प्रतिभूति बाजार संहिता (एसएमसी) का मसौदा प्रतिभूति अनुबंध (विनियमन) अधिनियम भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) अधिनियम और डिपॉजिटरी अधिनियम को सुदृढ़ और आधुनिक बनाने की दिशा में उठाया गया कदम है। एक आदर्श नियामक ढांचे को बाजार विफलताओं की त्रुटियों को करने के साथ-साथ नवाचार और पूंजी निर्माण को बाधित करने वाले बोझिल नियमों से जुड़ी ‘टाइप-2’ त्रुटियों से बचना चाहिए।
बाजार नियमन में ‘टाइप-1’ और ‘टाइप-2’ त्रुटियां सांख्यिकीय परिकल्पना के सिद्धांत पर आधारित हैं। इनका इस्तेमाल नियामक (जैसे सेबी या आरबीआई) द्वारा बाजार में अनुचित व्यवहार एवं गतिविधियां रोकने के लिए उठाए गए कदमों की सटीकता मापने के लिए किया जाता है।
दिनों दिन जटिल हो रही बाजार व्यवस्था में इन दोनों उद्देश्यों को संतुलित करने के लिए पारदर्शी परामर्श, गहन विशेषज्ञता, वाजिब प्रोत्साहन और संस्थागत विश्वसनीयता जरूरी है।
संतुलित विनियमन के लिए पारदर्शी परामर्श आवश्यक है। सेबी की मौजूदा प्रक्रिया पहले से ही उच्च मानक स्थापित करती है। इसके परामर्श पत्र मुद्दों की पहचान करते हैं, संदर्भ और उद्देश्यों को स्पष्ट करते हैं, विकल्प पेश करते हैं और नफा-नुकसान का मूल्यांकन करते हैं। पारदर्शी सार्वजनिक परामर्शों के माध्यम से नियामक प्रस्तावों में काफी सुधार हुआ है। एसएमसी का मसौदा नियम तैयार करने में परामर्श और पारदर्शिता और मजबूत करता है। यह आवश्यकता पूंजी बाजारों को प्रभावित करने वाली सरकारी नीतियों पर भी लागू होनी चाहिए।
सेबी कई ऐसे क्षेत्रों पर नजर रखता है जो अत्यंत जटिल हैं। इनमें विभिन्न परिसंपत्ति वर्गों के प्राथमिक और द्वितीयक बाजार, फंड, मध्यस्थ, बाजार अवसंरचना संस्थान, संचालन, साइबर सुरक्षा आदि शामिल हैं। यह बात जरूरी है कि नियामक क्षमता और विशेषज्ञता पारिस्थितिकी तंत्र के अनुरूप विकसित हों। नियम-कायदे तैयार करने संबंधी किसी भी परामर्श में हितधारकों के विविध और एक दूसरे से अलग हित होते हैं।
कुछ आवाजें हमेशा दूसरों की तुलना में अधिक बुलंद होती हैं। छोटे निवेशकों और कंपनियों का अक्सर प्रतिनिधित्व नहीं होता है। कुल मिलाकर, नियामकों के सामने एक बड़ी चुनौती होती है। उन्हें सभी दृष्टिकोणों का निष्पक्ष मूल्यांकन करना होता है जिनमें अनसुने और अनदेखे लोगों के नजरिये भी शामिल हैं और जोखिम नियंत्रण तथा व्यापार करने में सुगमता के बीच सही संतुलन बनाना पड़ता है।
इसके लिए गहन क्षेत्र विशेष ज्ञान की आवश्यकता होती है। इसी तरह, प्रभावी बदलाव लाने के लिए नियामकों को प्रत्येक मामले की गंभीरता का आकलन करना चाहिए और नियमों की व्याख्या ठीक ढंग से करनी चाहिए। इसके लिए भी विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है।
सेबी में असाधारण रूप से सक्षम और समर्पित अधिकारियों की मौजूदगी हैं जिनमें ज्यादातर सभी मामलों का अनुभव रखते हैं। ऐसे अधिकारियों का अपना महत्त्व है मगर परस्पर जुड़ी इस दुनिया में संस्थागत विशेषज्ञता और गहरा करने के लिए कुछ अधिकारियों को एक ही क्षेत्र के विभिन्न पहलुओं में 12-15 वर्ष व्यतीत कर विशेषज्ञता हासिल करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
नियम-कायदों के अधीन क्षेत्र के परिप्रेक्ष्य को समझने के लिए विशेषज्ञों को प्रासंगिक उन्नत शिक्षा और अंतरराष्ट्रीय अनुभव के साथ-साथ उद्योग-संबंधी अवकाश लेने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। हितों के संभावित टकरावों का समाधान पारदर्शी ढंग से किया जा सकता है।
नियामक अधिकारियों को बाजार की विफलताओं को दूर न कर पाने से होने वाली ‘टाइप-1’ त्रुटियों के परिणामों का असमान रूप से सामना करना पड़ता है, क्योंकि ये त्रुटियां स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं और इनके लिए किसी को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। इसके विपरीत, ‘टाइप-2’ त्रुटियों (जैसे कि वैध गतिविधियों, नवाचार और पूंजी निर्माण में बाधा डालना) की लागतें अक्सर बिखरी हुई होती हैं और कम दिखाई देती हैं।
यह नियामकों को सतर्कता बरतने के लिए प्रेरित कर सकता है जिससे वे टाइप-1 त्रुटियों के बजाय टाइप-2 त्रुटियों का जोखिम उठाने के लिए तैयार हो जाते हैं। यह समस्या दूर करने के लिए सेबी में वरिष्ठ स्तर की पदोन्नति में उन अधिकारियों की खास पहचान की जानी चाहिए जिन्होंने प्रभावी जोखिम प्रबंधन और वैध पूंजी निर्माण को सुगम बनाने के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए आवश्यक पेशेवर निर्णय क्षमता का लगातार परिचय दिया है।
एसएमसी के तहत प्रस्तावित सेबी बोर्ड संरचना वैश्विक मानकों के हिसाब से असामान्य है। दुनिया के प्रमुख देशों में प्रतिभूति नियामक अपेक्षाकृत छोटे, कार्यकारी नेतृत्व वाले निदेशक मंडल (बोर्ड ) या आयोगों के माध्यम से कार्य करते हैं,जिनकी नियुक्ति सरकार द्वारा की जाती है। मगर उनमें पदेन सदस्य सरकारी प्रतिनिधि नहीं होता है।
इसके उलट एसएमसी ने 15 सदस्यीय सेबी बोर्ड का प्रस्ताव रखा है जिसमें अध्यक्ष, कम से कम पांच पूर्णकालिक सदस्य, दो पदेन केंद्रीय सरकारी अधिकारी, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) का एक प्रतिनिधि और अन्य अंशकालिक सदस्य शामिल होंगे। प्रत्येक प्रतिभूति बाजार विनियमन के लिए सेबी बोर्ड की मंजूरी आवश्यक है।
इसकी तुलना में देखें तो नियामक निर्णयों में आरबीआई बोर्ड की भूमिका सीमित है और उसकी दैनिक नीति कार्यपालिका द्वारा संचालित होती है। नियुक्ति की ताकत के अलावा सरकार का सेबी बोर्ड में प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व भी है। शायद यह तब समझ में आने वाली बात थी जब सेबी को अस्तित्व में आए कुछ ही समय हुआ था। हालांकि, अब बाजार और सेबी दोनों काफी परिपक्व हो चुके हैं।
अन्य वैश्विक प्रतिभूति बाजार नियामकों की तरह सेबी को भी अधिक परिचालन स्वायत्तता दी जा सकती है जिसमें कार्यपालिका को रोजमर्रा के नियामक निर्णयों को संभालने का अधिकार दिया जाए।
आखिरकार, सेबी में नियम बनाने की प्रक्रिया की निगरानी की पहले से ही व्यापक व्यवस्था है जबकि प्रतिभूति अपील पंचाट (एसएटी) इसके निर्णय के खिलाफ दायर अपीलों की सुनवाई करता है।
व्यापक बोर्ड तब शासन और निगरानी पर ध्यान केंद्रित कर सकता है। निश्चित रूप से सेबी के अध्यक्ष और पूर्णकालिक सदस्यों की नियुक्ति और किसी कारणवश उन्हें हटाने का अधिकार सरकार के पास रहेगा। अगर एसएमसी की प्रस्तावित संरचना बरकरार रखी जाती है तो संस्थागत विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए विशेषज्ञता और संतुलित निर्णय पर अधिक जोर देने की शर्त अन्य सभी बोर्ड सदस्यों पर भी लागू होनी चाहिए। बेहतर संचालन व्यवस्था के लिए मौद्रिक नीति समिति के बाहरी सदस्यों को नियंत्रित करने वाले ढांचे की तरह बोर्ड में बाहरी नियुक्तियों को एक ही कार्यकाल तक सीमित करना भी उचित है।
एक अंतिम मुद्दा बाजार अवसंरचना संस्थानों (एमआईआई) (जैसे एक्सचेंज, क्लियरिंग कॉरपोरेशन और डिपॉजिटरी) से संबंधित है जो कारोबार के लिए आपस में सक्रिय रूप से प्रतिस्पर्द्धा करती हैं। साथ ही, वे अपने भुगतान करने वाले सदस्यों से जुड़े नियम-कायदे तय करने के साथ पर्यवेक्षण और निगरानी भी करती हैं। इससे हितों के टकराव की आशंका बनी रहती है।
विश्वास और विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए एमआईआई के नियामक कार्यों को एक अलग गैर-वाणिज्यिक संस्था में स्थांतरित करने पर विचार करना उचित होगा जैसा अमेरिका में वित्तीय उद्योग नियामक प्राधिकरण है।
भारत के प्रतिभूति बाजार ने व्यापक गहराई और तकनीकी विशेषज्ञता हासिल कर ली है। सुधार के अगले चरण में पारदर्शी परामर्श, गहन विशेषज्ञता, संतुलित प्रोत्साहन और अधिक संस्थागत विश्वसनीयता के माध्यम से संस्थानों को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।
(लेखक सेबी के पूर्व पूर्णकालिक सदस्य हैं। ये उनके निजी विचार हैं)