अगर देश में खेती को छोटे और सीमांत भूस्वामियों के लिए आकर्षक बनाना है तो इस क्षेत्र में आमूलचूल बदलाव लाने होंगे। ध्यान रहे कि देश के कुल कृषकों में 85 फीसदी इसी श्रेणी में आते हैं। अब तक सुधार के नाम पर अलग-अलग पैबंद लगाने की कोशिश की गई है, उसके नतीजे भी महसूस किए जा सकते हैं लेकिन कृषि क्षेत्र की संपूर्ण संभावनाओं का दोहन करना अभी बाकी है। उसके लिए मौजूदा फसलों पर केंद्रित खेती को त्यागकर ऐसी एकीकृत कृषि प्रणाली अपनानी होगी जिसमें कई तरह की फसलों के मिश्रण, पशुपालन और अन्य अनुषंगी उद्यमों की मिलीजुली व्यवस्था को अपनाना होगा। कृषि गतिविधियों का विविधतापूर्ण लेकिन अनुकूल मिश्रण करने का लाभ यह है कि एक गतिविधि के सह उत्पाद या बचेखुचे घटकों का इस्तेमाल दूसरे के लिए कच्चे माल के तौर पर किया जा सकता है। इस तरह उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम इस्तेमाल किया जा सकता है। इन संसाधनों में भूमि भी शामिल है। इसके अलावा इससे किसानों के लिए अपेक्षाकृत कम लागत पर वर्ष भर आय सुनिश्चित होती है।
पारंपरिक तौर पर किसान गाय और भैंस को खेती के लिहाज से आदर्श सहयोगी मानते रहे हैं। परंतु अब यह दायरा बहुत विस्तारित हो गया है और इसमें मुर्गी पालन, सूअर पालन, बकरी पालन, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन, रेशम कीट पालन, मशरूम की खेती, फूलों की खेती, बागवानी, कृषि वानिकी और बायो गैस उत्पादन आदि शामिल हैं। बहरहाल, इनमें से किसी भी उपक्रम का चयन सावधानीपूर्वक करना होगा। इस दौरान स्थानीय पारिस्थितिकी, स्थानीय संसाधनों और कच्चे माल, बाजार की मांग आदि का ध्यान रखना होगा। बस यह ध्यान रखना होगा कि उत्पाद एक दूसरे के अनुपूरक हों, न कि एक दूसरे के प्रतिस्पर्धी। किसानों की अधिकांश चिंताएं जिनमें अपर्याप्त और अनिश्चित आय, रोजगार की कमी या प्रच्छन्न रोजगार (मौसमी खेती के कारण), उपज का खराब होना, किफायती ढंग से काम नहीं होना आदि को ध्यान में रखते हुए व्यवस्थित कृषि रणनीति बनाई जा सकती है।
दो या अधिक उपक्रमों को एक साथ मिलाने के कई लाभ हैं। पहली बात तो यह कि इससे कुल मुनाफा बढ़ता है क्योंकि संबद्ध उत्पादों मसलन दूध, अंडे, मांस, मछली या शहद आदि को बाजार में बहुत अच्छी कीमत मिलती है। इसके अलावा इसमें पारंपरिक खेती के जोखिम भी कम रहते हैं। यदि किसी वजह से फसल खराब हो जाती है तो गैर कृषि कारोबार से होने वाली आय से किसान को मदद मिल जाती है। इतना ही नहीं इससे खेती मौसमी के बजाय एक पूर्णकालिक काम बन जाता है और किसान के पास हमेशा काम रहता है। इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ऐसा करने से साल भर बाजार में बेचने लायक उपज मिलती रहती है और आय भी अपेक्षाकृत अच्छी होती है। ध्यान देने वाली बात यह है कि इस स्थायित्व भरी और पर्यावरण के अनुकूल खेती का लाभ मिट्टी को भी मिलता है और वह अधिक उर्वर होती है। इतना ही नहीं कचरे का पुनर्चक्रण होता है और किसान परिवारों को बेहतर पोषण मिलता है। इस समय विभिन्न राज्यों में एकीकृत खेती के लिए स्थान विशेष की खूबियों पर आधारित मॉडल विकसित करने को लेकर काफी शोध एवं विकास कार्य हो रहा है। इस दौरान कृषि पर्यावास की परिस्थितियों का पूरा ध्यान रखा जाता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के कई संस्थान इस प्रयास में सहयोग और साझेदारी कर रहे हैं। इसमें उत्तर प्रदेश स्थित मोदीपुरम स्थित भारतीय कृषि व्यवस्था अनुसंधान संस्थान (आईआईएफएसआर), एकीकृत कृषि व्यवस्था पर अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना, जैविक कृषि पर अखिल भारतीय नेटवर्क कार्यक्रम तथा विभिन्न कृषि विश्वविद्यालय एवं कृषि विज्ञान केंद्र आदि शामिल हैं।
इन केंद्रों ने पहले ही 26 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए बड़े पैमाने पर एकीकृत कृषि व्यवस्था के नमूने विकसित किए हैं। स्थानीय किसान इन प्रयासों में सक्रिय रूप से साझेदार हैं और वे यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि इन कृषि मॉडल को अपनाया जाए। आईआईएफएसआर के अनुसार इस बात पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है कि किसान परिवारों और उनके पालतू पशुओं को पर्याप्त पोषण मिल सके और उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त नकदी भी वे कमा सकें।
एक अनुमान के मुताबिक नई व्यवस्था अपनाने के लिए प्रति हेक्टेयर 4,000 रुपये से 24,000 रुपये तक का व्यय आएगा। यानी औसतन 11,500 रुपये प्रति हेक्टेयर। परंतु इससे महज दो से तीन वर्ष के भीतर कृषि आय में औसतन 2.7 गुना का इजाफा होगा। देशव्यापी प्रभाव आकलन सर्वेक्षण के अनुसार एकीकृत कृषि प्रणाली को अपनाने वाले 73 फीसदी किसान इसे जारी रखना चाहते हैं। जाहिर है किसान इससे संतुष्ट हैं।
ऐसे में आश्चर्य नहीं कि विभिन्न कृषि गतिविधियों को एक दूसरे से जोड़कर एकीकृत कृषि शुरू करने का काम अब जोर पकड़ रहा है। कुछ राज्य सरकारें इस प्रणाली की उपयोगिता से संतुष्ट हैं और उन्होंने इसका आधिकारिक रूप से प्रचार-प्रसार भी शुरू कर दिया है। केरल और तमिलनाडु तथा केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर सन 2017 से ही अपने बजट में इसके लिए फंड का आवंटन कर रहे हैं। केरल ने ग्राम पंचायतों के माध्यम से इसे बढ़ावा देने के लिए ऐसे 7,000 से अधिक विशिष्ट कृषि मॉडल तैयार किए हैं। तमिलनाडु के 34 जिलों में 10,000 से अधिक किसानों ने इस नई खेती को अपनाया है। जम्मू कश्मीर में 84 विधानसभा क्षेत्रों में ऐसी नई खेती गति पकड़ चुकी है। इन इलाकों में लोग अखिल भारतीय अनुसंधान परियोजना के तैयार फॉर्मूलों के आधार पर एकीकृत कृषि को अपना रहे हैं। केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने सभी राज्यों से एकीकृत कृषि को प्रोत्साहित करने के मामले में मशविरा किया। यह काम राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन और वर्षा आधारित कृषि कार्य योजना के तहत आयोजित कार्यक्रमों के माध्यम से की जा रही है। आशा है कि विभिन्न राज्य अपने किसानों की बेहतरी के लिए इन बातों पर ध्यान देंगे।