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Editorial: फेड की मामूली दर कटौती से बाजार में उछाल, 2026 में नीति मतभेद बढ़ने के संकेत

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अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की फेडरल ओपन मार्केट कमिटी (एफओएमसी) ने बुधवार को नीतिगत ब्याज दर 25 आधार अंक घटाकर 3.5 से 3.75 फीसदी के दायरे में कर दी

Last Updated- December 11, 2025 | 9:56 PM IST
US Fed rate cut

अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की फेडरल ओपन मार्केट कमिटी (एफओएमसी) ने बुधवार को नीतिगत ब्याज दर 25 आधार अंक घटाकर 3.5 से 3.75 फीसदी के दायरे में कर दी। इस तरह, नीतिगत ब्याज दर घटाने के मौजूदा चरण में कुल 175 आधार अंक की कटौती हो चुकी है। चूंकि, दर घटाने को लेकर वित्तीय बाजारों में कुछ संदेह था, इसलिए कटौती से शेयरों की कीमतें उछल गईं। मगर बाजार का संदेह निराधार नहीं कहा जा सकता। समिति के दो सदस्यों ने कटौती के निर्णय के खिलाफ मतदान किया जबकि राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा हाल ही में नियुक्त स्टीफन मिरान नीतिगत दर 50 आधार अंक तक घटाने के पक्ष में थे।

एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि फेडरल रिजर्व के आर्थिक अनुमानों से पता चला है कि एफओएमसी के चार अन्य सदस्य भी दर कटौती के पक्ष में नहीं थे। जैसा पहले से ही अंदेशा था, ट्रंप केंद्रीय बैंक के इस निर्णय से नाराज थे और आर्थिक वृद्धि दर तेज करने के लिए ब्याज दर में बड़ी कटौती चाह रहे थे। यह बात स्पष्ट है कि अमेरिका में विभिन्न स्तरों पर नीतिगत मतभेद हैं। वर्ष 2026 में ये मतभेद जिस तरह सामने आएंगे उससे न केवल अमेरिकी बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ेगा।

अमेरिकी केंद्रीय बैंक के चेयरमैन जेरोम पॉवेल ने कहा कि नीतिगत ब्याज दर अब तटस्थ दायरे में आ चुकी है जिसका आशय है कि यह न तो विस्तारवादी है और न ही संकुचनकारी। पॉवेल का यह कथन बाजार के लिए थोड़ा भ्रमित करने वाला हो सकता है क्योंकि अनुमान बता रहे हैं कि मुद्रास्फीति दर वर्ष 2028 में ही 2 फीसदी तक आ पाएगी। यह एक कारण था जिससे इस सप्ताह एफओएमसी के कई सदस्य नीतिगत दर में कटौती के खिलाफ थे। इस तरह, फेडरल रिजर्व अब संभवतः इंतजार करेगा और इस बात पर नजर रखेगा कि अगले कुछ महीनों में आर्थिक हालात कैसे रहते हैं। पॉवेल का तर्क है कि टैरिफ यानी शुल्कों से मुद्रास्फीति बढ़ रही है।

हालांकि, उनका मानना है कि मुद्रास्फीति में यह वृद्धि अस्थायी है लेकिन इसके वास्तविक प्रभाव पर सबकी नजरें होंगी। यह बात सच है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था की चाल फिलहाल सधी लग रही है जिसमें आर्टिफिशल इंटेलिजेंस में निवेश का भी योगदान दे रहा है मगर इसमें भी कोई दो राय नहीं कि शुल्क बढ़ाने के अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं। उदाहरण के लिए चीन लगातार रिकॉर्ड व्यापार आधिक्य की स्थिति में बना हुआ है और संभवतः उसने शुल्क संबंधी व्यवधान से निपटने का एक तरीका खोज लिया है।

जो भी हो मगर यह जरूरी नहीं कि 2026 में फेडरल रिजर्व के कदम इन आंकड़ों पर निर्भर हों। पॉवेल का कार्यकाल मई में समाप्त हो रहा है और काफी कुछ अगले अध्यक्ष पर निर्भर करेगा। यह सार्वजनिक हो चुका है कि ट्रंप हमेशा मानते रहे हैं कि ब्याज दर में बड़ी कमी की आवश्यकता है और इस बात की पूरी संभावना है कि वह ऐसी ही सोच रखने वाले व्यक्ति को नियुक्त करेंगे। हालांकि, फेडरल रिजर्व के नए अध्यक्ष तत्काल ट्रंप का दृष्टिकोण आगे बढ़ाने में सक्षम नहीं हो पाएंगे। मगर केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता पर होने वाले संभावित असर और समझौतों से वित्तीय बाजार पर असर से जुड़े सवाल जरूर उठेंगे। वहां के वित्तीय बाजार में चली आ रही अस्थिरता भारत के लिए चुनौतियां बढ़ा सकती हैं।

विशेष रूप से शेयर बाजार से निवेश निकलने के कारण भारतीय मुद्रा दबाव में है। निकट भविष्य के लिए फेडरल रिजर्व ने नकदी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए ट्रेजरी बिलों की खरीद फिर से शुरू करने का निर्णय लिया है जिससे वित्तीय स्थिति बेहतर बनाने में मदद मिलनी चाहिए। हालांकि, भारत के लिहाज से अमेरिका के साथ चल रही व्यापार वार्ता काफी अहम होगी।

अल्पकालिक नीतिगत दर में कटौती की तुलना में पारस्परिक रूप से अनुकूल व्यापार सौदा भारत के बाहरी खाते के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण होगा। अमेरिका के साथ व्यापार समझौता होने से चालू और पूंजीगत खातों, दोनों में सुधार होगा। यह मान भी लिया जाए कि निकट भविष्य में एक व्यापार समझौता हो जाएगा तो बाह्य खाते के लिहाज से फेडरल रिजर्व में होने वाला बदलाव अगली बड़ी बात होगी जिस पर नजरें टिकाए रखनी होंगी।

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First Published - December 11, 2025 | 9:53 PM IST

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