर नीति निर्माताओं ने वर्ष 2013 के बाद इन क्षमताओं को नुकसान पहुंचाया है।
अंत में, कानून के शासन और संस्थागत विकास की बात करते हैं। विदेशी पूंजी तब सहम जाती है जब अनुबंध लागू नहीं होते, कर प्रशासन मनमाना होता है और नियामक व्याख्या बिना किसी पूर्व सूचना के बदल जाती है। अगर भारत सरकार से संबंध स्थापित करने के लिए सरकार से राफ्ता कायम करने में मदद करने वाली कंपनियों की सेवाएं लेनी पड़ती हैं तो समझिए कि कुछ गड़बड़ है।
घरेलू निवेशकों को भी इन सभी कमजोर संस्थाओं का सामना करना पड़ता है। उन्होंने भी निवेश से पीछे हटकर प्रतिक्रिया दी है मगर वे बेहतर स्थिति में हैं क्योंकि वे व्यक्तिगत शक्ति के मानवीय तंत्र को समझने में सक्षम हैं। विदेशी निवेशकों के लिए यह कठिन है और विदेशी निवेशकों के पास निवेश करने के लिए अधिक विकल्प हैं। उन्हें कानून के शासन की सबसे अधिक आवश्यकता है।
सब्सिडी, उत्पादन-संबंधी प्रोत्साहन और निवेश-प्रोत्साहन एजेंसियां संस्थागत कमजोरी की भरपाई करने का प्रयास करती हैं। ये कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों के लिए काम करती हैं। ये कार्यशील संस्थाओं का स्थान नहीं ले सकतीं।
पूंजी प्रवाह, व्यापार और एफडीआई के मामले में उन्नत अर्थव्यवस्थाओं के साथ आर्थिक जुड़ाव से भारत के पीछे हटने को लेकर व्यापक चिंता है। हालांकि, इसका कोई अचूक समाधान नहीं है। हमने जिन छह बातों का जिक्र किया है उन सभी मोर्चों पर प्रगति की आवश्यकता है।
(लेखक एक्सकेडीआर फोरम में शोधकर्ता हैं)