देश में पिछले दिनों कुछ परीक्षाओं के प्रश्न पत्र लीक होने पर काफी हंगामा हुआ था। इस हंगामे के बीच पूरा परीक्षा तंत्र बेहतर बनाने के कई सुझाव भी आए हैं। जिन समाधानों पर खास तौर पर ध्यान गया है उनमें ब्लॉकचेन टेक्नॉलजी लागू करने से लेकर गड़बड़ी के लिए सजा के प्रावधान अधिक सख्त करना आदि बातें शामिल हैं। इस चर्चा के लिए सरकार की क्षमता और संस्थागत ढांचे के बारे में गहरी समझ की जरूरत है न कि जल्दबाजी में पेश किए गए या कामचलाऊ समाधानों की।
हमें इस चर्चा की शुरुआत बड़े सवालों के साथ करनी चाहिए। परीक्षा प्रक्रिया में जो दिक्कतें दिख रही है उनकी वजह उच्च शिक्षा नीति में कुछ बुनियादी सवालों पर ध्यान न देना है। केंद्रीकृत नामांकन के लिए केंद्रीकृत मूल्यांकन की आवश्यकता होती है। आधुनिक अर्थव्यवस्था और समाज में स्वायत्त विश्वविद्यालय अपने छात्रों का चयन स्वयं करते हैं। एक ही राष्ट्रीय परीक्षा एक जैसी व्यवस्था के आधार पर काम करती है जिससे संस्थानों की विविधता का ख्याल नहीं रह जाता है।
इसके अलावा, उच्च शिक्षा की उपलब्धता नियामकीय रुकावटों की वजह से सीमित है जिससे नए लोगों के लिए विश्वविद्यालय शुरू करना मुश्किल हो जाता है। यह बनावटी कमी प्रवेश प्रकिया का महत्त्व बढ़ा देती है जिससे गड़बड़ी होने की आशंका भी बढ़ जाती है। अगर उपलब्धता उचित स्तर तक होती तो एक ही मुख्य परीक्षा पर दबाव कम हो जाता।
अगर बहुत सारे आवेदकों में कुछ दावेदारों का चयन मकसद है तो लोक नीति में लॉटरी का इस्तेमाल एक आकर्षक तरीका है। अगर एक मानकीकृत परीक्षा जरूरी मानी जाती है तो सरकारी एजेंसी बनाना ही एकमात्र प्रशासनिक विकल्प नहीं है। शैक्षणिक परीक्षण सेवा (ईटीएस) दुनिया भर में जीआरई और सैट जैसी परीक्षाएं भरोसे के साथ आयोजित करती है।
सरकार परीक्षा तंत्र शुरू से तैयार करने की कोशिश करने के बजाय स्थापित व्यावसायिक वेंडरों से परीक्षण संबंधित सेवाएं ले सकती हैं। इन बुनियादी सवालों का समाधान जरूरी है। परीक्षण में बाद में होने वाली गड़बड़ियां असल में शुरुआती नीतिगत फैसलों का नतीजा होती हैं। फिलहाल हम इन बड़े सवालों पर बात नहीं करेंगे।
अगर यह मान लिया जाए कि नीतिगत फैसला सरकार द्वारा आयोजित देशव्यापी परीक्षा का है तो इसके आयोजन में सरकार की क्षमता एक समस्या बन कर सामने आती है। बड़े पैमाने पर सुरक्षित लॉजिस्टिक परीक्षण परिचालन के लिए बेहतरीन प्रबंधन क्षमता की जरूरत होती है। राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) में इस क्षमता की कमी है। लोक प्रशासन सिद्धांत इस कमी को समझने के लिए एक आधार देती है।
संस्थागत ढांचा के नजरिये से एनटीए का विश्लेषण करने पर इसमें संरचनात्मक कमियां दिखाई देती हैं। एनटीएकी स्थापना वर्ष 2018 में हुई थी। इसे किसी कानून के तहत नहीं बल्कि सोसायटी पंजीयन अधिनियम, 1860 के तहत एक सोसायटी के तौर पर तैयार किया गया था। इसका कामकाज एक संचालन इकाई देखती है जिसके अध्यक्ष संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के पूर्व अध्यक्ष होते हैं। भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) का एक अधिकारी महानिदेशक और सदस्य सचिव के तौर पर काम करता है, साथ ही पदेन अंशकालिक निदेशक भी होते हैं।
इस ढांचे में कामकाज की गहराई की कमी है। एजेंसी ने अब तक 270 से अधिक प्रतियोगिता परीक्षाएं आयोजित की हैं और 6.6 करोड़ से अधिक उम्मीदवारों का पंजीयन किया है। यह एजेंसी महज 39 स्थायी पदों की स्वीकृत संख्या के साथ इतने बड़े लॉजिस्टिक कार्य को संभालने की कोशिश करती है। ये सभी पद प्रतिनियुक्ति के जरिये भरे जाते हैं।
अभी इनमें से 24 स्थायी पदों पर ही लोग काम कर रहे हैं। कामकाज का बोझ संभालने के लिए एनटीए अस्थायी कर्मचारियों पर निर्भर है। इसमें 73 अनुबंध वाले कर्मचारी (जिनमें सलाहकार भी शामिल हैं) हैं और 124 बाहरी लोगों (जो आंकड़ों का विश्लेषण और प्रशासनिक सहायता का काम करते हैं) को काम पर रखा है।
इस तरह एजेंसी 197 अस्थायी कर्मचारियों के साथ चलती है जिन्हें प्रतिनियुक्ति पर आए 24 सरकारी अधिकारियों की मुख्य टीम संभालती है। अस्थायी और बाहर के लोगों पर बहुत अधिक निर्भरता इसके ढांचे की एक कमी है।
संगठन के कानूनी स्वरूप का असर इसके कामकाज और नियंत्रण पर पड़ता है। एक सोसाइटी बिना उस कानूनी ढांचे के काम करती है जो आम नियामकीय संस्थाओं की पहचान होती है। कानूनी निकायों के स्थापना संबंधी कानूनों में ही आंतरिक वित्तीय नियंत्रण और बाहरी जवाबदेही के नियम शामिल होते हैं। एनटीए में इस तरह के ढांचे का अभाव है।
चूंकि, यह कोई कानूनी संस्था नहीं है इसलिए यह संसद की नियमित जांच-पड़ताल की जद में नहीं आती है। ऐसा कोई कानूनी नियम नहीं है जिसके तहत एनटीए की सालाना प्रशासनिक और वित्तीय रिपोर्ट संसद में पेश की जाएं और उन पर बहस हो। इसके खातों की जांच अनिवार्य रूप से भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) द्वारा उस तरह से नहीं की जाती जैसे किसी सरकारी विभाग या कानूनी संस्था के खातों की होती है।
इस तरह की जवाबदेह प्रणाली की कमी से ढांचागत कमियां जैसे कर्मचारियों की कमी और कामकाज से जुड़ी कमजोरियां औपचारिक संसदीय जांच से छिपी रहती हैं। जब तक कोई बड़ा कांड न हो जाए तक तक किसी का ध्यान नहीं जाता है।
विकसित अर्थव्यवस्थाएं सार्वजनिक एजेंसियों के गठन के लिए व्यवस्थित नियमों का पालन करती हैं। ब्रिटेन गैर-विभागीय सार्वजनिक निकायों (एनडीपीबी) की संरचना का इस्तेमाल करता है। यह शब्द वर्ष 1980 में सर लियो प्लियात्जकी की एक रिपोर्ट के बाद गढ़ा गया था। एनडीपीबी राष्ट्रीय शासन प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है मगर मंत्रियों से स्वतंत्र होकर कार्य करता है।
ब्रिटेन में मंत्रिमंडल किसी नए एनडीपीबी की स्थापना की अनुमति तभी देता है जब यह किसी विशिष्ट कार्य को निष्पादित करने का सबसे लागत प्रभावी साधन माना जाता है। एनडीपीबी और उसके प्रायोजक विभाग के बीच संबंध इस प्रकार परिभाषित किया जाता है कि यह प्रतिनिधिमंडल का समर्थन करे और साथ ही उत्तरदायी मंत्री को वित्तीय औचित्य और जोखिम प्रबंधन का आश्वासन दे। निकायों की नियमित रूप से समीक्षा की जाती है ताकि यह सत्यापित किया जा सके कि उनके कार्य अभी भी जरूरी हैं।
समय के साथ ब्रिटेन में सार्वजनिक निकायों का एक वर्गीकरण उभरा है जो उन्हें कार्यकारी एनडीपीबी, सलाहकार एनडीपीबी, पंचाट एनडीपीबी, सार्वजनिक निगम आदि के रूप में वर्गीकृत करता है। यह वर्गीकरण जवाबदेही, वित्त पोषण और रिपोर्टिंग व्यवस्था निर्धारित करता है। कार्यकारी एनडीपीबी में नियुक्तियां सख्त नियमों द्वारा नियंत्रित होती हैं।
उन्हें समर्पित कर्मचारी नियुक्त करने और अपने आवंटित बजट का प्रबंधन करने का अधिकार है। इससे किसी काम को कुशलतापूर्वक पूरा करने के लिए ज़रूरी स्थायी संस्थागत स्मृति और क्षमता बनती है।। ब्रिटेन की कानूनी और संवैधानिक व्यवस्था में ऊपर वर्णित नियंत्रण और संतुलन के लिए वैधानिक स्थिति की आवश्यकता नहीं है।
भारत में सार्वजनिक सेवाओं के प्रशासन के लिए आपूर्ति निकायों के निर्माण हेतु एक मानकीकृत, वैधानिक ढांचे की आवश्यकता है। संवेदनशील कार्यों के लिए स्थापित एजेंसियों को बाहर से सेवाएं लेने और प्रतिनियुक्ति पर रखे गए अधिकारियों पर निर्भर होकर शिथिल रूप से प्रशासित संस्थाओं के तौर पर नहीं रखा जा सकता है।
उन्हें वैधानिक समर्थन, एक स्थायी और विशिष्ट कैडर, आंतरिक नियंत्रण, सीएजी लेखापरीक्षा और संसद के प्रति प्रत्यक्ष जवाबदेही की आवश्यकता है। त्रुटिहीन सार्वजनिक सेवा आपूर्ति त्रुटिहीन संस्थागत संरचना का परिणाम होती है।
एनटीए की कठिनाइयां कोई अकेला ऐसा वाकया नहीं हैं। भारत में सैकड़ों संगठन इसी तरह की संस्थागत कमियों के साथ काम कर रहे हैं। नियंत्रण और संतुलन की व्यवस्था पर आधारित नए सार्वजनिक प्रबंधन का बौद्धिक उपकरण अक्सर अनुपस्थित रहता है।
प्रशासनिक ज्ञान में इन कमियों के कारण राज्य का तंत्र एक विफलता से दूसरी विफलता की ओर अग्रसर होता है। हालांकि तात्कालिक ध्यान परीक्षण एजेंसी पर केंद्रित है मगर लोक प्रशासनिक ढांचे में भी इसी तरह की कमजोरियां मौजूद हैं। राज्य संगठनों और उनके नियंत्रण एवं संतुलन की समझ सहित एक उन्नत ज्ञान भंडार की आवश्यकता है ताकि सरकारी कार्य क्षमता बढ़ाई जा सके।
(लेखक आइजक सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी में मानद वरिष्ठ फेलो और पूर्व अधिकारी हैं)