हाल के सप्ताहों में कमजोर पड़ते रुपये को थामने में कथित निष्क्रियता के लिए सरकार की जमकर आलोचना हुई है। सवाल किया जाता रहा कि विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) का पैसा बाहर जा रहा है और सरकार हाथ मलते हुए बैठी है? सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक ने हाल ही में एक के बाद एक जिन उपायों की घोषणा की है, उनसे आलोचकों के मुंह बंद करने तथा विदेशी मुद्रा बाजार में थोड़ी शांति लाने में मदद मिलनी चाहिए। बैंकरों ने कहा है कि इन उपायों से लगभग 50 अरब डॉलर की पूंजी आ सकती है।
लेकिन अभी चैन की सांस लेना जल्दबाजी हो सकती है। रुपये का भाग्य दो अनिश्चितताओं पर निर्भर है – अगले कुछ महीनों में कितना एफआईआई बाहर जाता है और ईरान संघर्ष में आगे क्या होता है। रिजर्व बैंक ने जो तरीका अपनाया है, वह 2013-14 के टेपर टैंट्रम में अपनाए तरीके जैसा ही है। मगर दोनों स्थितियां बहुत अलग हैं। 2013-14 में अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने ऐलान किया था कि वह सरकारी ऋण की खरीद कम करेगा। इसकी वजह से अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने की उम्मीद हो गई, जिससे भारत समेत उभरते बाजारों से पूंजी निकलकर वहां जाने लगी।
जून, जुलाई और अगस्त 2013 में भारत से डेट और इक्विटी निवेश निकलकर विदेश जाता दिखा। इसके बाद शेयरों में इक्विटी का निवेश सकारात्मक हो गया। 2013-14 में कुल 79,709 करोड़ रुपये का एफआईआई देश के शेयरों में आया और डेट में से कुल 28,060 करोड़ रुपये का एफआईआई बाहर गया। इस तरह एफआईआई की शुद्ध आवक लगभग 51,649 करोड़ रुपये रही। इससे पहले 2012-13 और इसके बाद 2014-15 में डेट तथा इक्विटी में विदेशी संस्थागत निवेश की आवक उसकी निकासी से बहुत ज्यादा रही।
एफआईआई के प्रवाह के लिहाज से आज ज्यादा प्रतिकूल स्थिति है। लगातार दो वर्षों तक इक्विटी से भारी मात्रा में एफआईआई बाहर गया है। 2024-25 में लगभग 1.27 लाख करोड़ रुपये और 2026 में लगभग 1.80 लाख करोड़ रुपये की निकासी इक्विटी से हुई। 2026 की निकासी अब तक की सबसे ज्यादा थी मगर इस साल की निकासी नया रिकॉर्ड बनाती दिख रही है। चालू वित्त वर्ष में 8 जून तक लगभग 1.45 लाख करोड़ रुपये (लगभग 15 अरब डॉलर) इक्विटी से निकलकर बाहर जा चुके हैं, जो महामारी वाले 2021-22 में निकली कुल रकम से ज्यादा हैं। इस वर्ष भी डेट में एफआईआई की आवक से ज्यादा निकासी हो गई है।
दो वर्ष से अधिक समय से जारी एफआईआई इक्विटी निकासी का कोई ठोस स्पष्टीकरण हमारे पास नहीं है। इसलिए सुधारों की कमी, भ्रष्टाचार, अत्यधिक विनियमन जैसी चिर-परिचित शिकायतों से परे ऐसी वजहें देखी जाएं, जो ज्यादा उचित लगती हैं। हमें बताया जाता है कि भारत के मूल्यांकन अन्य उभरते बाजारों की तुलना में बहुत अधिक हैं। भारतीय बाजार में मूल्यांकन हमेशा ही दूसरे उभरते बाजारों से 50-100 प्रतिशत ज्यादा रहा है। 2023-24 तक अर्निंग्स में वृद्धि भी उच्च दो अंकों में थी। वित्त वर्ष 25 और 26 में यह घटकर निचले एक अंक में आ गई। कहा जाता है कि इस मूल्यांकन पर एफआईआई को दूसरे बाजार ज्यादा आकर्षक लगते हैं।
लेकिन क्या संस्थागत इक्विटी निवेशकों को दूर की यानी कम से कम तीन से पांच वर्ष की संभावना नहीं सोचनी चाहिए? पछले दो वर्षों की सुस्ती के बाद भी उस समयावधि में भारत की चक्रवृद्धि अर्निंग्स वृद्धि अच्छी दिखती है। तो क्या हम मान लें कि दीर्घकालिक इक्विटी निवेशक केवल इसलिए बाजार छोड़ रहे हैं क्योंकि एक-दो वर्ष से अर्निंग्स वृद्धि धीमी पड़ गई है?
कहानी इतनी ही नहीं है। एक अंक की अर्निंग्स वृद्धि केवल निफ्टी 50 के छोटे से दायरे में ही है। इसे निफ्टी 100 तक बढ़ाएं और स्मॉल कैप को शामिल करें तो यह वृद्धि दो अंकों में है। यदि असली कारण मूल्यांकन ही होता तो समझदार इक्विटी निवेशक पूरी तरह बाहर निकलने के बजाय अपने पोर्टफोलियो में बदलाव करते।
एक नई बात कही जा रही है कि आर्टिफिशल इंटेलिजेंस यानी एआई के क्षेत्र में भारत प्रतिस्पर्धी उभरते बाजारों से कुछ पिछड़ता दिख रहा है। इस तर्क में भी दम नहीं दिख रहा। वैश्विक फंड प्रबंधक अपने जोखिम का विस्तार उन सभी बाजारों में कर रहे होंगे, जहां एआई की मजबूत पैठ है या जहां एआई मजबूत नहीं है मगर आर्थिक वृद्धि अच्छी है।
ऐसा इसलिए भी है क्योंकि माना जा रहा है कि एआई शेयर नया बुलबुला बना रहे हैं। कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि दुनिया की एआई महाशक्तियों को अपनी मदद के लिए भारत के सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की आवश्यकता हमेशा रहेगी। ऐसा हे तो भारतीय बाजार को एआई के कारण नुकसान नहीं होना चाहिए।
एफआईआई की निकासी पर ज्यादर टिप्पणियां ऐसी लग रही हैं मानो शेयर बाजार के विशेषज्ञ घटना हो जाने के बाद अपना स्पष्टीकरण सही ठहराने की कोशिश कर रहे हैं। ज्यादा संभावना यही है कि भारत से एफआईआई की निकासी पिछले तीन वर्ष की प्रतिकूल वैश्विक स्थिति का नतीजा है।
अमेरिका में 2024-25 में यील्ड ऊंची थी और वैश्विक निवेशक भारत सहित उभरते बाजारों से निकल गए। वर्ष 2025-26 में ट्रंप के जवाबी शुल्कों ने एफआईआई को भारत से विमुख कर दिया। ट्रंप प्रशासन के दंडात्मक शुल्क से एफआईआई भारतीय बाजार के प्रति खास तौर पर चिंतित हो गए। इन कारणों से हुई एफआईआई निकासी ने रुपये को ऐसी गिरावट में फंसा दिया, जिस पर विराम लगाना आसान नहीं है।
पिछले फरवरी में ईरान संघर्ष शुरू होने के बाद तेजी से चढ़ीं कच्चे तेल की कीमतें ने स्थिति और खराब कर दी। भारत का चालू खाते का घाटा 2025-26 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 1.1 प्रतिशत था, जो 2026-27 में बढ़कर 2.5 प्रतिशत तक पहुंच जाने की आशंका है। इसकी वजह से भी रुपये पर गिरावट का दबाव बढ़ गया है।
जाहिर है कि ईरान गतिरोध में आगे के घटनाक्रम और तेल की कीमतें रुपये के भविष्य पर गहरा प्रभाव डालेंगी। कई विशेषज्ञों का मानना है कि तेल की कीमतें में अभी गिरावट इसलिए आई है क्योंकि कंपनियों ने अपने पास जमा तेल का इस्तेमाल किया है और सरकारों ने रणनीतिक भंडारों का सहारा लिया है। कुछ अरसा पहले विशेषज्ञ गतिरोध लंबा चलने पर तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की आशंका जता रहे थे।
इस प्रकार सरकार और रिजर्व बैंक द्वारा हाल ही में घोषित उपायों से अपेक्षित पूंजी प्रवाह की प्रतीक्षा की जा रही है। अगर पूंजी आती है तो उसे आने में भी कम से कम तीन से चार महीने लग जाएंगे। उस बीच यदि तेल की कीमतें चढ़ीं तो रुपये को थामने के वर्तमान उपाय संभवत: पर्याप्त नहीं रहेंगे।
हम जिन असाधारण परिस्थितियों से गुजर रहे हैं उनमें यह पूछना उचित होगा कि क्या हमें ब्याज दर में वृद्धि तब तक टाल देनी चाहिए, जब तक महंगाई दर 6 प्रतिशत की ऊपरी सीमा से भी ऊपर न चली जाए। पूंजी की आवक और तेल कीमतों में उछाल की इस दौड़ में तेल कीमतें जीत सकती हैं। ऐसे में रुपये को बचाने के लिए अब तक घोषित उपायों के साथ नीतिगत दर में वृद्धि करना सार्थक हो सकता है ताकि आने वाले अनिश्चित समय में रुपये को मजबूती के साथ बचाया जा सके।