पिछले एक दशक में भारत के ई-कॉमर्स बाजार ने पूरे देश में तेजी से अपनी मौजूदगी बढ़ाई है। यह कारोबार अब केवल महानगरों तक ही सीमित नहीं है बल्कि टियर-1 (बड़े) और टियर-2 (मझोले या तेजी से विकास होते) शहरों के ग्राहकों को भी सेवाएं उपलब्ध करा रहा है। वर्ष 2014 में इस क्षेत्र का मूल्य लगभग 14 अरब डॉलर था जो वर्ष 2024 में बढ़कर लगभग 120-130 अरब डॉलर हो गया।
मगर ई-कॉमर्स बाजार की तेज चाल के बीच कुछ चिंता भी सामने आई है। पहली बात, इतनी शानदार बढ़ोतरी के बावजूद ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म मुनाफा नहीं कमा पाए हैं जबकि उनका सकल मार्जिन दूसरे देशों की ई-कॉमर्स कंपनियों के बराबर ही है। दूसरी बात, इन प्लेटफॉर्म के कामकाज को लेकर विवाद भी हुए हैं जिनमें विदेशी निवेश के नियमों का उल्लंघन, विक्रेता के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार, बहुत अधिक छूट देना और प्रतिस्पर्द्धा से जुड़े सुरक्षा उपायों की कमी आदि शामिल हैं। तीसरी बात, गिग कर्मियों के काम करने से जुड़े हालात और उनकी सामाजिक सुरक्षा को लेकर भी चिंता उभरी है जो ई-कॉमर्स कारोबार की रीढ़ माने जाते हैं।
सेंटर फॉर सोशल ऐंड इकनॉमिक प्रोग्रेस की हाल में जारी रिपोर्ट ‘इंडिया ई-कॉमर्स रिपोर्ट 2026: इनोवेशन इन द मर्चेंडाइज स्पेस’ में भारत के मर्चेंडाइज ई-कॉमर्स क्षेत्र के विकास, इसका बाजार ढांचा, नीति से जुड़ी चुनौतियों और टिकाऊ विकास के लिए जरूरी स्थितियों का विश्लेषण किया गया है। यह रिपोर्ट नीति से जुड़ी चर्चा में एक अहम कमी की ओर भी इशारा करती है और वह है भरोसेमंद, तुलनात्मक और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारियों (डेटा) की कमी।
बाजार के आकार, प्लेटफॉर्म की गतिविधियों, रोजगार, मूल्यवर्द्धन और क्षेत्रीय पहुंच के बारे में सही जानकारी के अभाव में इस क्षेत्र के आर्थिक योगदान का सही अंदाजा लगाना या सही नीतिगत उपाय करना मुश्किल है।
भारतीय ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म 40-45 फीसदी तक सकल मार्जिन कमाते हैं (जो दुनिया के ई-कॉमर्स कंपनियों के बराबर है) मगर वे लगातार नकारात्मक शुद्ध मार्जिन दर्शाते हैं। समस्या ग्राहकों को सेवा देने पर आने वाली अधिक लागत के कारण है। प्रति उपयोगकर्ता कम औसत राजस्व और कम मूल्य वाले ऑर्डर से कमाई की क्षमता सीमित हो जाती है जबकि छोटी-मोटी खरीदारी पर लॉजिस्टिक लागत बहुत अधिक रहती है। भारतीय बाजार से जुड़ी दो बातें परिचालन लागत और बढ़ा देती हैं। कैश-ऑन-डिलिवरी (सामान मिलने पर भुगतान) कामकाजी पूंजी की जरूरत बढ़ाती है और सामान लौटाने (रिटर्न-टु-ओरिजिन) का झमेला लागत ऊपर पहुंचा देता है। कैश ऑन-डिलिवरी टियर-2 और टियर-3 शहरों में अभी भी 55-60 फीसदी ऑर्डर का हिस्सा है जबकि चीन में यह 10 फीसदी से भी कम है। साथ ही, सामान लौटाने (रिटर्न) की दर 25 से 40 फीसदी है जो 17 से 25 फीसदी के वैश्विक औसत से कहीं अधिक है।
ये चुनौतियां ग्राहकों के भरोसे से जुड़ी एक बड़ी समस्या की ओर इशारा करती हैं। कैश-ऑन-डिलिवरी पर लगातार निर्भरता और सामान रिटर्न करने की दर से पता चलता है कि कई ग्राहक गुणवत्ता और विक्रेताओं की विश्वसनीयता को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। इसे देखते हुए बेहतर गुणवत्ता आश्वासन, विक्रेताओं का सत्यापन, शिकायतों के समाधान और नकली उत्पाद के खिलाफ कार्रवाई के जरिये भरोसा जीतना कम से कम समय में सामान पहुंचाने जितना ही जरूरी हो सकता है। लॉजिस्टिक लागत कम करना इस क्षेत्र की दीर्घकालीन सफलता के लिए भी बहुत जरूरी होगा।
भारत के सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यम (एमएसएमई) के लिए भी एक मुनाफा वाला ई-कॉमर्स ढांचा मायने रखता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म ने एमएसएमई के लिए बाजार तक पहुंच बढ़ाई है और सीमा पार ई-कॉमर्स कारोबार इन मौकों को और मजबूत करेगा। चीन, ब्राजील और मेक्सिको में ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म परिवारों की बढ़ती आय, बेहतर लॉजिस्टिक, मजबूत डिजिटल ढांचा और बढ़ते सीमा पार व्यापार के साथ मुनाफे में आ गए।
अधिकतर देशों की तरह भारत के ई-कॉमर्स बाजार में भी कुछ कंपनियों का दबदबा हो गया है। यहां एमेजॉन और फ्लिपकार्ट की कुल बिक्री में 55 से 60 फीसदी हिस्सेदारी है। लेकिन अलग-अलग खंडों में छोटे और खास तरह की कंपनियों का लगातार सामने आना बताता है कि बाजार में प्रतिस्पर्द्धा की गुंजाइश बनी हुई है। नई कंपनियां अपने कारोबारी ढांचे को अलग बनाकर या खास ग्राहक समूहों को साध कर आगे बढ़ पा रही हैं।
लिहाजा, नियामकीय ध्यान बाजार की संरचना पर कम और बाजार को अधिक प्रतिस्पर्द्धी बनाने पर अधिक होना चाहिए। इसके लिए सार्वजनिक डिजिटल ढांचा (डीपीआई) मजबूत करना, मालवहन की दिक्कतों और सीमा पार अनुपालन लागत कम करना और एमएसएमई की भागीदारी को बढ़ावा देना जरूरी है। भारत की प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) नीति को लागू करना भी मुश्किल हो गया था। यह नीति मार्केटप्लेस मॉडल (खरीदार और स्वतंत्र विक्रेताओं को आपस में जोड़ने वाला डिजिटल प्लेटफॉर्म) में विदेशी निवेश की इजाजत देती थी मगर इन्वेंट्री-बेस्ड मॉडल (जिसमें कंपनी स्वयं सामान का स्टॉक रखती है) में नहीं। यह नीति लागू करना इसलिए मुश्किल हुआ था क्योंकि निजी प्राइवेट लेबल, पसंदीदा विक्रेता और कीमतों पर नियंत्रण अक्सर इन दोनों प्रारूपों के बीच के अंतर अस्पष्ट कर देते थे। लिहाजा, घरेलू स्तर पर बने सामान के निर्यात के लिए इन्वेंट्री-बेस्ड ई-कॉमर्स मॉडल में एफडीआई की अनुमति देने का सरकार का कदम स्वागत योग्य है।
इस कदम से यह माना गया है कि इन्वेंट्री-बेस्ड मॉडल लॉजिस्टिक व्यवस्था बेहतर बना सकते हैं और भारतीय विनिर्माताओं के लिए बाजार तक पहुंच बढ़ा सकते हैं। अगर निर्यात के मामले में ये फायदे दिखते हैं तो यह सवाल उठाना सही है कि क्या मार्केटप्लेस और इन्वेंट्री मॉडल के बीच फर्क करना घरेलू ई-कॉमर्स को विनियमित करने का सही आधार है। कारोबारी प्रारूप से जुड़े नियम-कायदे बनाने के बजाय नीति का ध्यान निष्पक्ष प्रतिस्पर्द्धा बनाए रखने, प्रतिस्पर्द्धा विरोधी व्यवहार रोकने और सभी बाजार भागीदारों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने पर होना चाहिए।
गिग कर्मी ई-कॉमर्स की रीढ़ बन गए हैं। डिलिवरी पार्टनर (सामान पहुंचाने वाले) और वेयरहाउस एसोसिएट (सामान संभालने एवं प्रबंधन करने वाले) मुश्किल हालात में भी सामान कुशलता से लोगों के घर तक पहुंचा देते हैं। उनके हितों को प्लेटफॉर्म की रणनीति और सरकारी नियमन दोनों में ही केंद्र में रखा जाना चाहिए।
ई-कॉमर्स में तेजी से बढ़ने की क्षमता है, खासकर टियर 2 और टियर 3 शहरों में, और यह लॉजिस्टिक, वेयरहाउसिंग और एमएसएमई आपूर्ति श्रृंखला में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित कर सकता है। असल चुनौती प्लेटफॉर्म, विक्रेता, गिग कर्मी और सरकार के हितों के बीच संतुलन साधने की है। अगर हम बुनियादी बातों यानी भरोसा, मानक माप, खुला बुनियादी ढांचा और कर्मियों के कल्याण को सही कर लें तो भारत का ई-कॉमर्स भी समावेशी होगा।
(जनक राज नई दिल्ली स्थित ‘सेंटर फॉर सोशल ऐंड इकनॉमिक प्रोग्रेस में वरिष्ठ अध्येता हैं और आशी गुप्ता सहायक अध्येता रह चुकी हैं)