भारतीय शेयर बाजार में क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) को लेकर SEBI के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई बड़े बाजारों में CAS लागू होने के शुरुआती समय में लिक्विडिटी यानी शेयरों की खरीद-बिक्री को लेकर परेशानी आई थी। हालांकि, समय के साथ यह स्थिति बेहतर हुई। भारत में भी 3 अगस्त से CAS लागू हो चुका है और SEBI अब इसमें कुछ बदलाव करने पर विचार कर रहा है।
ग्लोबल फिनटेक फेस्ट (GFF) में पांडे ने कहा कि CAS को लेकर बाजार के कुछ हिस्सों से चिंता सामने आई है, लेकिन इस व्यवस्था को खत्म नहीं किया जाएगा। SEBI जल्द ही इस पर एक कंसल्टेशन पेपर जारी करेगा। इसमें डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स के सेटलमेंट प्राइस तय करने के मौजूदा तरीके में संभावित बदलावों को लेकर सुझाव मांगे जाएंगे।
पांडे के मुताबिक, CAS को लागू करने की प्रक्रिया तकनीकी तौर पर ठीक रही है। उन्होंने बताया कि कई बाजार प्रतिभागियों ने इसके लागू होने की तारीफ की है। खास तौर पर MSCI रीबैलेंसिंग जैसी गतिविधियां भी बिना किसी बड़ी तकनीकी दिक्कत के पूरी हुईं।
हालांकि, बाजार के एक हिस्से पर इसका असर पड़ा है। इसकी वजह यह है कि मौजूदा व्यवस्था में डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स की सेटलमेंट कीमत क्लोजिंग ऑक्शन से तय होने वाली कीमत पर निर्भर करती है।
पांडे ने कहा कि अमेरिका, जापान और हांगकांग समेत कई देशों में CAS लागू होने के शुरुआती दौर में लिक्विडिटी को लेकर परेशानी आई थी। लेकिन समय के साथ बाजार में इस व्यवस्था के तहत कारोबार बढ़ा और लिक्विडिटी भी बेहतर होती गई।
अब सवाल यह है कि क्या भारत में भी लिक्विडिटी के अपने आप बेहतर होने का इंतजार किया जाए या तब तक बाजार की इस परेशानी को दूर करने के लिए कोई अस्थायी रास्ता निकाला जाए।
SEBI ने पिछले सप्ताह बताया था कि डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स की सेटलमेंट कीमत तय करने के मौजूदा तरीके में बदलाव को लेकर जल्द ही कंसल्टेशन पेपर जारी किया जाएगा। बाजार से मिले फीडबैक के आधार पर इन संभावित बदलावों का प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है।
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दुनिया के अलग-अलग बाजारों में CAS का अनुभव एक जैसा नहीं रहा है। हांगकांग ने 2008 में क्लोजिंग ऑक्शन शुरू किया था, लेकिन दिन के कारोबार के आखिर में कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला। इसके बाद 2009 में वहां इसे बंद कर दिया गया। हालांकि, 2016 में हांगकांग ने CAS को दोबारा लागू किया। इस बार इसमें प्राइस लिमिट समेत कई दूसरे बदलाव भी किए गए।
भारत में भी मार्केट एक्सपर्ट और ब्रोकरेज कंपनियां CAS में कुछ बदलाव की उम्मीद कर रही हैं। इनमें ऑक्शन की प्राइस बैंड को और सख्त करना, डेरिवेटिव कारोबार का समय बढ़ाना या इसे दूसरे सेशन के साथ कुछ समय के लिए ओवरलैप करना शामिल है। इसके अलावा, इंडेक्स डेरिवेटिव्स का सेटलमेंट वॉल्यूम-वेटेड एवरेज प्राइस के आधार पर करने का विकल्प भी सुझाया जा रहा है।
GFF में एक पैनल चर्चा के दौरान पांडे ने SEBI की निगरानी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस्तेमाल के बारे में भी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि AI की मदद से रेगुलेटर बाजार में मौजूद जोखिमों को पहले ही पहचान सकता है। हालांकि, नियमों से जुड़े अंतिम फैसले AI के भरोसे नहीं छोड़े जा सकते।
पांडे के मुताबिक, AI की मदद से SEBI सिर्फ तय समय पर होने वाली निगरानी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ज्यादा सक्रिय तरीके से बाजार पर नजर रख सकेगा। इससे निगरानी का काम ऑन-साइट की जगह ज्यादा ऑफ-साइट हो सकता है और इसे तय अंतराल के बजाय लगभग रियल टाइम में किया जा सकेगा।
SEBI पहले से सुदर्शन, R(AI)DAR और साइबरसिक्योरिटी ऑडिट कंप्लायंस पोर्टल (सी-सैक) जैसे AI और टेक्नोलॉजी आधारित टूल्स का इस्तेमाल कर रहा है। इनकी मदद से सोशल मीडिया और बाजार में काम करने वाले मध्यस्थों के विज्ञापनों पर नजर रखी जा रही है। साथ ही, साइबर सिक्योरिटी से जुड़े नियंत्रणों का भी विश्लेषण किया जा रहा है।
पांडे ने कहा कि AI के इस्तेमाल के साथ मजबूत सुरक्षा इंतजाम भी जरूरी हैं। खासकर एजेंटिक AI के लिए यह साफ तय होना चाहिए कि वह क्या कर सकता है और उसकी सीमाएं क्या हैं।
उन्होंने कहा कि एक ही तरह के AI मॉडल या क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर पर बहुत ज्यादा निर्भरता अपने आप में बड़ा सिस्टमेटिक जोखिम बन सकती है। ऐसे में AI की मदद से पुराने जोखिमों को पहचानने के साथ यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि इससे कोई नया सिस्टमेटिक जोखिम पैदा न हो।