कई लोगों की राय है कि भारतीय रिजर्व बैंक को अपनी मौद्रिक नीति के तौर-तरीकों में बड़े बदलाव करने की जरूरत है। उसे नीतिगत दरें तय करने का अपना तरीका तो बदलना ही चाहिए। संभव है कि उसे मुद्रास्फीति को ध्यान में रखकर कदम उठाने का तरीका ही छोड़ना पड़े। क्या इन दावों और तर्कों में कोई दम है?
असल में इन लोगों के तर्क की बुनियाद कुछ इस तरह है। जब से रिजर्व बैंक ने मुद्रास्फीति पर लक्ष्य साधना शुरू किया है तब से वास्तविक ब्याज दरें बहुत अधिक रहने लगी हैं। ऊंची ब्याज दरों से आर्थिक वृद्धि कम रह गई है। इसकी वजह रिजर्व बैंक द्वारा अपनाया जाने वाला एक गलत तरीका है। जब कीमतों में गिरावट शुरू होने वाली होती है तब भी वह पिछली मुद्रास्फीति के आधार पर ही दरें तय करता है।
ये दावे कुछ ज्यादा बड़े हैं और इन पर बारीकी से विचार करने की जरूरत है। सबसे पहले मुख्य तर्क पर विचार कर लेते हैं, जिसके हिसाब से मुद्रास्फीति को आधार बनाने की वजह से रिजर्व बैंक का झुकाव सख्त मौद्रिक नीति की तरफ हो गया है। मगर आंकड़े कुछ और ही कहते हैं।
रिजर्व बैंक ने वर्ष 2015 में मुद्रास्फीति एक निश्चित दायरे में रखने का लक्ष्य अपनाया है और तभी से वास्तविक रीपो दर (नॉमिनल रीपो दर में से समग्र उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति घटाने के बाद आई दर) औसतन 1.1 प्रतिशत ही रही है। भारत जैसी तेजी से बढ़ रहे देश के लिए यह बहुत कम है। यह उस तटस्थ दर से भी कम है, जो रिजर्व बैंक के हिसाब से 1.5 से 2 प्रतिशत है।
मुद्रास्फीति को 4 प्रतिशत मुद्रास्फीति के दायरे में रखने का लक्ष्य पाने के लिए यह बहुत कम है क्योंकि 2015 से औसत मुद्रास्फीति 5 प्रतिशत रही है। फिर ये लोग वास्तविक ब्याज दर ऊंची रहने की शिकायत क्यों कर रहे हैं? इसलिए कर रहे हैं क्योंकि कुछ समय के लिए और हाल-फिलहाल भी वास्तविक दरें वाकई 2 प्रतिशत से अधिक रही हैं। वर्ष 2025-26 में वास्तविक दर 3.5 प्रतिशत तक पहुंच गई थी।
क्या ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि रिजर्व बैंक का ढांचा केवल पिछली मुद्रास्फीति पर ध्यान देता है, जैसा दावा कुछ टिप्पणीकार करते हैं? बॉस्टन फेड की वैशाली गर्ग और मैंने आंकड़ों का अच्छी तरह से विश्लेषण किया (वी गर्ग और आर सेनगुप्ता, ‘डू एक्शन्स मैच वर्ड्स? रीअसेसिंग दि टेलर रूल इन एन इमर्जिंग-मार्केट कॉन्टेक्स्ट’, फेडरल रिजर्व ऑफ बॉस्टन वर्किंग पेपर्स, अगस्त 2026)। हमने पाया कि रिजर्व बैंक रीपो दर तय करते समय पिछली मुद्रास्फीति दर ध्यान में रखता है। मगर यह मुद्रास्फीति के बारे में अपने अनुमान को भी काफी तवज्जो देता है, जो मुद्रास्फीति को तय दायरे में रखने के लिए जरूरी है।
इसलिए समस्या ढांचे के साथ नहीं, पूर्वानुमान की सटीकता के साथ है। अगर मुद्रास्फीति का पूर्वानुमान बहुत अधिक है तो वास्तविक दर भी बहुत अधिक होगी और हाल ही में ऐसा ही हुआ। अप्रैल 2025 की मौद्रिक नीति के बाद जारी बयान में रिजर्व बैंक ने 2025-26 में 4 प्रतिशत उपभोक्ता मुद्रास्फीति रहने का अनुमान जताया था। वास्तविक मुद्रास्फीति 2 प्रतिशत रही। रिजर्व बैंक ने दिसंबर के बयान तक अपना अनुमान उस स्तर तक कम नहीं किया। अच्छी नीयत से गलत पूर्वानुमान जताने का नतीजा वही होता है, जिसकी बात कुछ लोग करते हैं – बाद में पता चलता है कि वास्तवकि दरें बहुत सख्त थीं या बहुत नरम।
रिजर्व बैंक यह बात जानता है और इसीलिए वह बहुत व्यावहारिक है। असाधारण दौर में जब मुद्रास्फीति और आर्थिक वृद्धि की दिशा काफी हद तक साफ होती है तो मौद्रिक नीति अधिक आक्रामक हो सकती है। उदाहरण के लिए जब कोविड महामारी आई तो साफ था कि मांग कम हो जाएगी। इसलिए रिजर्व बैंक को रीपो दर बहुत कम करने में कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन सामान्य दौर में रिजर्व बैंक नए पूर्वानुमानों पर प्रतिक्रिया देने मे सतर्क रहा है। उसने रीपो दर 5.25 से 7 प्रतिशत के सीमित दायरे में रखी है जो मुद्रास्फीति के दायरे (2 से 6.8 प्रतिशत) से अधिक सख्त है। यह बात समझ में आती है। जब मौद्रिक नीति कुछ हद तक भविष्य पर केंद्रित होती है और पूर्वानुमान में गलती की गुंजाइश होती है तो सावधानी बरतना समझदारी है।
कुल मिलाकर यह कहना सही नहीं है कि रिजर्व बैंक का झुकाव सख्त मौद्रिक नीति की तरफ है या दरें निर्धारित करने का उसका तरीका गलत है। केंद्रीय बैंक के लिए असली चुनौती मुद्रास्फीति के पूर्वानुमान का तरीका बेहतर बनाना है और बहस इसी दिशा में आगे बढ़नी चाहिए।
पूर्वानुमान सटीक तो कभी नहीं हो सकते क्योंकि भविष्य हमेशा अनिश्चित होता है और यह भी सच है कि दुनिया के आर्थिक हालात मे इस समय बहुत अनिश्चितता है। फिर भी रिजर्व बैंक के अनुमानों में होने वाली गलतियां कम करने के कई तरीके हैं।
सबसे पहले भारत के वृहद आर्थिक आंकड़ों में कुछ त्रुटियां हैं और यह बात सभी जानते हैं। इन त्रुटियों के कारण अक्सर अर्थव्यवस्था की वास्तविक हालत के बारे में विरोधाभासी संकेत मिलते हैं। मामला तब और भी मुश्किल हो जाता है जब राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय सकल घरेलू उत्पाद और मुद्रास्फीति के लिए कोई नई श्रृंखला लाता है मगर पुरानी श्रृंखला के बहुत कम आंकड़े जारी करता है। इससे रिजर्व बैंक के पास वे पुराने आंकड़े नहीं होते, जिनकी जरूरत नए आंकड़ों के व्यवहार को समझने वाले सटीक मॉडल तैयार करने के लिए होती है।
इसके बाद मुद्रास्फीति के लिए परिवारों की उम्मीदों का सवाल आता है। मौजूदा सर्वेक्षणों की भाषा बेहतर बनानी चाहिए क्योंकि ‘मुद्रास्फीति दर’ का मतलब समझना आसान नहीं हो सकता। मुद्रास्फीति पर कंपनियों की अपेक्षाओं के आंकड़े जुटाना भी जरूरी है। यह होने के बाद इस बात पर गहरा अनुसंधान होना चाहिए कि मुद्रास्फीति की अपेक्षाएं जन्म कैसे लेती हैं और लंबी अवधि के अनुबंधों पर वे कैसे असर डालती हैं। इसके लिए पारिश्रमिक और किराये पर भी ठोस आंकड़ों की जरूरत होगी।
जो केंद्रीय बैंक अनुमानों के आधार पर मौद्रिक नीति तय करता है, वह उतना ही भरोसेमंद होता है, जितने उसके अनुमान। असली काम इसी दिशा में करने की जरूरत है। मुद्रास्फीति सीमित दायरे में रखने के लक्ष्य से जुड़े ढांचे पर बहस करने का कोई फायदा नहीं होगा।
(लेखिका आईजीआईडीआर, मुंबई में अर्थशास्त्र की एसोसिएट प्रोफेसर हैं)