जब भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने लीड-बैंक योजना (एलबीएस) के लिए नया मसौदा परिपत्र जारी किया तो कई समाचार पत्रों में ग्रामीण शाखाओं में ऋण-जमा (सीडी) अनुपात की बारीकी से निगरानी के प्रस्ताव से संबंधित खबरें छापी गईं। हालांकि, थोड़ी छानबीन करने पर पता चलता है कि ये चिंताएं नई नहीं हैं बल्कि पिछले साल अप्रैल में जारी हुए मुख्य परिपत्र का ही हिस्सा थीं।
आरबीआई के परिपत्र में व्यक्त चिंताओं में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं हुआ है और वे पूर्ववत ही हैं। यानी ये बैंक सेवाओं से वंचित ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों की उपस्थिति का विस्तार करने, बैंकिंग सेवाओं को सार्वभौमिक रूप से सुलभ बनाने, अवसरों की प्रखंड-स्तरीय पहचान के आधार पर ऋण का बेहतर वितरण, राज्यों के साथ समन्वय और इसके विकासात्मक अनिवार्यताओं आदि से जुड़ी हैं।
समन्वय तंत्र में कई उप-समितियों को शामिल करके किए गए मामूली बदलावों के अलावा मसौदा परिपत्र में कोई भी बात ऐसी नहीं थी जिस पर सुर्खियां बन सकें। अब जब परिपत्र चर्चा में है तो मौजूदा समय में एलबीएस की प्रासंगिकता का विश्लेषण करना हमारे लिए आवश्यक है। पिछली समीक्षा अगस्त 2009 में हुई थी जब उषा थोराट की अध्यक्षता वाली एक उच्च-स्तरीय समिति ने इस मुद्दे की जांच की थी। तब से हालात काफी बदल गए हैं। सूक्ष्म वित्त क्षेत्र के विकास से महिलाओं को ऋण की उपलब्धता आसान हो गई है। यह इस हद तक आसान हो गई है कि कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक ऋण देने के कारण संकट उत्पन्न हो गया है।
शाखा लाइसेंसिंग नीति (जिसके तहत 25 फीसदी नई शाखाएं उन स्थानों पर होनी चाहिए जहां बैंकिंग सुविधाएं नहीं हैं) ने भौतिक पहुंच बढ़ाने में मदद की है जबकि ‘जन धन योजना’ ने परिवारों को बैंकिंग सेवाओं से जोड़ा है। नए लघु वित्त बैंकों (एसएफबी) को लाइसेंस दिए गए हैं और निजी बैंकों सहित बैंकिंग क्षेत्र ने प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (पीएसएल) के लक्ष्यों को लगातार हासिल किया है।
परिपत्र में एलबीएस के दो उद्देश्यों की बात की गई है। पहला उद्देश्य (समावेशी विकास प्राप्त करने के लिए प्राथमिकता क्षेत्रों में ऋण प्रवाह को बढ़ाना) पूरा किया गया है। दूसरे उद्देश्य (वित्तीय सेवाओं तक बेहतर पहुंच और उपयोग के माध्यम से वित्तीय समावेशन को गहरा करना) पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
मसौदा परिपत्र के तहत समन्वय संरचना में बदलाव की बात कही गई है जिसमें समावेशन और साक्षरता, कृषि, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) और भुगतान प्रणाली के लिए उप-समितियां शामिल हैं। यहां भी परिपत्र का लहजा बदले हुए मौलिक ढांचे पर ध्यान देने के बजाय ऋण योजना और वितरण पर केंद्रित है।
एलबीएस का प्रासंगिक ढांचा समाज के वंचित वर्गों तक ऋण पहुंचाने पर आधारित था और इसके लिए जिला-स्तरीय ऋण समितियों और वार्षिक प्रखंड और जिला स्तरीय ऋण योजनाओं की आवश्यकता थी। बैंकों के लिए एक स्पष्ट सेवा क्षेत्र भी निर्धारित था। इनमें से अधिकांश का उल्लंघन हो चुका है। सेवा क्षेत्र की अवधारणा अब अस्तित्व में नहीं है और परस्पर जुड़े बैंकिंग के साथ, गृह शाखा की अवधारणा भी अप्रासंगिक होती जा रही है।
ऋण बाजार की कई इकाइयां (सूक्ष्म वित्त संस्थान, सोना गिरवी रखने के बदले ऋण देने वाली कंपनियां और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां) जमा स्वीकार करने के लिए अधिकृत नहीं है लेकिन ऋण वितरित कर रही हैं। पीएसएल संरचना में बदलाव ने कम बैंकिंग सुविधाओं वाले जिलों को अतिरिक्त महत्त्व देकर कम सेवा वाले क्षेत्रों में ऋण देने को प्रोत्साहित किया है और पीएसएल प्रमाणपत्रों के माध्यम से पीएसएल दायित्वों की व्यापार सुविधा की वजह से अवसरों की खोज हो रही है।
आरबीआई ने एसएफबी के लिए प्राथमिकता क्षेत्र दायित्वों को समायोजित शुद्ध बैंक ऋण के 75 फीसदी से घटाकर 60 फीसदी कर दिया है। इसके अलावा, केंद्रीय बैंक ने एनबीएफसी-एमएफआई के लिए पात्रता हेतु परिसंपत्तियों की सीमा को घटाकर 60 फीसदी कर दिया गया है। ये दोनों ही संकेत आरबीआई के कठोर नियमन से हटकर बाजार की शक्तियों का सम्मान करने की ओर अग्रसर होने का संकेत हैं। इस संदर्भ में, प्रमुख बैंक द्वारा बैंकों की ऋण योजनाओं पर नजर रखना और जमा-निवेश अनुपात की निगरानी करना बेमतलब प्रतीत होता है। एमएफआई और अन्य संस्थान उन जिलों में ऋण दे रहे हैं जहां जमा एवं निवेश अनुपात कम है जबकि उन्हें जमा लेने की अनुमति नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में वित्तीय समावेशन की प्राथमिकताएं भिन्न हैं। सबसे पहले बचत आधारित समावेशन पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है। जन धन योजना और बिजनेस कॉरेस्पोंडेंट की संरचना के साथ बैंक खातों का लगभग सार्वभौमीकरण हो चुका है। मगर गरीबों को सुरक्षित स्थानों पर बचत करने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु कोई अभियान नहीं चलाया गया है जिसमें उन्हें कई विकल्प उपलब्ध कराए जाएं। यह धारणा काफी प्रबल है कि गरीब बचत नहीं करते या नहीं कर सकते। बचत केवल नकदी प्रवाह के प्रबंधन का मामला है जिसे गरीब एक कुशल फंड मैनेजर की तुलना में कहीं बेहतर ढंग से कर सकते हैं।
दूसरी बात, परिपत्र के मसौदे में भुगतान की बात की गई है और हम देखते हैं कि ऐप-आधारित भुगतान सर्वव्यापी हैं। हालांकि, खाता एक उपकरण (डिवाइस) से जुड़ा होता है। यहां मुख्य बात यह होनी चाहिए कि प्रत्येक बैंक खाताधारक को अपने निजी उपकरण से डिजिटल रूप से लेनदेन करने की सुविधा मिले।
तीसरा और सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू उपभोक्ता संरक्षण होगा। किसी कारणवश वित्तीय साक्षरता को हमेशा समावेशन से जोड़ दिया जाता है। ढांचा उपभोक्ता अधिकारों, उपभोक्ता संरक्षण और उपभोक्ता शिक्षा पर केंद्रित होना चाहिए। लोगों के पास विकल्प न होने पर उन्हें चक्रवृद्धि ब्याज दरों की गणना या फायदे सिखाने का कोई अर्थ नहीं है।
‘लीड बैंक’ का नामकरण पुराना हो चुका है। बदली हुई परिस्थितियों में राज्य-स्तरीय बैंकर समिति की संरचना पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है और वित्तीय क्षेत्र के डेटा को एक व्यापक समन्वय तंत्र के साथ एकीकृत करने की आवश्यकता है। चूंकि, आरबीआई सभी नियंत्रित संस्थाओं के लिए एक समान नियामक ढांचा बनाने का प्रयास कर रहा है इसलिए यह महत्त्वपूर्ण है कि वह वित्तीय क्षेत्र (जिसमें बैंक, गैर-वित्तीय वित्तीय संस्थान और विभिन्न उप-वर्गीकरण, भुगतान प्रणाली आदि शामिल हैं) को समावेशन की सीमा और डेटा विश्लेषण के लिए एकीकृत रूप से देखे। वर्तमान परिपत्र केवल एक छोटा सा क्रमिक परिवर्तन है जिसके पीछे बहुत सारी पुरानी व्यवस्थाएं मौजूद हैं।
सहकारी समितियों, चिट फंड, गिरवी रखने वाले और साहूकार जैसी संस्थाओं ( जो सभी राज्य विधानों द्वारा विनियमित हैं) को इस ढांचे में एकीकृत किया जाना चाहिए और उन्हें समन्वय के दायरे में लाया जाना चाहिए। आरबीआई को राज्य सरकारों के साथ मिलकर राज्य स्तरीय वित्तीय क्षेत्र विकास और नियामक प्राधिकरण स्थापित करना चाहिए जिन्हें पंजीकरण अनिवार्य करने का अधिकार हो और जो केंद्रीय बैंक के समन्वय से डेटा एकत्र करें और उन्हें विनियमित करें। यह व्यवस्था शहरी सहकारी बैंकों के लिए कारगर साबित हुई है। इसे अन्य राज्य स्तरीय पहल को शामिल करने के लिए विस्तारित किया जाना चाहिए ताकि विकास एजेंडा पर समन्वय स्थापित किया जा सके।
पिछले 15 वर्षों के घटनाक्रम और परिवर्तनों को प्रासंगिक संदर्भ में रखते हुए नए संदर्भों के साथ एक उच्च-स्तरीय समिति के गठन की आवश्यकता है। छोटे-मोटे बदलाव बहुत हो चुके।
(लेखक, भारतीय प्रबंध संस्थान, बेंगलूर के लोक नीति केंद्र में प्राध्यापक हैं)