facebookmetapixel
Advertisement
Stocks To Watch Today: HAL से मेगा ऑर्डर, Zepto की ₹1,000 करोड़ फंडिंग, RailTel के नतीजे… आज इन शेयरों में दिख सकती है तेजीअमेरिकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरें स्थिर रखीं, सख्त रुख से बाजार की चिंता बढ़ीविदेशी निवेशकों की खरीदारी से लगातार दूसरे दिन चढ़ा शेयर बाजार, सेंसेक्स 274 अंक मजबूतबजाज फाइनैंस का पहली तिमाही में शानदार प्रदर्शन, प्रॉफिट 29% बढ़ा, एसेट क्वालिटी में सुधारAI पर बड़ा दांव, बजाज फाइनैंस ने 10 साल में ₹40 लाख करोड़ AUM का रखा लक्ष्यRBI की मौद्रिक नीति से पहले जियो क्रेडिट, हीरो फिनकॉर्प समेत कंपनियों ने बॉन्ड से ₹2,520 करोड़ जुटाएदेशभर में केवल E-20 पेट्रोल बिक्री के लिए उपलब्ध, रसीद पर एथनॉल प्रतिशत दिखाना जरूरी नहीं: गडकरीप्राकृतिक आपदाओं से अनाज का नुकसान 77% घटा, FCI ने भंडारण व्यवस्था को बताया सुरक्षितGSTN ने नई E-Way Bill सुविधाएं वापस लीं, फिलहाल पुराने नियम ही रहेंगे लागूNEP 2020 के 6 साल बाद भी अधूरे लक्ष्य, फंडिंग और ढांचागत कमी बनी सबसे बड़ी चुनौती

ब्याज दर बढ़ाना नहीं है समाधान, रुपया संभालने के लिए RBI को आजमाने कुछ नए विकल्प

Advertisement

आर्थिक सुस्ती और महंगाई के बीच, आरबीआई को ब्याज दरें बढ़ाने के बजाय एनआरआई जमा जैसे अन्य विकल्पों से विदेशी मुद्रा भंडार और रुपया संभालना चाहिए

Last Updated- June 01, 2026 | 11:00 PM IST
Reserve Bank of India (RBI)
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

नीतिगत दरें तय करने वाली भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की संस्था मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की इस सप्ताह (3 से 5 जून) बैठक होने वाली है। चालू वित्त वर्ष में एमपीसी की यह दूसरी बैठक होगी। बड़ा सवाल यह है कि इस बैठक से क्या निकल कर आने वाला है? 

अप्रैल में 5 से 8 तारीख तक एमपीसी की पहली बैठक के बाद पिछले दो महीनों में दुनिया के कई केंद्रीय बैंकों ने प्रमुख नीतिगत दरों में बढ़ोतरी की है। उस समय पश्चिम एशिया संकट को पांच सप्ताह ही हुए थे। दूसरी बैठक भी इसी संकट की छाया में हो रही है। 

क्या आरबीआई दुनिया के दूसरे केंद्रीय बैंकों की तर्ज पर नीतिगत दर बढ़ाएगा या अमेरिकी फेडरल रिजर्व, यूरोपीय केंद्रीय बैंक, बैंक ऑफ इंगलैंड और बैंक ऑफ कनाडा की तरह दरें अपरिवर्तित रखेगा? ये चारो केंद्रीय बैंक दर बढ़ोतरी को लेकर गहन मंथन कर रहे हैं। इन्होंने आखिरी बार जुलाई और सितंबर 2023 के बीच अपनी नीतिगत दरें बढ़ाई थीं। 

एमपीसी की पिछली बैठक में रीपो दर 5.25 फीसदी पर अपरिवर्तित रखी गई थी। स्थायी जमा सुविधा (एसडीएफ) दर 5 फीसदी और सीमांत स्थायी सुविधा (एमएसएफ) दर 5.5फीसदी पर अपरिवर्तित रही। अप्रैल में एमपीसी की बैठक के दौरान 364 दिन के ट्रेजरी बिल पर यील्ड 5.63 फीसदी, तीन महीने की अवधि के बिल पर 5.3 फीसदी और 182 दिनों की अवधि के बिल पर यील्ड 5.53 फीसदी थी। एक वर्षीय सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (सीडी) की दर 7.1 से 7.4 फीसदी और एक वर्षीय कम​र्शियल पेपर (सीपी) पर ब्याज दर 7.4 से 7.6 फीसदी के बीच थी।

मगर तब से 364 दिनों के ट्रेजरी बिल पर यील्ड बढ़कर 6.02 फीसदी, तीन महीने के बिल पर 5.56 फीसदी और 182 दिनों की अवधि के बिल पर 5.735 फीसदी हो गई है। एक वर्षीय सीडी पर दर अब 7.75 से 8.25 फीसदी और एक वर्ष के सीपी पर दर 7.6 से 8फीसदी के बीच है।

तो क्या मौजूदा हालात में आरबीआई को रीपो दर बढ़ानी चाहिए? आइए, पहले कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण संकेतकों पर नजर डालें। 10 वर्ष की अवधि पर बॉन्ड यील्ड 6.90 फीसदी और 7.14 फीसदी के बीच रही है। इस दौरान अमेरिका के 10 वर्ष की अवधि के बॉन्ड और भारत के 10 वर्ष के बॉन्ड पर यील्ड के बीच अंतर 2.61 फीसदी अंक से घटकर 2.52 फीसदी अंक हो गया है। यह कमी इस क्षेत्र में विदेशी मुद्रा प्रवाह के लिए एक समस्या बन गई है।

इस दौरान रुपया 8 अप्रैल को पिछली नीति के दिन डॉलर की तुलना में 92.58 के स्तर पर था। शुक्रवार को यह 94.96 के ऊंचे स्तर पर पहुंचने के बाद 95 डॉलर पर बंद हुआ। (कुछ सप्ताह पहले एक दिन यह 96.91 के निचले स्तर पर पहुंच गया था और अंत में 96.82 डॉलर प्रति डॉलर पर बंद हुआ।) 10 अप्रैल को भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 700 अरब डॉलर से थोड़ा अधिक था। 22 मई को यह लगभग 681 अरब डॉलर रह गया।

विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट आरबीआई द्वारा डॉलर की बिक्री और डॉलर एवं अन्य विदेशी मुद्राओं के बीच विनिमय दर में उतार-चढ़ाव के कारण आई है। विदेशी मुद्रा बाजार में अस्थिरता कम करने के लिए आरबीआई द्वारा खरीदे गए प्रत्येक डॉलर से रुपये की तरलता कम हो जाती है। तरलता संतुलित करने के लिए आरबीआई खरीद-बिक्री स्वैप करता है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार का स्तर भी ऊंचा बना रहता है।

नीतिगत दर संरचना में यह विसंगति सरकारी बॉन्ड नीलामी में कट-ऑफ यील्ड में खास तौर पर दिखती है। केंद्र सरकार चार वर्ष के लिए 6.7फीसदी, सात साल के लिए 7.06 फीसदी और 30 साल के लिए 7.67 फीसदी की दर पर बाजार से उधार ले रही है। राज्य सरकारें तो इससे भी अधिक ब्याज दर चुका रही हैं। आरबीआई के लिए चुनौती इस समय रीपो दर स्थिर रखनी है।

इस वर्ष फरवरी में ब्याज दर थामने और अप्रैल में यथास्थिति बनाए रखने से पहले फरवरी से दिसंबर 2025 के बीच125 आधार अंक की कटौती की गई थी। वर्ष 2019 के बाद यह सबसे आक्रामक कटौती थी।

अप्रैल में एमपीसी ने सर्वसम्मति से नीतिगत दर 5.25 फीसदी पर अपरिवर्तित रखा और रुख ‘तटस्थ’ बनाए रखने का भी निर्णय लिया। पश्चिम एशिया में तनाव का असर लंबे समय तक हावी नहीं रहने की उम्मीदों के दम पर अप्रैल में वित्त वर्ष 2027 के लिए वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर 6.9 फीसदी रहने का अनुमान लगाया गया था।

हालांकि, युद्ध जारी रहने की स्थिति में इसमें कमी की आशंका जताई गई थी। इसमें उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित मुद्रास्फीति दर वित्त वर्ष 2027 के लिए 4.6 फीसदी रहने का अनुमान लगाया गया था। यह तय है कि आरबीआई जीडीपी अनुमान में कमी करेगा और मुद्रास्फीति अनुमान बढ़ा देगा।

क्या आरबीआई आपूर्ति में अचानक आए व्यवधान और इस दशक के सबसे कमजोर मॉनसून की आशंका के कारण मुद्रास्फीति से निपटने के लिए ब्याज दरों में वृद्धि करेगा? मेरा अनुमान है कि आरबीआई ऐसा करने से परहेज करेगा। वह सभी आंकड़ों पर नजर रखना जारी रखेगा और ब्याज दर में बदलाव करने से पहले इंतजार करेगा। चूंकि, वर्तमान रुख तटस्थ है इसलिए उसके पास कुछ न कुछ गुंजाइश तो जरूर है।

इस समय चार प्रमुख चिंताएं हैं जिनमें रुपया कमजोर होना, विदेशी पूंजी की निकासी, आपूर्ति व्यवस्था में बाधा आने से ऊंची मुद्रास्फीति और कमजोर आर्थिक वृद्धि दर शामिल हैं। रुपया संभालने और विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए ब्याज दर बढ़ाने के बजाय आरबीआई को शायद अन्य विकल्पों पर विचार करने की जरूरत है।

विदेशी मुद्रा बाजार में केंद्रीय बैंक का हस्तक्षेप कारगर नहीं रहने वाला है। आक्रामक खुले बाजार संचालन के माध्यम से ब्याज दर कम करने और खरीद-बिक्री स्वैप के माध्यम से नकदी उपलब्ध कराने से घरेलू निवेशकों के लिए ऋण दरें अधिक आकर्षक नहीं रह जाती हैं जिससे वे शेयर बाजार की तरफ रुख करने लगते हैं।

विदेशी निवेशक अन्य कारणों से बाजार से दूर भाग रहे हैं। डॉलर बेचने और ब्याज दरें बढ़ाने के अलावा अन्य विकल्पों पर विचार करने का समय आ गया है। इनमें से एक विकल्प प्रवासी भारतीयों (एनआरआई) की जमा राशि बढ़ाना हो सकता है। आरबीआई ने वर्ष 2013 में इसी तरीके से 26 अरब डॉलर जुटाए थे जिसमें एक रियायती स्वैप विंडो विकल्प की पेशकश की गई थी। इस विकल्प के माध्यम से बैंक जुटाई गई विदेशी मुद्रा जमा कर सकते थे और बदले में रुपये के समतुल्य राशि हासिल कर सकते थे, साथ ही विनिमय दर से जुड़े जोखिमों से कम एवं निश्चित दर पर पूरी तरह बच सकते थे।

आरबीआई कंपनियों के लिए भी बैंकों के माध्यम से विदेशी पूंजी जुटाने हेतु इसी तरह का फॉर्मूला तैयार कर सकता है। बेशक, पूंजी की एक लागत होती है मगर फिलहाल इसे आजमाना उचित है क्योंकि मौजूदा हालात देश में विदेशी रकम की आमद के लिए माकूल नहीं लग रहे हैं। साल की दूसरी छमाही में मुद्रास्फीति बढ़ेगी और आर्थिक गति भी धीमी होगी। ऐसे में फिलहाल ब्याज दरों में बढ़ोतरी टाली जा सकती है।

(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड में वरिष्ठ सलाहकार हैं)

Advertisement
First Published - June 1, 2026 | 10:53 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement