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जेनरेटिव एआई बनाम मीडिया: कॉपीराइट, मुआवजे और मौलिक रचनात्मकता की जंग तेज

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बिना ज्ञान, जानकारी, संगीत, फिल्मों, किताबों और समाचार पत्रों के एआई को प्रशिक्षित करने के लिए कुछ भी नहीं होता। बता रही हैं वनिता कोहली-खांडेकर

Last Updated- September 22, 2025 | 11:45 AM IST
artificial intelligence

कैंसर कोशिकाएं हमारे शरीर से ग्लूकोज और अन्य पोषक तत्वों का उपयोग करके फैलती हैं और आखिर में व्यक्ति को जान गंवानी पड़ती है। यदि इन कोशिकाओं को इन पोषक तत्वों से वंचित कर दिया जाए तो क्या यह बीमारी फैलाना बंद कर सकती हैं या इसका इलाज संभव हो सकता है? इसके आधार पर कैंसर को रोकने के लिए उपवास के इस्तेमाल को लेकर बहुत शोध हो रहा है। मीडिया एवं मनोरंजन कंपनियां भी एआई द्वारा उनके काम या सामग्री के इस्तेमाल के खिलाफ अपनी लड़ाई में बिल्कुल इसी तर्क का उपयोग कर रही हैं।

कैंसर की तरह ही, जेनरेटिव एआई अपनी ‘बुद्धिमता’ उन सभी चीजों से हासिल करता है जो चीजें प्रकाशित हैं, लिखी या रिकॉर्ड की गई हैं और ऑनलाइन तथा ऑफलाइन दोनों ही जगहों पर उपलब्ध हैं। बिना ज्ञान, जानकारी, संगीत, फिल्मों, किताबों और समाचार पत्रों के एआई को प्रशिक्षित करने के लिए कुछ भी नहीं होता। यही कारण है कि इसके चारों ओर बना उत्साह असाधारण लगता है। ऐसी दुनिया में जहां सूचना और ज्ञान अर्थव्यवस्थाओं को चलाने के लिए ईंधन का काम करते हैं, वहां हम बिना किसी विरोध के पूरी मानवजाति के सामूहिक ज्ञान को चुनिंदा कंपनियों को सौंप रहे हैं। ये कंपनियां फिर उसी ज्ञान को अलग-अलग हिस्से में ऐप या किसी सारांश के माध्यम से हमें बेचती हैं या देती हैं। इसमें एक स्वाभाविक हितों का टकराव भी दिखता है।

एआई उसी चीज को नष्ट कर रहा है जिस पर वह पल रहा है। एक ऐसी दुनिया की कल्पना कीजिए जहां इंसान कोई भी मौलिक रचना करना या सृजन करना बंद कर चुका हो और ज्ञान के लिए तथा सोचने के काम के लिए पूरी तरह से एआई पर निर्भर हैं। यह 1999 में बनी ‘द मैट्रिक्स’ फिल्म की दुनिया की तरह है जिसमें मशीनों द्वारा शासित एक सर्वनाशी दुनिया में इंसानों को बैटरी सेल के रूप में दिखाया गया।

सच्चाई यह है कि एआई लोगों और कारोबारों के लिए बहुत उपयोगी और क्रांतिकारी साबित हो रहा है। डबिंग और सबटाइटल से लेकर किसी काम की स्पष्ट रणनीति बनाने तक वास्तव में इसने मीडिया उद्योग में लागत कम की है और इसकी क्षमता बढ़ाई है। यही बात अन्य कई उद्योगों पर भी लागू होती है।

अब खबरों की बात करते हैं। कॉमस्कोर के अनुसार, जून 2024 से जून 2025 तक, भारत के शीर्ष 10 अंग्रेजी भाषा के प्रकाशनों ने अपने ऑनलाइन पाठकों में 20 से 30 फीसदी की कमी देखी। कुल मिलाकर, 2024 में ऑनलाइन समाचार देखने वाले लोगों की संख्या 2023 की तुलना में लगभग पांच फीसदी कम हो गई जबकि खबरों के लिए दिया गया समय, एक-तिहाई कम हो गया।गूगल का एआई का सारांश, ओपनएआई का चैटजीपीटी या परप्लेक्सिटी मौजूद सूचनाओं और मीडिया वेबसाइटों से हासिल की गई जानकारी देते हैं, जिससे लोग समाचार के मूल स्रोत पर नहीं जाते।

आप तर्क दे सकते हैं कि यदि समाचार कंपनियों को उनकी कॉपीराइट वाली सामग्री के उपयोग के लिए मुआवजा दिया जाता तब यह सही होता लेकिन ऐसा नहीं किया जा रहा है। एआई तंत्र स्टार्टअप से ही बना हुआ है ऐसे में भुगतान कैसे किया जा सकता है? यही तर्क कंपनियां और यहां तक कि नियामक भी देते हैं। ओपनएआई का मूल्यांकन अब 500 अरब डॉलर के करीब है और यह कंपनी अमेरिका में चैटजीपीटी की सेवाएं 20 डॉलर (1,760 रुपये) प्रतिमाह और भारत में 399 रुपये प्रति माह में देती है।

लेकिन भारत की प्रकाशन कंपनियों के लिए न्यूयॉर्क की इस कंपनी के साथ बातचीत करना भी मुश्किल रहा है ऐसे में मुआवजे की बात तो दूर की कौड़ी है। यह संयोग ही है कि यही कंपनी वॉल स्ट्रीट जर्नल, द टाइम्स और अन्य की सामग्री के उपयोग और उसे दिखाने के कारण अमेरिका की कंपनी न्यूजकॉर्प को पांच वर्षों के दौरान 25 करोड़ डॉलर का भुगतान करने जा रही है। गूगल का कहना है कि एआई मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी का इस्तेमाल वास्तव में ‘उचित उपयोग’ के कानूनी सिद्धांत पर आधारित है। इस बात से पूरी तरह से इनकार करना चिंताजनक है कि एआई मौजूदा कॉपीराइट डेटा पर बनाया जा रहा है, हालांकि इस रुख को सरकार और कारोबार भी समर्थन देते हैं।

भारत में लड़ाई अभी शुरू हुई है। पिछले साल, एशियन न्यूज इंटरनैशनल (एएनआई) ने दिल्ली उच्च न्यायालय में ओपनएआई के खिलाफ मुकदमा दायर किया। उसका आरोप है कि एआई कंपनी ने अपने मॉडल को प्रशिक्षण देने के लिए एएनआई की सामग्री का इस्तेमाल किया और न्यूज एजेंसी के नाम पर गलत जानकारी भी दी। इस मुकदमे में जल्द ही डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) भी शामिल हो गया, जो 22 मुख्यधारा के प्रकाशकों (इसमें यह अखबार भी शामिल है) और म्यूजिक कंपनियों से जुड़े इंडियन म्यूजिक इंडस्ट्री (आईएमआई) का प्रतिनिधित्व करता है।

कई अन्य प्रकाशक (जैसे न्यूयॉर्क टाइम्स) और लेखक (जैसे जॉर्ज आरआर मार्टिन, जॉन ग्रिशम) भी कानूनी तरीके अपना रहे हैं। कानूनी लड़ाई के अलावा, रचनात्मक क्षेत्र तकनीक के जरिये भी पलटवार कर रहा है। क्लाउडफ्लेयर और टोलबिट जैसी कंपनियों की सेवाओं का इस्तेमाल बढ़ रहा है जो एआई क्रॉलर/बॉट को वेबसाइटों से डेटा खंगालने से रोकती हैं। कई समाचार संस्थान भी अपनी सामग्री के लिए ‘पेवॉल’पर जोर दे रहे हैं जिसके तहत बिना सबस्क्रिप्शन लिए सामग्री नहीं पढ़ी जा सकती है।

एक और दूसरी स्थिति यह है कि जब सारी मौलिक सामग्री का इस्तेमाल कर लिया जाएगा और मौजूदा कंपनियां खत्म हो जाएंगी, तब एआई, खुद एआई द्वारा बनाई गई सामग्री पर ही निर्भर हो जाएगा। ऐसे में यह पूछना दिलचस्प होगा कि तब एआई क्या बनाएगा और शायद खुद एआई से ही यह सवाल पूछा जा सकता है।

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First Published - September 21, 2025 | 10:35 PM IST

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