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शिक्षा पर खर्च बढ़े, राज्यों को मिले अधिक अधिकार, तभी युवा आबादी बनेगी विकास का आधार

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देश की युवा आबादी केवल तभी वृद्धि को आगे ले जा सकती है जब सरकार शिक्षा में और अधिक निवेश करे

Last Updated- September 07, 2026 | 9:34 PM IST
unemployment
प्रतीकात्मक तस्वीर

हाल ही में हुए जंतर मंतर आंदोलन ने दिखाया कि सरकार ने 30 वर्ष से कम आयु के लोगों की चिंताओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है जबकि वे देश की आबादी का करीब आधा हिस्सा हैं। इस आंदोलन का नेतृत्व जेनज़ी युवाओं द्वारा किया गया जिनमें से कई उच्च शिक्षा में थे।

साथ ही इनमें वे भी शामिल थे जो नौकरियों की तलाश में थे। इनकी संख्या करीब 36.7 करोड़ है और वे हमारी दीर्घकालिक वृद्धि के लिए प्रासंगिक पीढ़ियों का एक बड़ा हिस्सा बनाते हैं। मुद्दे की बात यह है कि सरकार उच्च शिक्षा और युवाओं के रोजगार अवसरों के लिए कितना समर्थन प्रदान करती है।

शिक्षा तक उनकी पहुंच के मामले में केवल स्कूल शिक्षा ही नहीं बल्कि विश्वविद्यालयों और समान संस्थानों में उच्चतर शिक्षा में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है। 1983 से 2023 के बीच 40 वर्षों में, 20 से 29 आयु वर्ग के लोगों में स्नातक-स्तर की शिक्षा प्राप्त करने वालों का प्रतिशत 4 फीसदी से बढ़कर 28 फीसदी हो गया।

इसका अर्थ है कि पूर्ण संख्याओं में यह वृद्धि 50 लाख से बढ़कर 6.3 करोड़ तक पहुंच गई। हमने उच्चतर शिक्षा और स्नातक रोजगार में जाति और लैंगिक असमानताओं में भी उल्लेखनीय कमी देखी है। एक मूल्यवान बदलाव यह है कि अनुसूचित जनजाति के शिक्षित लोग अब चमड़े और कचरा संग्रहण जैसे पारंपरिक व्यवसायों से दूर जा सकते हैं।

स्नातकों की पर्याप्त उपलब्धता का हमारी सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों में आई उछाल में बड़ा योगदान रहा है जिनका निर्यात फिलहाल लगभग 250 अरब डॉलर है। साथ ही वैश्विक क्षमता केंद्र (जीसीसी) में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है जिनकी संख्या अब लगभग 2,100 है और वे 20 लाख से अधिक लोगों को रोजगार दे रहे हैं।

यह भी स्वीकार किया जा सकता है कि विदेश से हमें मिलने वाले लगभग 140 अरब डॉलर के धनप्रेषण का बड़ा हिस्सा उच्चतर और उच्च शिक्षा वाले भारतीयों की संख्या में वृद्धि के कारण है। हालांकि 15 से 29 वर्ष के युवाओं में बेरोजगारी उच्च स्तर पर बनी हुई है। 15 से 25 वर्ष के बीच यह लगभग 40 फीसदी और 25 से 29 वर्ष के बीच लगभग 20 फीसदी है।

स्नातक होने के एक वर्ष के भीतर केवल कुछ ही युवा स्थिर वेतनभोगी नौकरियां प्राप्त कर पाते हैं। सबसे बड़ी चुनौती शिक्षा की गुणवत्ता है। यानी पर्याप्त योग्यता वाले ऐसे स्नातकों की कमी जो कंपनियों द्वारा भर्ती के बाद भारी प्रशिक्षण के बिना काम कर सकें और कम काबिलियत वाले स्नातकों की अधिकता। 

यहीं पर शिक्षा पर सरकारी खर्च का महत्व सामने आता है। साल 2020 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 6 फीसदी शिक्षा पर खर्च करने के लक्ष्य का समर्थन किया था। यह लक्ष्य सबसे पहले कोठारी आयोग ने 60 के दशक के मध्य में प्रस्तावित किया था और तब से नीति का हिस्सा रहा है।

हालांकि व्यवहार में शिक्षा पर सरकारी खर्च का हिस्सा लंबे समय से जीडीपी के लगभग 4 फीसदी पर स्थिर बना हुआ है। राज्य सरकारें इस बजट का 80-85 फीसदी खर्च करती हैं क्योंकि वही सरकारी स्कूल और कॉलेज स्थापित और वित्तपोषित करती हैं। लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए केंद्र सरकार विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। 

बजट दस्तावेजों में उपलब्ध आंकड़ों का उपयोग करने पर यह स्पष्ट होता है कि केंद्र सरकार द्वारा शिक्षा पर खर्च का हिस्सा उल्लेखनीय रूप से घटा है ( यह 2016-17 में उसके कुल खर्च के 3.7 फीसदी से घटकर 2024-25 में 2.4 फीसदी रह गया। जीडीपी के प्रतिशत के रूप में देखें तो यह 2016-17 में 0.47 फीसदी था, जो 2024-25 में घटकर 0.33 फीसदी रह गया, जबकि केंद्र सरकार का शिक्षा खर्च जीडीपी का 1 फीसदी होना चाहिए।

शिक्षा की सामग्री सुधारने के लिए खर्च बढ़ाने में असफलता इस तथ्य में परिलक्षित होती है कि शहरी क्षेत्रों में नौवीं और बारहवीं कक्षा के लगभग आधे छात्र निजी ट्यूशन पर सालाना लगभग 10,000  रुपये खर्च करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग एक-तिहाई छात्र निजी ट्यूशन पर निर्भर हैं और सालाना लगभग 4,500 रुपये खर्च करते हैं।

सरकारी खर्च की इस कमी का एक और संकेतक है सरकारी स्कूलों में नामांकन में गिरावट और निजी स्कूलों में नामांकन में वृद्धि।

युवा हमारे जनांकिकीय लाभांश का प्रमुख हिस्सा हैं। उनकी चिंताओं की अनदेखी इस लाभांश को आपदा में बदल सकती है। सरकारों को शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और जीडीपी का 6 फीसदी शिक्षा पर खर्च करने के लक्ष्य को पूरा करने के लिए अधिक मजबूत प्रयास करने की आवश्यकता है जो पिछले 60 वर्षों से हमारी नीति का हिस्सा रहा है।

युवाओं को शिक्षा और रोजगार उपलब्ध कराना केंद्र सरकार की प्राथमिकता प्रतीत नहीं होती। इसकी नीति मुख्य रूप से कारोबारी समूहों और उद्यमियों तक पहुंचने पर केंद्रित रही है ताकि विनिर्माण वृद्धि को बढ़ावा दिया जा सके जबकि खर्च का ध्यान मुख्य रूप से बुनियादी ढांचे के विकास पर रहा है।

यही कारण है कि परिवहन पर सरकारी खर्च का हिस्सा उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। यह 2016-17 के 5.2 फीसदी से बढ़कर 2024-25 में 12 फीसदी तक जा पहुंचा। बुनियादी ढांचे का यह विकास अभी तक विनिर्माण वृद्धि को बढ़ावा नहीं दे पाया है और इसका कुछ हिस्सा व्यर्थ रहा है।

मसलन जो हवाई अड्डे बनाए गए उनका हवाई सेवाओं द्वारा बहुत कम उपयोग होता है और वे नए राजमार्ग जो अक्सर वर्तमान विकास की आवश्यकता को पूरा करने में सक्षम नहीं हैं।

विनिर्माण को बढ़ावा देना निश्चित रूप से वांछनीय है और शायद और भी आवश्यक है क्योंकि इंटरनेट-क्षेत्र सेवाओं की वृद्धि अब धीमी हो रही है और इस वर्ष तो घट भी रही है जिसका कारण एआई द्वारा उत्पन्न सूचना प्रौद्योगिकी में बड़े बदलाव हैं।

विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए एक महत्त्वपूर्ण कदम स्नातकों के ज्ञान और कौशल की गुणवत्ता में सुधार करना है। यही कारण है कि प्राथमिक से लेकर उच्चस्तर स्तर तक शिक्षा पर अधिक खर्च करना उद्योग की वृद्धि को तेज करने के लिए उतना ही आवश्यक है जितना कि बुनियादी ढांचे में भारी निवेश करना जो वर्तमान में सरकार की रणनीति का केंद्र है।

स्नातकों के रोजगार अवसरों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए एक ऐसी विनिर्माण नीति की भी आवश्यकता है जो श्रम-प्रधान विनिर्माण गतिविधियों को बढ़ावा दे जिनमें से अधिकांश मध्यम और छोटे उद्यमों से आएंगी।

उत्तरी भारत के राज्यों में कार्यबल में सबसे अधिक वृद्धि हो रही है। उन्हें शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने तथा उद्योग और अन्य गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए गंभीर प्रयास करने होंगे ताकि उच्च विद्यालय और उच्चतर स्नातकों को सम्मानजनक नौकरियां मिल सकें। लेकिन अन्य राज्यों को भी शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को मजबूत करना होगा।

शिक्षा के मामले में राज्यों और केंद्र के बीच महत्त्वपूर्ण सहयोग आवश्यक होगा। शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च में राज्यों का 80-85 फीसदी हिस्सा है जबकि केंद्र शिक्षा सुधार के मानक और लक्ष्यों को तय करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

यदि यह प्रक्रिया केंद्र द्वारा थोपने जैसी बन जाती है तो यह सफल नहीं होगी। हमें मानकों के विकेंद्रीकरण और प्रवेश कार्यक्रमों के प्रबंधन को राज्यों के हाथों में देना चाहिए, क्योंकि राज्यों में शिक्षा की गुणवत्ता, उच्च विद्यालय और उच्चतर स्नातकों की उपलब्धता तथा सम्मानजनक रोजगार की उपलब्धता में काफी भिन्नता है।

हमें एक संगठित व्यवस्था की आवश्यकता है जो राज्यों और केंद्र को मिलाकर काम करे, ठीक उसी तरह जैसे माल एवं सेवा कर (जीएसटी) के लिए व्यवस्था है। यह राज्यों और केंद्र के लिए एक सुसंगत नीति और खर्च का ढांचा तय करेगी।

हमारे देश में शिक्षित युवाओं की बढ़ती संख्या तीव्र विकास का आधार बन सकती है। इसलिए सरकार की विकास नीति को शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और उच्च माध्यमिक विद्यालय व उच्चतर स्नातकों के लिए बेहतर रोजगार अवसर पैदा करने पर कहीं अधिक ध्यान देना चाहिए। लोकतंत्र में केंद्र और राज्य सरकारों का प्राथमिक लक्ष्य सभी नागरिकों के जीवन और उनकी आशाओं पर सकारात्मक प्रभाव डालने का होना चाहिए।

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First Published - September 7, 2026 | 9:34 PM IST

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