सुबह के 11:00 बज रहे हैं। तारीख कौन सी थी इसे दरकिनार करते हुए सीधे उस जगह पहुंचते हैं जहां सार्वजनिक क्षेत्र के एक बैंक (पीएसबी) का निदेशक मंडल कक्ष (बोर्डरूम) है। महीने के इस दिन बोर्ड सचिवालय सुबह 7 बजे से काम शुरू कर देता है। पूर्वाह्न 11:02 बजे निदेशक अंदर आते हैं। बैंक के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी के अलावा पूर्णकालिक निदेशक (दो कार्यकारी निदेशक), सरकार द्वारा नामित निदेशक, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा नामित निदेशक, चार्टर्ड अकाउंटेंट निदेशक और कुछ अन्य लोगों की मौजूदगी से बोर्ड रूम भारी भरकम हो जाता है।
एक स्वतंत्र निदेशक दूसरे शहर से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये जुड़े हैं। बोर्ड सचिव उनसे कहते हैं,‘महोदय, कृपया पुष्टि करें कि आप अकेले हैं और लाइन सुरक्षित है।’ वह सिर हिला कर इसकी पुष्टि करते हैं। फिर 11:05 बजे चेयरमैन कंपनी सचिव की ओर मुखातिब होते हुए कहते हैं कि अगर सभी मौजूद हैं तो बैठक शुरू की जा सकती है। इसके बाद तत्काल पिछली बोर्ड बैठक की गूढ़ या मुख्य बातों पर चर्चा शुरू हो जाती है। 11:06 बजे आइटम 1 पेश होता है, पिछली बोर्ड मीटिंग के मिनट्स की पुष्टि। प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित मिनट्स स्क्रीन पर दिखाई देते हैं। इस रिपोर्ट पर कोई टीका टिप्पणी नहीं हुई और अध्यक्ष ने इसे पढ़ा हुआ मान लिया।
यह कवायद महज 90 सेकंड में समाप्त हो जाती है। फिर स्क्रीन पर एक दूसरी रिपोर्ट दिखनी शुरू हो जाती है। इसके अनुसार बोर्ड के 23 निर्देशों में 19 का अनुपालन किया गया और तीन पर काम चल रहा है। कोर बैंकिंग माइग्रेशन से संबंधित एक निर्देश में देरी हुई है। एक कार्यकारी निदेशक दो मिनट में देरी के कारणों की व्याख्या करते हैं और एक नई समय सीमा निर्धारित करते हैं।
संबंधित विभागों के प्रमुख, मुख्य जोखिम अधिकारी (सीआरओ) के साथ मिलकर प्रत्येक विषय पर तीन स्लाइडों के माध्यम से बैठक का संचालन करते हैं। ज्यादा सवाल नहीं पूछे जाते क्योंकि इन्हें पहले ही बोर्ड की जोखिम प्रबंधन समिति और लेखा परीक्षा समिति तथा बैंक की विभिन्न स्तरों की संबंधित समितियों द्वारा अनुमोदित किया जा चुका है।
इसी तरह, कई विषयों पर बेहद संक्षिप्त चर्चा होती है। दोपहर से ठीक पहले गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) की स्थिति, साइबर घटनाएं, मानव संसाधन, सहायक कंपनियां आदि मसलों पर भी चर्चा होती है। इसी बीच, दो निदेशक अपनी घड़ियां देखते हैं क्योंकि दोपहर के भोजन के बाद बैंक के बाहर एक और बैठक निर्धारित है। 2 बजने के साथ ही मध्याह्न भोजन का समय हो जाता है। सभी को भोजन कक्ष में एकत्र होने के लिए कहा जाता है।
यह तो हुई बैठक और उसमें होने वाले तामझाम, मगर यह भी समझना जरूरी है कि आखिर निदेशक मंडल की ऐसी बैठकों के क्या मुख्य निष्कर्ष निकलते हैं? चूंकि, नीतियों की आरबीआई द्वारा निर्धारित और बोर्ड समितियों द्वारा पहले ही समीक्षा हो जाती है इसलिए समय केवल औपचारिकताओं को पूरा करने में व्यतीत होता है, रणनीति पर चर्चा नहीं होती। कोई नीति क्या कहती है और बैंक शाखाएं उनका क्रियान्वयन कैसे करती हैं उसका विश्लेषण बोर्ड मीटिंग में शायद ही कभी किया जाता है।
अंततः क्या महीने में एक बार तीन घंटे की (कभी-कभी महीने में दो बार या छह सप्ताह में) होने वाली ऐसी बैठकें खरबों रुपये के बहीखाते की निगरानी के लिए पर्याप्त हैं? आरबीआई की अप्रैल की मौद्रिक नीति में कारोबार करने में सुगमता को बढ़ावा देने के लिए तीन उपाय प्रस्तावित किए गए हैं। इनमें से पहला है बैंक बोर्ड के समय का बेहतर इस्तेमाल। यह प्रक्रिया सुगम बनाने के लिए सभी मौजूदा निर्देशों की व्यापक समीक्षा के बाद आरबीआई ने बैंक बोर्ड के ध्यान में आने वाले मामलों को संशोधित और तर्कसंगत बनाने का प्रस्ताव दिया है।
इससे पहले आरबीआई ने पिछले वर्ष नवंबर में आरबीआई (वाणिज्यिक बैंक – शासन) निर्देश 2025 जारी किए थे ताकि सार्वजनिक क्षेत्र एवं निजी क्षेत्र के और विदेशी बैंकों के लिए कंपनी संचालन को बढ़ाने वाला एक मजबूत ढांचा स्थापित किया जा सके। तत्काल प्रभाव से लागू होने वाले इन निर्देशों का उद्देश्य बैंक बोर्ड की निगरानी, जोखिम प्रबंधन और जवाबदेही को मजबूत करना है।
पिछले कई वर्षों से कई बैंक बोर्ड नीतियां निर्धारित करने, जोखिम उठाने की क्षमता परिभाषित करने और रणनीति पर सवाल उठाने के बजाय परिचालन संबंधी छोटी-छोटी बातों में उलझे रहे हैं यानी व्यक्तिगत ऋणों को मंजूरी देना, विक्रेताओं की जांच करना, अधिकारियों की पदोन्नति पर विचार करना आदि तक सीमित रह जाते हैं। इससे शासन और प्रबंधन के बीच की सीमा अस्पष्ट हो गई जिससे कई बार वरिष्ठ अधिकारियों के साथ टकराव हुआ और नीतिगत निगरानी की गुणवत्ता कम हो गई।
आरबीआई ने स्पष्ट संदेश दिया है कि निदेशकों को दिशा-निर्देश तय करने चाहिए, कड़े सवाल पूछने चाहिए और प्रबंधन को जवाबदेह बनाना चाहिए न कि रोजमर्रा के फैसलों के लिए पूर्णकालिक निदेशकों की भूमिका निभानी चाहिए।
बोर्ड को नीति, जोखिम लेने की क्षमता और भविष्य की रणनीति पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और बैंक प्रबंधन को बोर्ड द्वारा अनुमोदित ढांचे के भीतर संचालन करना चाहिए। विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में एक लगातार चुनौती बोर्ड में रिक्त पदों की संख्या और विविधता में कमी रही है। बैंक निदेशक मंडल कक्ष में महिलाओं की अधिक गहन और प्रभावशाली भागीदारी के लिए पर्याप्त गुंजाइश है। कानूनी संरचना बैंक बोर्डों में विविधता के लिए पर्याप्त अवसर प्रदान करती है। बोर्ड को सूक्ष्म प्रबंधन से ध्यान हटाकर नीति अनुपालन की निगरानी पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
संक्षिप्त मगर बेहतर ढंग से तैयार कार्य सूची रखने की रणनीति जोखिम, आचरण और संस्कृति पर गहन जुड़ाव की अनुमति देंगे जबकि नियमित अनुमोदन बोर्ड द्वारा अनुमोदित प्रतिनिधिमंडल और समिति संरचनाओं के माध्यम से किए जा सकते हैं।
दोहराव वाले या कम प्रभाव वाले मद कम कर आरबीआई चाहता है कि बोर्ड के पास नियमित आदेशों की लंबी सूची पर मुहर लगाने के बजाय अहम मुद्दों से निपटने के लिए समय और संसाधन हों। अद्यतन ढांचे के तहत बोर्ड से अपेक्षा की जाती है कि वे रणनीति, प्रमुख नीतिगत स्वीकृतियों और जोखिम उठाने की क्षमता के निर्धारण और नियमित समीक्षा पर अपना नियंत्रण बनाए रखें। उन्हें बड़े ऋणों, संबंधित पक्ष लेनदेन, सहायक कंपनियों के संचालन और समग्र आचरण एवं अनुपालन ढांचे की निगरानी का भी दायित्व सौंपा गया है।
इसका उद्देश्य बोर्ड को दरकिनार करना नहीं है बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि जहां आवश्यक हो, वहां उनकी भागीदारी प्रासंगिक होनी चाहिए।
(लेखक जन स्मॉल फाइनैंस बैंक में वरिष्ठ सलाहकार हैं)