केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने 2027-28 के बजट की तैयारी के लिए विभिन्न मंत्रालयों के साथ परामर्श की प्रक्रिया के तहत एक अत्यंत आवश्यक पहल शुरू की है। वित्त मंत्रालय ने सभी केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों से कहा है कि वे 2026-27 के संशोधित आंकड़ों और 2027-28 के लिए प्रस्तावित बजट आंकड़ों के यथार्थवादी अनुमान प्रस्तुत करें। इस समाचार पत्र की एक खबर के अनुसार, इस निर्देश का उद्देश्य साल के मध्य में बार-बार होने वाले पुनः आवंटन या नियोजन की आवश्यकता को समाप्त करना है जो या तो कम खर्च के कारण होता है या फिर अधिक खर्च के कारण।
औपचारिक बजट पूर्व परामर्श मध्य अक्टूबर में शुरू होने से लगभग एक महीने पहले ही केंद्रीय वित्त मंत्रालय यह सुनिश्चित करने के लिए तत्पर दिखाई देता है कि हाल के वर्षों में सरकार की कई प्रमुख योजनाओं में देखी गई कम खर्च की पुनरावृत्ति न हो। वास्तव में सरकार की 2025-26 की व्यय योजना के साथ जो हुआ वह कई मायनों में चिंताजनक था।
बेशक, सरकार ने 2025-26 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4.4 फीसदी के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को पूरा कर लिया जबकि बजट अनुमान की तुलना में शुद्ध कर संग्रह में 7.5 फीसदी की गिरावट आई थी। लेकिन घाटे का लक्ष्य व्यय में तीव्र कमी के माध्यम से पूरा किया गया जिसमें सरकार का राजस्व व्यय 2.7 फीसदी घटा और पूंजीगत व्यय बजट अनुमान की तुलना में 4.6 फीसदी कम रहा। सरकार की मदद के लिए जो कारक सामने आया वह था गैर-कर राजस्व में 9.6 फीसदी की वृद्धि जो मुख्यतः भारतीय रिजर्व बैंक और सरकारी बैंकों से मिले अधिक लाभांश के कारण हुई।
2025-26 की शुरुआत में आवंटित धनराशि का बड़ा हिस्सा जिन योजनाओं में खर्च नहीं हो पाया उन पर गहराई से नजर डालना उचित होगा। रक्षा, रेलवे और सड़कों जैसे कुछ क्षेत्रों को छोड़कर, सरकार स्वास्थ्य अधोसंरचना, शहरी और ग्रामीण आवास, सिंचाई, नदियों का परस्पर जोड़, जल मिशन, ग्रामीण सड़कें, ग्रामीण आजीविका कार्यक्रम, परमाणु ऊर्जा परियोजनाएं, दूरसंचार अधोसंरचना, आर्टिफिशल इंटेलिजेंस मिशन, सेमीकंडक्टर विकास परियोजना, उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजनाएं, निवेश और अधोसंरचना कोष, अनुसंधान, विकास और नवाचार योजना तथा सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए आपातकालीन ऋण लाइनों जैसी कई योजनाओं में आवंटित धन का 25 से 100 फीसदी तक खर्च करने में असमर्थ रही।
कई महत्त्वपूर्ण योजनाओं के लिए आवंटित संसाधनों का कम खर्च चिंता का विषय है। इस समस्या का यदि समाधान नहीं किया गया तो यह राजकोषीय मजबूती से होने वाले बड़े लाभों को निष्प्रभावी कर सकता है।
पहला, कम खर्च की स्थिति में यह संदेह करना उचित है कि जिन योजनाओं के लिए सरकार ने अपने सीमित संसाधन आवंटित किए थे वे सही ढंग से डिज़ाइन की गई थीं या नहीं।
दूसरा, इससे जुड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या सरकार ने इन योजनाओं के लिए धन आवंटित करते समय सही प्राथमिकता दी थी या दिशा ग़लत थी।
तीसरा, भले ही मान लिया जाए कि योजनाएं ठीक से डिजाइन की गई थीं और उन्हें आवंटित संसाधनों की आवश्यकता थी लेकिन संभव है कि संबंधित मंत्रालय या एजेंसी की अवशोषण क्षमता कमजोर रही हो।
अवशोषण क्षमता का अभाव यह भी दर्शा सकता है कि मंत्रालय या एजेंसी ने उन संसाधनों को खर्च करने के लिए ऐसी त्रुटिरहित प्रक्रियाएं स्थापित नहीं की थीं, जिनसे सरकार की शीर्ष अंकेक्षण और जांच एजेंसियों की नजर में संदेह न पैदा हो। अलग-अलग योजनाओं के लिए आवंटित पैसे का पूरा इस्तेमाल न हो पाना एक और चिंताजनक पहलू सामने लाता है: राज्यों की अपने लिए तय पैसे को खर्च करने की क्षमता, या उनकी इच्छाशक्ति।
दिसंबर 2025 के अंत तक राज्यों के पास 53 योजनाओं के अंतर्गत लगभग 69,000 करोड़ रुपये अनुपयोगी पड़े थे जिनमें से प्रत्येक का वार्षिक बजट आवंटन 500 करोड़ रुपये से अधिक था। ऐसी योजनाओं का कुल प्रावधान 5 लाख करोड़ रुपये से अधिक था। राज्यों द्वारा कम उपयोग के परिणामस्वरूप 2025-26 के संशोधित अनुमानों में इन योजनाओं का प्रावधान 25 फीसदी से अधिक घटाकर 3.76 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया।
वर्ष 2024-25 में भी राज्यों द्वारा कम खर्च की समस्या काफी स्पष्ट थी। 52 योजनाओं (प्रत्येक का वार्षिक आवंटन 500 करोड़ रुपये से अधिक) के लिए 2024-25 के बजट में 4.94 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान था लेकिन संशोधित अनुमानों में इसे 22 फीसदी से अधिक घटाकर 3.82 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया। इसका मुख्य कारण यह था कि दिसंबर 2024 के अंत तक अनुमानित 1.6 लाख करोड़ रुपये राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पास अनुपयोगी पड़े थे।
राज्यों द्वारा इनका उपयोग न करने और परिणामस्वरूप वर्ष के संशोधित अनुमानों में बजट आवंटन घटा दिए जाने से यह प्रतीत होता है कि यदि क्षेत्रों की विशिष्ट आवश्यकताओं का सही आकलन किया गया होता तो ये संसाधन अन्य अधिक जरूरतमंद क्षेत्रों को लाभ पहुंचाने के लिए आवंटित किए जा सकते थे।
2026-27 के पहले चार महीनों में केंद्र सरकार का कुल व्यय लगभग 13 फीसदी बढ़कर 17.62 लाख करोड़ रुपये हो गया, जबकि 2025-26 की इसी अवधि में यह कम था। पूरे वर्ष के लिए कुल व्यय में वृद्धि का बजट अनुमान 8 से 9 फीसदी था। स्पष्ट है कि शेष महीनों में व्यय को अधिक सावधानीपूर्वक प्रबंधित करना होगा।
यह विचलन केवल इसलिए नहीं हुआ कि सरकार ने इस अवधि में पूंजीगत व्यय को 30 फीसदी बढ़ाकर 4.5 लाख रुपये करोड़ कर दिया। ध्यान रहे कि सरकार का पूंजीगत व्यय उसके कुल व्यय का केवल लगभग 23 फीसदी है और इस तरह का खर्च बजट स्तर से अधिक होना चिंता का कारण नहीं होना चाहिए।
व्यय में इस विचलन का अधिक चिंताजनक कारण राजस्व व्यय भी नहीं है जो अप्रैल-जुलाई 2026-27 में केवल 8 फीसदी बढ़कर13.11 लाख करोड़ रुपये हुआ।
असली कारण सरकार की उर्वरक, खाद्य और पेट्रोलियम पर दी जाने वाली सब्सिडी है जो 2026-27 के बजट अनुमान के अनुसार 4.1 लाख करोड़ रुपये थी और 2025-26 में खर्च की गई राशि से कम होने की उम्मीद थी। लेकिन घटने के बजाय चालू वित्त वर्ष के पहले चार महीनों में प्रमुख सब्सिडी 35 फीसदी बढ़कर 1.53 लाख करोड़ रुपये हो गई। ये प्रमुख सब्सिडी कुल राजस्व व्यय का लगभग 10 फीसदी हैं। यदि सब्सिडी में इतना बड़ा विचलन न होता तो राजस्व व्यय की वृद्धि कहीं अधिक नियंत्रित रहती।
राहत की बात यह है कि सरकार का शुद्ध कर राजस्व पूरे वर्ष के लिए बजट लक्ष्य 9 फीसदी के मुकाबले 27 फीसदी से अधिक की दर से बढ़कर 8.4 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। गैर-कर राजस्व ने भी मदद की है और वह लगभग 5 फीसदी बढ़कर 4.2 लाख करोड़ रुपये हो गया जबकि बजट में कोई वृद्धि का अनुमान नहीं था। इस प्रकार यदि शेष महीनों में राजस्व की यह स्वस्थ प्रवृत्ति बनी रहती है, तो चालू वर्ष के अंत तक राजकोषीय घाटे का लक्ष्य अभी भी पूरा किया जा सकता है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि केंद्रीय वित्त मंत्रालय इस बारे में निश्चिंत हो जाए कि विभिन्न मंत्रालय और राज्य इस वर्ष अपनी योजनाओं के लिए आवंटित धन को कैसे खर्च करने की योजना बना रहे हैं। वास्तव में वित्त मंत्रालय को राज्यों के साथ भी इसी तरह की परामर्श प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए ताकि उनसे यह समझा जा सके कि उनकी विभिन्न योजनाओं के लिए वास्तविक वित्तीय आवश्यकताएं क्या हैं। योजनाओं के लिए विवेकपूर्ण धन आवंटन सुनिश्चित करना उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि राजस्व में वृद्धि करना और इस प्रकार राजकोषीय घाटे का लक्ष्य हासिल करना।