वर्ष 2010 के अंत में जब यूरो-जोन संकट चरम पर था, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और यूरोपीय संघ ने आईएमएफ के पूर्व अर्थशास्त्री एंड्रियास जॉर्जियो को एथेंस में ग्रीस की नई सांख्यिकी एजेंसी, हेलेनिक सांख्यिकी प्राधिकरण (एलस्टैट) का प्रमुख नियुक्त किया। उनका कार्य सीधा-सादा प्रतीत होता था: यह पता लगाना कि ग्रीस की सार्वजनिक वित्तीय स्थिति कितनी खराब हो गई है और सही सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की गणना करना।
ग्रीस की सरकारें वर्षों से राजकोषीय आंकड़ों को गलत तरीके से प्रस्तुत करती रही थीं। वे रक्षा सहित अपने स्वयं के खर्चों के कुछ हिस्सों का हिसाब भी नहीं दे पा रही थीं। लेकिन जॉर्जियो का यह कार्य खतरनाक साबित हुआ। पदभार संभालने के कुछ ही हफ्तों के भीतर उनके ईमेल हैक हो गए। कुछ ही महीनों में उन पर राष्ट्रीय हित के साथ विश्वासघात करने का आरोप लगा। अभियोजकों ने अंततः ग्रीस के आंकड़ों को सुधारने के लिए लाए गए व्यक्ति पर आंकड़ों में हेराफेरी का आरोप लगाया। उनका कथित अपराध यह था कि उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आंकड़े सही होने चाहिए।
हाल के दिनों में भी यही देखने को मिला जब भारत ने दावा किया कि जून में समाप्त तिमाही में उसकी अर्थव्यवस्था 7.8 फीसदी बढ़ी। आलोचकों ने तुरंत इस आंकड़े पर सवाल उठाए और इस तरह भारत में जीडीपी को लेकर चल रहे तीखे विवादों का एक और दौर शुरू हो गया।
जीडीपी का आंकड़ा मात्र एक अनुमान है। सांख्यिकीविद, अन्य देशों के सांख्यिकीविदों की तरह, नमूने, सर्वेक्षण, कंपनी खाते, कर विवरण और प्रशासनिक आंकड़ों के साथ काम करते हैं। जहां जानकारी अधूरी होती है, वहां वे अनुमान लगाते हैं। जहां बाद में बेहतर जानकारी मिलती है, वहां वे अनुमानों को संशोधित करते हैं। भारत की समस्या कई समृद्ध देशों की तुलना में अधिक गंभीर है।
माल एवं सेवा कर (जीएसटी), डिजिटल भुगतान और ई-वे बिलों के कारण औपचारिक अर्थव्यवस्था का दस्तावेजीकरण तेजी से बेहतर हो रहा है। लेकिन लाखों छोटे उद्यम और श्रमिक अभी भी आंकड़ों की पहुंच से बाहर हैं।
2022-23 को आधार वर्ष मानते हुए नई भारतीय श्रृंखला एक काफी बदली हुई अर्थव्यवस्था और सूचना के नए स्रोतों को शामिल करने का प्रयास करती है। यह निश्चित रूप से अप्रचलित सांख्यिकीय मानचित्र पर अनिश्चित काल तक टिके रहने से बेहतर है। इसलिए, यह पूछना समझदारी है कि क्या अर्थव्यवस्था की अन्य गतिविधियों की तुलना में 7.8 फीसदी का आंकड़ा तर्कसंगत है। सौभाग्य से, आर्थिक कारक हर जगह संकेत छोड़ते हैं। करों से शुरुआत करें।
मासिक सकल जीएसटी आंकड़ा आर्थिक मजबूती का एक पसंदीदा मापक बन गया है। दो वर्षों की दो अंकों की वृद्धि के बाद, 2025-26 में जीएसटी वृद्धि सपाट रही, भले ही उस वर्ष जीडीपी वृद्धि 7.1 फीसदी थी।
अब इस वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही को देखें, जब वृद्धि दर 7.8 फीसदी तक पहुंचने का दावा किया गया है। शुद्ध जीएसटी राजस्व में 7.1 फीसदी की वृद्धि हुई, लेकिन इसमें घरेलू जीएसटी में केवल 2.8 फीसदी की वृद्धि हुई, जबकि आयात पर जीएसटी में 26 फीसदी की भारी वृद्धि हुई।
जीएसटी के अलावा जून तिमाही के अन्य सभी आंकड़े ठोस विस्तार की ओर इशारा करते हैं। अग्रिम कर भुगतान, जो शायद सबसे दिलचस्प है, में 15.3 फीसदी की वृद्धि हुई, जिसमें अग्रिम कॉरपोरेट टैक्स में 16फीसदी और नॉन-कॉरपोरेट भुगतान में 12.7 फीसदी की वृद्धि हुई।
परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स विस्तार के दायरे में है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि भारत की हमेशा से कमजोर रही निर्यात श्रेणी में अप्रैल-जुलाई में मजबूत वृद्धि दर्ज की गई। भारत के माल और सेवाओं के निर्यात में वार्षिक आधार पर 13.2 फीसदी की वृद्धि हुई। अकेले माल निर्यात में 17 फीसदी की वृद्धि हुई। निवेश से यह पता चलता है कि जीडीपी के आंकड़े वास्तविकता पर आधारित हैं या नहीं। अप्रैल-जून तिमाही में सकल स्थिर पूंजी निर्माण में वास्तविक रूप से 11.9 फीसदी की वृद्धि हुई, जो पिछली 13 तिमाहियों में सबसे तेज वृद्धि है।
निवेश जीडीपी का 34.3 फीसदी रहा, जबकि एक वर्ष पहले यह 31.4 फीसदी था। वित्त वर्ष के शुरुआती महीनों में केंद्र सरकार के पूंजीगत व्यय में लगभग 30 फीसदी की वृद्धि हुई है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आम जनता की खपत (जो जीडीपी की लगभग 63 फीसदी है) भी बढ़ रही है। आम खपत में वृद्धि के लिए आय में मजबूत वृद्धि आवश्यक है। दुर्भाग्य से, वास्तविक मजदूरी कई वर्षों से लगभग स्थिर या घट रही है। आर्थिक समीक्षा 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, पुरुष स्वरोजगार कामगारों की वास्तविक मासिक आय 2017-18 में लगभग 9,454 रुपये से घटकर 2023-24 में लगभग 8,591 रुपये रह गई है – यानी नौ फीसदी की वास्तविक गिरावट। महामारी के बाद से ग्रामीण गैर-कृषि मजदूरी में वृद्धि लगभग शून्य रही है; और कृषि मजदूरी में वार्षिक वृद्धि दो फीसदी से भी कम है।
कंपनियों के मुनाफे में रिकॉर्ड वृद्धि के बावजूद, 2012-24 के दौरान वास्तविक वेतनभोगी मजदूरी में संचयी रूप से लगभग चार फीसदी की गिरावट आई है। जीडीपी की 7.8 फीसदी वृद्धि पर सबसे बड़ा संदेह इसी बात से पैदा होता है। यदि सरकार को वास्तविक दीर्घकालिक विकास पर ध्यान केंद्रित करना है, तो उसे विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार से आय वृद्धि पर ध्यान देना होगा, जिसे निर्यात के लिए लक्षित भारी मात्रा (प्रति वर्ष 80-100 अरब डॉलर) में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश द्वारा वित्त पोषित किया जाना चाहिए। तब सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि स्वतः ही हो जाएगी।
(लेखक मनीलाइफ डॉट इन के सह-संस्थापक और मनीलाइफ फाउंडेशन के न्यासी हैं)