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बिजली की बढ़ती मांग के बीच जरूरी हैं नियामकीय सुधार, डिस्कॉम संकट का स्थायी समाधान तलाशना होगा

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देश की सभी डिस्कॉम विनियमित संस्थाएं हैं और उनके नियामकों का गठन राज्य करते हैं। विनियमन की व्यवस्था सभी राज्यों में लगभग एक जैसी है

Last Updated- September 17, 2026 | 9:30 PM IST
power demand
प्रतीकात्मक तस्वीर

भारत में लंबे समय से बिजली की खपत उतनी ही बढ़ती रही है, जितना देश का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) बढ़ा है यानी अगर जीडीपी 1 प्रतिशत बढ़ा तो बिजली की खपत भी लगभग उतनी ही बढ़ी है। लेकिन यह तालमेल आगे जारी नहीं रहेगा क्योंकि बिजली की खपत भविष्य में आर्थिक वृद्धि से भी ज्यादा तेज बढ़ेगी।
बिजली की खपत में यह बढ़ोतरी वांछनीय है और कई क्षेत्रों में सरकारी नीतियों की सफलता का नतीजा है। लगभग हर जगह बिजली की उपलब्धता और लोगों की क्रय क्षमता में बढ़ोतरी के कारण घरों में बिजली की खपत तेजी से बढ़ी है। भारत में अब इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) का लंबा दौर शुरू हो रहा है और ऐसे कम प्रदूषणकारी, ऊर्जा की कम खपत करने वाले तथा सस्ते परिवहन विकल्प बढ़ने से बहुत लाभ होंगे।
बिजली की मांग कृषि में भी तेजी से बढ़ रही है और शीत आपूर्ति श्रृंखला यानी कोल्ड सप्लाई चेन और जलवायु में बदलाव को ज्यादा बरदाश्त करने वाला कृषि लॉजिस्टिक्स तंत्र बनने के साथ ही यह मांग केवल सिंचाई तक सीमित नहीं रह गई है। विनिर्माण क्षेत्र में भी मशीनों व तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाना और जीवाश्म ईंधन से किनारा करना उत्पादकता तथा पर्यावरण के लिहाज से जरूरी है। उसके बाद डेटा केंद्रों आदि से जुड़ी नई आवश्यकताएं हैं। इसीलिए बिजली की मांग में जबरदस्त इजाफा होने जा रहा है और 2030 तक आंकड़ा 25 तथा गीगावॉट के बीच रहने का अनुमान लगाया जा रहा है।
बाजार की ताकतें और नीतियां तेजी से विद्युतीकरण की हिमायती हैं। किंतु भारत की बिजली व्यवस्था का केंद्र हैं बिजली वितरण कंपनियां यानी डिस्कॉम और सभी जानते हैं कि कई डिस्कॉम कुछ समय से भारी घाटे में हैं। डिस्कॉम का कुल घाटा तथा कर्ज कई लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। यह स्थिति तब है जब केंद्र सरकार कई बार हस्तक्षेप कर चुकी है और उनका काफी कर्ज बट्टे खाते में डाला जा चुका है।
अगर कुछ डिस्कॉम अक्षम, घाटे में और कर्ज में फंसी होतीं तो हम उनकी तुलना बेहतर डिस्कॉम से करके पता कर सकते थे कि खामी कहां हैं। लेकिन ज्यादातर सरकारी डिस्कॉम की माली हालत खस्ता हो तो साफ तौर पर समस्या बहुत गहरी है। आखिर वह समस्या क्या हो सकती है?
देश की सभी डिस्कॉम विनियमित संस्थाएं हैं और उनके नियामकों का गठन राज्य करते हैं। विनियमन की व्यवस्था सभी राज्यों में लगभग एक जैसी है, जिसमें उपभोक्ताओं के लिए बिजली की कीमत लागत के हिसाब से तय की जाती है। इसका सीधा मतलब तो यही है कि कीमत में सभी प्रकार के खर्च वसूल लिए जाते हैं। फिर डिस्कॉम को इतना घाटा क्यों हो रहा है? क्या समस्या नियामकों में है, जो लागत और मुनाफा जोड़कर कीमत तय नहीं कर रहे? या समस्या खुद डिस्कॉम में है, जो अपने संसाधनों को अक्षमताओं में बरबाद कर देती हैं, जिसकी कीमत नियामक उन्हें नहीं वसूलने देते? कई लोगों को लगता है कि राज्य सरकारें डिस्कॉम को बिजली की कीमत नहीं बढ़ाने देतीं और इसीलिए राज्य बिजली नियामकों पर भी कीमत में वृद्धि टालने का दबाव डाला जाता है।
अध्ययनों से पता चलता है कि समस्याएं कई जगह हैं। जैसे राज्य सरकारें जनता को सब्सिडी देती हैं मगर उसकी पूरी भरपाई डिस्कॉम को नहीं करतीं, डिस्कॉम अपनी पूरी लागत नियामक को नहीं बतातीं और नियामक लागत तथा राजस्व में अतीत में आए असंतुलन की भरपाई आगे की कीमतों से नहीं करने देते। स्पष्ट है कि राज्य सरकार, डिस्कॉम और राज्य बिजली नियामक में से हरेक के साथ समस्या हैं और सबने मिलकर समस्या को इतना बड़ा कर दिया है।
लेकिन नियामक का काम कीमतें कम रखना भर नहीं होता। व्यवस्था की खामियां दूर करना और आर्थिक न्याय के सिद्धांतों को बनाए रखना भी उसी का जिम्मा होता है। बिजली नियामकों को उद्योग की आवाज भी बनना चाहिए और उद्योग की बात सरकार के सामने रखनी चाहिए। भारतीय रिजर्व बैंक बेहतरीन उदाहरण है। देश के वित्तीय क्षेत्र की वृद्धि में उसके सक्रिय प्रयासों की अहम भूमिका रही है। इसलिए भारत की बिजली क्षेत्र की असली समस्या कमजोर डिस्कॉम नहीं हैं। असली हैं राज्य बिजली नियामक और उन पर नियंत्रण रखने वाली व्यवस्था।
यह भी स्पष्ट है कि राज्य बिजली नियामकों पर राज्य सरकारें बेजा दबाव डालती हैं और वे उतने आजाद नहीं हैं, जितने होने चाहिए थे। ऐसे में उनके लिए उन राजनीतिक दबावों का सामना करना मुश्किल हो जाता है, जो तात्कालिक और सामाजिक जरूरतों के कारण राजनेताओं की ओर से आते हैं। किसी भी विनियमित व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि नियामक स्वतंत्र नहीं हो तो नियमन के फायदे नहीं मिल सकते।
यही वजह है कि राज्य स्तर पर बिजली नियमन की व्यवस्था विफल हो रही है। केंद्र सरकार डिस्कॉम की तात्कालिक आर्थिक जरूरतें पूरी करने के लिए मदद कर सकती है मगर आखिर में बुनियादी समस्या का ही समाधान करना होगा। बुनियादी समस्या है बिजली क्षेत्र में नियामकीय सुधार। इस समस्या के कई संभावित समाधान हो सकते हैं और समाधानों के लिए मददगार व्यवस्था हम कितनी अच्छी तरह तैयार करते हैं, इसी से तय होगा कि कौन सा समाधान कारगर है। कानूनों के जरिये राज्य नियामकों की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने से लेकर डिस्कॉम को कीमत तय करने की ज्यादा स्वतंत्रता देने तक कई समाधान मौजूद हैं। एक विकल्प यह भी है कि राज्य बिजली नियामक समाप्त कर केंद्रीय नियामक की ओर लौटा जाए। ऐसे सुधारों के बगैर ही निजीकरण कर देने से भी समस्या का समाधान नहीं होगा।
समाधान के दूसरे रास्ते भी मौजूद हैं और उन पर गंभीरता से काम कर लाभ उठाने की जरूरत है। एक समाधान राज्य बिजली नियामकों को राज्य सरकारों से आजादी दिलाना है। इसके लिए राज्य बिजली नियामकों हेतु पेशेवरों को चुनने और उनसे काम कराने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों के बजाय केंद्रीय नियामक को देनी होगी। लेकिन यह भी तय है कि कोई राज्य सराकर इसके लिए आसानी से तैयार नहीं होगी।
दूसरा विकल्प है कि बिजली की कीमत तय करने के मामले में डिस्कॉम को ज्यादा अधिकार दिए जाएं। इसके लिए ऐसी बारीक नियामकीय व्यवस्था चाहिए, जिसमें लागत पर नियंत्रण भी रहे और डिस्कॉम के कामकाज में लचीलापन भी बना रहे। लेकिन इसके लिए राज्य नियामकों के पास बहुत उच्च स्तर की विशेषज्ञता होना जरूरी है। तीसरा विकल्प है गुजरे दौर की तरह केंद्रीय नियामकीय व्यवस्था की ओर लौटना। लेकिन इसके लिए कठिन कानूनी सुधार करने होंगे और हो सकता है कि संविधान संशोधन की भी जरूरत पड़े।
केवल निजीकरण से समस्या हल नहीं होगी क्योंकि निजी निवेशक बिजली वितरण के क्षेत्र में पैसा तभी लगाएंगे, जब कीमत तय करने की प्रक्रिया पर उनका भी कुछ नियंत्रण हो या कम से कम उन्हें भरोसा हो कि जब तक पैसा लगा हुआ है तब तक लागत के हिसाब से कीमत तय करने का सिद्धांत भी लागू रहेगा। लेकिन भारत की न्यायिक व्यवस्था में लेटलतीफी की जो गंभीर बीमारी है, उसे देखते हुए लंबे समय के भरोसेमंद करारों के बल पर ऐसा होना नामुमकिन ही है।
लेकिन जरूरत वाकई बहुत बड़ी है। दुनिया भर में और भारत में भी अच्छी गुणवत्ता वाली किफायती बिजली के लिए भारी निवेश की जरूरत है। यह निवेश केवल बिजली उत्पादन में ही नहीं बल्कि उसके ट्रांसमिशन, वितरण, मीटरिंग, मांग-आपूर्ति के संतुलन तथा मूल्य निर्धारण समेत सभी क्षेत्रों में होना चाहिए। लेकिन अल्पकालिक राजनीतिक लक्ष्यों के हिसाब से बिजली के दाम तय करने का जो सिलसिला अभी चल रहा है वह इसमें काम नहीं करेगा। भारत की अर्थव्यवस्था को दूरदर्शी सोच के साथ काम करने की जरूरत है।
(लेखक सेंटर फॉर सोशल ऐंड इकनॉमिक प्रोग्रेस के प्रमुख हैं। लेख में उनके निजी विचार हैं)

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First Published - September 17, 2026 | 9:24 PM IST

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